Wednesday, June 17, 2015

|| श्री नारायण कवच ||

|| श्री नारायण कवच ||

मंगलम् भगवान विष्णु मंगलम् गरुड़ध्वज: ।
मंगलम् पुंडरीकाक्षम् मंगलाय तनो हरि: ।।
न्यासः- सर्वप्रथम श्रीगणेश जी तथा भगवान नारायण को नमस्कार करके नीचे लिखे प्रकार से न्यास करें।

अगं-न्यासः-

ॐ ॐ नमः — पादयोः ( दाहिने हाँथ की तर्जनी व अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर दोनों पैरों का स्पर्श करें)।
ॐ नं नमः — जानुनोः ( दाहिने हाँथ की तर्जनी व अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर दोनों घुटनों का स्पर्श करें )।
ॐ मों नमः — ऊर्वोः (दाहिने हाथ की तर्जनी अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर दोनों पैरों की जाँघ का स्पर्श करें)।
ॐ नां नमः — उदरे ( दाहिने हाथ की तर्जनी तथा अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर पेट का स्पर्श करे )
ॐ रां नमः — हृदि ( मध्यमा-अनामिका-तर्जनी से हृदय का स्पर्श करें )
ॐ यं नमः – उरसि ( मध्यमा- अनामिका-तर्जनी से छाती का स्पर्श करे )
ॐ णां नमः — मुखे ( तर्जनी – अँगुठे के संयोग से मुख का स्पर्श करे )
ॐ यं नमः — शिरसि ( तर्जनी -मध्यमा के संयोग से सिर का स्पर्श करे )

कर-न्यासः-

ॐ ॐ नमः — दक्षिणतर्जन्याम् ( दाहिने अँगुठे से दाहिने तर्जनी के सिरे का स्पर्श करे )
ॐ नं नमः —-दक्षिणमध्यमायाम् ( दाहिने अँगुठे से दाहिने हाथ की मध्यमा अँगुली का ऊपर वाला पोर स्पर्श करे )
ॐ मों नमः —दक्षिणानामिकायाम् ( दहिने अँगुठे से दाहिने हाथ की अनामिका का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ भं नमः —-दक्षिणकनिष्ठिकायाम् (दाहिने अँगुठे से हाथ की कनिष्ठिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श करे )
ॐ गं नमः —-वामकनिष्ठिकायाम् ( बाँये अँगुठे से बाँये हाथ की कनिष्ठिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श करे )
ॐ वं नमः —-वामानिकायाम् ( बाँये अँगुठे से बाँये हाँथ की अनामिका का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ तें नमः —-वाममध्यमायाम् ( बाँये अँगुठे से बाये हाथ की मध्यमा का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ वां नमः —वामतर्जन्याम् ( बाँये अँगुठे से बाँये हाथ की तर्जनी का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ सुं नमः —-दक्षिणाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि ( दाहिने हाथ की चारों अँगुलियों से दाहिने हाथ के अँगुठे का ऊपरवाला पोर छुए )
ॐ दें नमः —–दक्षिणाङ्गुष्ठाधः पर्वणि ( दाहिने हाथ की चारों अँगुलियों से दाहिने हाथ के अँगुठे का नीचे वाला पोर छुए )
ॐ वां नमः —–वामाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि ( बाँये हाथ की चारों अँगुलियों से बाँये अँगुठे के ऊपरवाला पोर छुए )
ॐ यं नमः ——वामाङ्गुष्ठाधः पर्वणि ( बाँये हाथ की चारों अँगुलियों से बाँये हाथ के अँगुठे का नीचे वाला पोर छुए )

