Friday, August 14, 2015

देखिये परिचय का क्रम

 जब हनुमानजी लंका की अशोकवाटिका का विध्वंस करके मेघनाद की ब्रह्मपाश मे बंधकर रावण के दरबार में ले जाये गए । तब रावण ने उनसे परिचय पूंछा ❓
श्रीमद्वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण बोला-
कस्त्वं❓ (तुम कौन हो)

तो हनुमानजी ने उत्तर दिया-
परिचय देने का क्रम देखिये

ज्ञानीनामअग्रगण्य हनुमानजी बोले-

दासोSहम् कोसलेंद्रस्य (मैं कोसलपति का दास हूँ)
रावण बोला - कौन कोसलपति❓ कई राजा हुए कोसलपुर के❓

हनुमानजी बोले- रामस्य (रामजी का)
रावण बोला- कौन राम ❓ जिसको नगर से निकाल दिया है❗ और जो वन वन भटक रहा है❗ जिसकी पत्नी चुरा ली गई है❗ वही राम❗❓

हनुमानजी ने उत्तर दिया- क्लिष्टकर्मणः
नहीं❗ तुम जो बता रहे हो वो राम नहीं❗ वो राम जो क्लिष्ट से क्लिष्ट कर्म को 👌 चुटकी बजाते ही पूरा कर देते है❗

रावण बोला- काम क्या करते हो उस राम के लिए ❓
हनुमानजी बोले- निहंता शत्रुसैन्यानां

रामजी के शत्रु की सेना का निहंता (मारता हूँ)
रावण- क्या नाम है तुम्हारा❓
हनुमान जी बोले- हनुमान मारुतात्मज

हनुमान मेरा नाम है और मैं मारुत (पवनदेव) का आत्मज (पुत्र हूँ)

तो पूरा श्लोक हुआ -

दासोSहम् कोसलेंद्रस्य रामस्याक्लिष्ट कर्मणः ।
निहंता शत्रुसैन्यानां हनुमान मारुतात्मज ।।

देखिये परिचय का क्रम

हनुमानजी ने अपना नाम पहले नही बताया, न ही पिता का नाम, न ही काम, सर्वप्रथम वो परिचय दिया जिनके लिए अपना जीवन लगा दिया ।
तो हमारा परिचय क्रम भी यही होना चाहिए ।
जिसके लिए हम अपना जीवन लगा रहे है उनका परिचय पहले देना चाहिए ।
वो अपने इष्टदेव, गुरुदेव, या कोई आदर्श व्यक्ति जिसके लिए आप अपना जीवन लगा रहे है उनके नाम से परिचय आरम्भ करना चाहिए ।

फिर अपना काम/व्यवसाय आदि बताकर फिर अपना नाम और पिताजी का नाम बताना चाहिए
🙏🌻🙏
होता इसका उल्टा है👎
पहले हम अपने नाम का ढिंढोरा पीटने लगते हैं।

