Monday, June 22, 2015

कृष्ण ने पढ़ा था महाकालेश्वर का सहस्त्रनाम स्तोत्र

कृष्ण ने पढ़ा था महाकालेश्वर का सहस्त्रनाम स्तोत्र


आश्रम छोड़ने से पूर्व श्रीकृष्ण ने महाकालेश्वर का माहात्म्य जानने की उत्सुकता प्रकट की थी, समस्त शिष्यों को साथ लेकर गुरु सांदीपनि महाकालेश्वर पहुंचे और वहां महाकालेश्वर के सहस्त्रनाम लेकर बिल्वपत्र द्वारा अर्चना की थी। ये सहस्त्रनाम सांदीपनि वंश में विद्यमान है। इसमें 177 श्लोक हैं। पुस्तक के प्रारंभ में यह श्लोक हैं।

संदीपस्यांतिकेवंत्यां गतौतौ पठनार्थिनी।
चतुः षष्टिकलाः सर्वाः कृतविद्याश्चतुर्दश (3)
अथकैदाहं श्रीकृष्णः सुदामोः द्विजस्रतमः।
महाकालेश्वरं विल्वकेन मंत्रेण चार्पणम,
करोमि वद में कृष्ण कृपया सात्वतां पते।

इस प्रकार सुदामा के प्रश्न पर श्रीकृष्ण ने महाकालेश्वर बिल्वपत्र अर्पण करने का विधान बताया है और कहा है कि महाकाल के जो सहस्त्रनाम हैं, उनका महर्षि स्वयं मैं हूं। अनुष्टुप छंद है, और देव महाकाल है। यह सहस्त्रनाम शक्तियों से प्रचलित हैं। महर्षि सांदीपनि इसी अवंति के निवासी थे, यह अनेक प्रमाणों से स्पष्ट है।

श्रीमद्भ्‌भागवतः

काश्य सांदीपनिर्नाम अवंतीपुरवासिनम्‌।
अथो गुरुकुले वासमिच्छंतां वुप जग्मतुः॥
- स्कंद पुराण अवं. ख. 33

गच्छेतामुज्जयिन्यां वै कृत विवौभविष्यथा।
ततः सांदीपनि विप्रं जग्मतू राम केशवी॥
- हरिवंश पुराण (194-18-21)

कस्य चित्वथ कालस्य सहितौ राम केशवौ।
गुरुं सांदीपनिं काश्यमवंतीपुरवासिनम्‌॥
- ब्रह्म ब्रह्म पुराण (194-18-21)

ततः सांदीपनिं काश्यमवंतीपुरवासिनम।
अस्त्रार्थे जग्मतुर्वीरौ बलदेव जनार्दनी॥
- विष्णु पुराण (5-21-18-22)

ततः सांदीपनि काश्यमवंतीपुरवासिनम!।
विद्यार्थे जग्मतुर्वालौ कृतोपनयन कृतौ॥
- ब्रह्म वैवैवर्त (102-103)

कृष्णः सांदीपनेगेंहं गत्वा च सवलो मुदा।
नमश्चकार स्वगुरुं गुरुपत्नीं पतिप्रताम्‌॥
- देवी भागवत (4-24-15-16)

उपनीतौ तदा तौ तु गतौ सांदीपनालयम्‌।
विद्याः सर्वाः समभ्यस्य मथुरामागतौ पुनः॥

- इनके अतिरिक्त 'स्कंद पुराण' के अवंती खंड के पूरे दो अध्याय, 'ब्रह्म वैवर्त' के तीन अध्याय और 'ब्रह्म पुराण' अ. 86-104 'पद्म पुराण' उत्तर-अ. 247-274। 'विष्णु पुराण' अ. 21। 'भागवत-दशम' अ. 45 अ. 80। 'ब्रह्म वैवर्त' अ. 101-102-99। 'हरिवंश' अ. 33-35। 'गर्ग संहिता' 5-1-151 आदि ग्रंथों में इस बात का विस्तार सहित वर्णन है।

भगवद्गीता संसार का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। इस ज्ञान का विकास श्रीकृष्ण के हृदय में अवंती उज्जयिनी नगरी में हुआ है। महर्षि सांदीपनि का पवित्र आश्रम 5000 वर्ष से ऊपर समय हुआ यहां अद्यावधि अपनी अतीत स्मृति को जागृत कर रहा है। यह अवश्य ही समय गतिवश जीर्ण-शीर्ण अवस्था में 'तेहिनो दिवसा गताः' का सूचक बना हुआ है।

यहां महर्षि की एक पुरातन प्रतिमा भी प्रतिष्ठित है। हां अब वैसे शिष्य नहीं रहे तो ऐसे गुरु भी कहां होंगे?

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