विष्णुषडक्षरन्यासः-

ॐ ॐ नमः ————हृदये ( तर्जनी – मध्यमा एवं अनामिका से हृदय का स्पर्श करे )
ॐ विं नमः ————-मूर्ध्नि ( तर्जनी मध्यमा के संयोग सिर का स्पर्श करे )
ॐ षं नमः —————भ्रुर्वोर्मध्ये ( तर्जनी-मध्यमा से दोनों भौंहों का स्पर्श करे )
ॐ णं नमः —————शिखायाम् ( अँगुठे से शिखा का स्पर्श करे )
ॐ वें नमः —————नेत्रयोः ( तर्जनी -मध्यमा से दोनों नेत्रों का स्पर्श करे )
ॐ नं नमः —————सर्वसन्धिषु ( तर्जनी – मध्यमा और अनामिका से शरीर के सभी जोड़ों — जैसे – कंधा, घुटना, कोहनी आदि का स्पर्श करे )
ॐ मः अस्त्राय फट् — प्राच्याम् (पूर्व की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् –आग्नेय्याम् ( अग्निकोण में चुटकी बजायें )
ॐ मः अस्त्राय फट् — दक्षिणस्याम् ( दक्षिण की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — नैऋत्ये (नैऋत्य कोण में चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — प्रतीच्याम्( पश्चिम की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — वायव्ये ( वायुकोण में चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — उदीच्याम्( उत्तर की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — ऐशान्याम् (ईशानकोण में चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — ऊर्ध्वायाम् ( ऊपर की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — अधरायाम् (नीचे की ओर चुटकी बजाएँ )

श्री हरिः

अथ श्रीनारायणकवच

।।राजोवाच।।

यया गुप्तः सहस्त्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान्।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्।।१
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्।
यथाssततायिनः शत्रून् येन गुप्तोsजयन्मृधे।।२

राजा परिक्षित ने पूछाः भगवन् ! देवराज इंद्र ने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओं की चतुरङ्गिणी सेना को खेल-खेल में अनायास ही जीतकर त्रिलोकी की राज लक्ष्मी का उपभोग किया, आप उस नारायण कवच को सुनाइये और यह भी बतलाईये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमि में किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की ।।१-२

।।श्रीशुक उवाच।।

वृतः पुरोहितोस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु।।३

श्रीशुकदेवजी ने कहाः परीक्षित् ! जब देवताओं ने विश्वरूप को पुरोहित बना लिया, तब देवराज इन्द्र के प्रश्न करने पर विश्वरूप ने नारायण कवच का उपदेश दिया तुम एकाग्रचित्त से उसका श्रवण करो ।।३

विश्वरूप उवाचधौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ् मुखः।
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः।।४

नारायणमयं वर्म संनह्येद् भय आगते।
पादयोर्जानुनोरूर्वोरूदरे हृद्यथोरसि।।५

मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत्।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा।।६

विश्वरूप ने कहा – देवराज इन्द्र ! भय का अवसर उपस्थित होने पर नारायण कवच धारण करके अपने शरीर की रक्षा कर लेनी चाहिए उसकी विधि यह है कि पहले हाँथ-पैर धोकर आचमन करे, फिर हाथ में कुश की पवित्री धारण करके उत्तर मुख करके बैठ जाय इसके बाद कवच धारण पर्यंत और कुछ न बोलने का निश्चय करके पवित्रता से “ॐ नमो नारायणाय” और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इन मंत्रों के द्वारा हृदयादि अङ्गन्यास तथा अङ्गुष्ठादि करन्यास करे पहले “ॐ नमो नारायणाय” इस अष्टाक्षर मन्त्र के ॐ आदि आठ अक्षरों का क्रमशः पैरों, घुटनों, जाँघों, पेट, हृदय, वक्षःस्थल, मुख और सिर में न्यास करे अथवा पूर्वोक्त मन्त्र के यकार से लेकर ॐ कार तक आठ अक्षरों का सिर से आरम्भ कर उन्हीं आठ अङ्गों में विपरित क्रम से न्यास करे ।।४-६

करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया।
प्रणवादियकारन्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु।।७

तदनन्तर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस द्वादशाक्षर -मन्त्र के ॐ आदि बारह अक्षरों का दायीं तर्जनी से बाँयीं तर्जनी तक दोनों हाँथ की आठ अँगुलियों और दोनों अँगुठों की दो-दो गाठों में न्यास करे।।७

न्यसेद् हृदय ओङ्कारं विकारमनु मूर्धनि।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत्।।८
वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः।।९
सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्।
ॐ विष्णवे नम इति ।।१०