।।🙏🌻जय गुरुदेव🌻🙏।।
शरणम् मम्  🙌🙌🙏स्वकीय परकीया भाव

'उज्ज्वल नीलमणि' के 'कृष्णवल्लभा' अध्याय के अनुसार कृष्णवल्लभाओं को दो भागो में बाँटा गया है.
१. - स्वकीया और
२. - परकीया
स्वकीय गोपियाँ - रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती आदि कृष्ण की विवाहिता पत्नियाँ स्वकीया हैं तथा उनकी प्रेयसी गोपियाँ परकीया हैं।
परन्तु गोपियों का परकीयत्व लौकिक दृष्टिमात्र से है। वास्तव में तो वे सभी स्वकीया हैं, क्योंकि उन्होंने प्राण, मन और शरीर सभी कुछ कृष्णार्पण कर रखा है। फिर भी प्रकट लीला में इन गोपियों का परकीयात्व ही स्वीकार किया गया है।
परकीया गोपियाँ- "कन्या"और"परोढा"दो प्रकार की हैं।
कन्या- अविवाहित कुमारियाँ हैं, जो कृष्ण को ही अपना पति मानती हैं।
परोढा-प्रेम-भक्ति में श्रेष्ठता परोढाओं की ही है।परोढा गोपियाँ पुन: तीन प्रकार की हैं- "नित्यप्रिया", "साधन-परा"और"देवी".
अ) नित्य प्रिया - जो गोपियाँ नित्यकाल के लिए नित्य वृन्दावन में श्रीकृष्ण के लीला-परिकर की अंग हैं, वे नित्यप्रिया हैं। ये वस्तुत: वे भक्त जीव हैं, जिन्होंने प्रेम-भक्ति के द्वारा भगवत्-स्वरूप में प्रवेश पा लिया है और जो नित्यसिद्ध गोपी-देह से उनकी लीला के अभिन्न अंग बन गये हैं। नित्यप्रिया गोपियों को"प्राचीना" भी कहा गया है, क्योंकि ये वे जीव हैं, जो बहुत लम्बी साधना के फलस्वरूप गोपी-देह पाते हैं। इनका गोपी-भाव भक्तों का साध्य नहीं है। उनका साध्य साधना-परा गोपियों का रूप है।
ब ) साधना-परा गोपियाँ- दो प्रकार की हैं।"यौथिकी" , "अयौथिकी"
१. यौथिकी -अपने गणके साथ प्रेम-साधना में संलग्न रहती हैं।
यौथिकी पुन: दो प्रकार की होती हैं- "मुनि" और "उपनिषद्"
पौराणिक प्रमाणों के अनुसार अनेक*मुनिगण-जो कृष्ण के माधुर्यरूप का आस्वादन लेने के लिए गोपी-भावकी आकांक्षा करते हैं, गोपियों का जनम पाकर कृष्णकी ब्रजलीला में सम्मिलित होने का सौभाग्य लाभ करते हैं। ये ही मुनि-यूथकी गोपियाँ हैं।
*उपनिषद-यूथ की गोपियाँ पूर्वजन्म के उपनिषदगण हैं, जिन्होंने तपस्या करके ब्रज में गोपी रूप पाया है.
२ . अयौथिकी -गोपियों का रूप उन कृपाप्राप्त जीवों को मिलता है, जो गोपी-भाव से भगवान् कृष्ण के प्रेम में रत रहते हैं और अनेक योनियों में जन्म लेने के बाद गोपीरूप पाते हैं ये अयौथिकी गोपियाँ "नवीना"भी कहलाती हैं और इन्हें भक्ति के फलस्वरूप प्राचीना नित्यप्रिया गोपियों के साथ सालोक्य प्राप्ति होती है।
स ) देवी -उन गोपियों का नाम है, जो नित्यप्रियाओं के अशं से श्रीकृष्ण के सन्तोष के लिए उस समय देवी के रूप में जन्म लेती हैं, जब स्वयं श्रीकृष्ण देवयोनि में अंशावतार धारण करते हैं। उपर्युक्त कन्या गोपियाँ ये ही देवियाँ हैं जो नित्यप्रियाओं की परम प्रिय सखियों का पद पाती हैं।
नित्यप्रिया गोपियों में आठ प्रधान गोपियाँ यूथेश्वरी होती है। प्रत्येक यूथ में यूथेश्वरी गोपी के भावकी असंख्य गोपियाँ होती हैं। राधा और चन्द्रावली सर्वप्रधान यूथेश्वरी गोपियाँ हैं। इनमें भी राधा सर्वश्रेष्ठ-महाभाव-स्वरूपा हैं।
रूपगोस्वामी के अनुसार ये सुष्ठुकान्तस्वरूपा, धृतषोडश-श्रृगांरा और द्वाद्वशा भरणाश्रिता हैं उनके अनन्त गुण हैं।

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