फिर “ॐ विष्णवे नमः” इस मन्त्र के पहले के पहले अक्षर ‘ॐ’ का हृदय में, ‘वि’ का ब्रह्मरन्ध्र , में ‘ष’ का भौहों के बीच में, ‘ण’ का चोटी में, ‘वे’ का दोनों नेत्रों और ‘न’ का शरीर की सब गाँठों में न्यास करे तदनन्तर ‘ॐ मः अस्त्राय फट्’ कहकर दिग्बन्ध करे इस प्रकर न्यास करने से इस विधि को जानने वाला पुरूष मन्त्रमय हो जाता है ।।८-१०

आत्मानं परमं ध्यायेद ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम्।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत ।।११

इसके बाद समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य से परिपूर्ण इष्टदेव भगवान् का ध्यान करे और अपने को भी तद् रूप ही चिन्तन करे तत्पश्चात् विद्या, तेज, और तपः स्वरूप इस कवच का पाठ करे ।।११

ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे।
दरारिचर्मासिगदेषुचापाशान् दधानोsष्टगुणोsष्टबाहुः ।।१२

भगवान् श्रीहरि गरूड़जी के पीठ पर अपने चरणकमल रखे हुए हैं, अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही हैं आठ हाँथों में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष, और पाश (फंदा) धारण किए हुए हैं वे ही ओंकार स्वरूप प्रभु सब प्रकार से सब ओर से मेरी रक्षा करें।।१२

जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरूणस्य पाशात्।
स्थलेषु मायावटुवामनोsव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ।।१३

मत्स्यमूर्ति भगवान् जल के भीतर जलजंतुओं से और वरूण के पाश से मेरी रक्षा करें माया से ब्रह्मचारी रूप धारण करने वाले वामन भगवान् स्थल पर और विश्वरूप श्री त्रिविक्रमभगवान् आकाश में मेरी रक्षा करें 13

दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयुथपारिः।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ।।१४

जिनके घोर अट्टहास करने पर सब दिशाएँ गूँज उठी थीं और गर्भवती दैत्यपत्नियों के गर्भ गिर गये थे, वे दैत्ययुथपतियों के शत्रु भगवान् नृसिंह किले, जंगल, रणभूमि आदि विकट स्थानों में मेरी रक्षा करें ।।१४

रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोsव्याद् भरताग्रजोsस्मान् ।।१५

अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठा लेने वाले यज्ञमूर्ति वराह भगवान् मार्ग में, परशुराम जी पर्वतों के शिखरों और लक्ष्मणजी के सहित भरत के बड़े भाई भगावन् रामचंद्र प्रवास के समय मेरी रक्षा करें ।।१५

मामुग्रधर्मादखिलात् प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च हासात्।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद् गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ।।१६

भगवान् नारायण मारण – मोहन आदि भयंकर अभिचारों और सब प्रकार के प्रमादों से मेरी रक्षा करें ऋषिश्रेष्ठ नर गर्व से, योगेश्वर भगवान् दत्तात्रेय योग के विघ्नों से और त्रिगुणाधिपति भगवान् कपिल कर्मबन्धन से मेरी रक्षा करें ।।१६

सनत्कुमारो वतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।
देवर्षिवर्यः पुरूषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ।।१७

परमर्षि सनत्कुमार कामदेव से, हयग्रीव भगवान् मार्ग में चलते समय देवमूर्तियों को नमस्कार आदि न करने के अपराध से, देवर्षि नारद सेवापराधों से और भगवान् कच्छप सब प्रकार के नरकों से मेरी रक्षा करें ।।१७

धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वाद् भयादृषभो निर्जितात्मा।
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् बलो गणात् क्रोधवशादहीन्द्रः ।।१८

भगवान् धन्वन्तरि कुपथ्य से, जितेन्द्र भगवान् ऋषभदेव सुख-दुःख आदि भयदायक द्वन्द्वों से, यज्ञ भगवान् लोकापवाद से, बलरामजी मनुष्यकृत कष्टों से और श्रीशेषजी क्रोधवशनामक सर्पों के गणों से मेरी रक्षा करें ।।१८

द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणात् प्रमादात्।
कल्किः कले कालमलात् प्रपातु धर्मावनायोरूकृतावतारः ।।१९

भगवान् श्रीकृष्णद्वेपायन व्यासजी अज्ञान से तथा बुद्धदेव पाखण्डियों से और प्रमाद से मेरी रक्षा करें धर्म-रक्षा करने वाले महान अवतार धारण करने वाले भगवान् कल्कि पाप-बहुल कलिकाल के दोषों से मेरी रक्षा करें ।।१९

मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः।
नारायण प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ।।२०

प्रातःकाल भगवान् केशव अपनी गदा लेकर, कुछ दिन चढ़ जाने पर भगवान् गोविन्द अपनी बांसुरी लेकर, दोपहर के पहले भगवान् नारायण अपनी तीक्ष्ण शक्ति लेकर और दोपहर को भगवान् विष्णु चक्रराज सुदर्शन लेकर मेरी रक्षा करें ।।२०

देवोsपराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु माधवो माम्।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोsवतु पद्मनाभः ।।२१

तीसरे पहर में भगवान् मधुसूदन अपना प्रचण्ड धनुष लेकर मेरी रक्षा करें सांयकाल में ब्रह्मा आदि त्रिमूर्तिधारी माधव, सूर्यास्त के बाद हृषिकेश, अर्धरात्रि के पूर्व तथा अर्ध रात्रि के समय अकेले भगवान् पद्मनाभ मेरी रक्षा करें ।।२१

श्रीवत्सधामापररात्र ईशः प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ।।२२

रात्रि के पिछले प्रहर में श्रीवत्सलाञ्छन श्रीहरि, उषाकाल में खड्गधारी भगवान् जनार्दन, सूर्योदय से पूर्व श्रीदामोदर और सम्पूर्ण सन्ध्याओं में कालमूर्ति भगवान् विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें ।।२२

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम्।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमासु कक्षं यथा वातसखो हुताशः ।।२३

सुदर्शन ! आपका आकार चक्र ( रथ के पहिये ) की तरह है आपके किनारे का भाग प्रलयकालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् की प्रेरणा से सब ओर घूमते रहते हैं जैसे आग वायु की सहायता से सूखे घास-फूस को जला डालती है, वैसे ही आप हमारी शत्रुसेना को शीघ्र से शीघ्र जला दीजिये, जला दीजिये ।।२३

गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षोभूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ।।२४

कौमुद की गदा ! आपसे छूटने वाली चिनगारियों का स्पर्श वज्र के समान असह्य है आप भगवान् अजित की प्रिया हैं और मैं उनका सेवक हूँ इसलिए आप कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत और प्रेतादि ग्रहों को अभी कुचल डालिये, कुचल डालिये तथा मेरे शत्रुओं को चूर – चूर कर दिजिये ।।२४

त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन् ।।२५

शङ्खश्रेष्ठ ! आप भगवान् श्रीकृष्ण के फूँकने से भयंकर शब्द करके मेरे शत्रुओं का दिल दहला दीजिये एवं यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस आदि भयावने प्राणियों को यहाँ से तुरन्त भगा दीजिये ।।२५

त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्यमीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि।
चर्मञ्छतचन्द्र छादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् २६

भगवान् की श्रेष्ठ तलवार ! आपकी धार बहुत तीक्ष्ण है आप भगवान् की प्रेरणा से मेरे शत्रुओं को छिन्न-भिन्न कर दिजिये। भगवान् की प्यारी ढाल ! आपमें सैकड़ों चन्द्राकार मण्डल हैं आप पापदृष्टि पापात्मा शत्रुओं की आँखे बन्द कर दिजिये और उन्हें सदा के लिये अन्धा बना दीजिये ।।२६

यन्नो भयं ग्रहेभ्यो भूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव वा ।।२७

सर्वाण्येतानि भगन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतीपकाः ।।२८

सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छल तारे ) आदि केतु, दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगने वाले जन्तु, दाढ़ोंवाले हिंसक पशु, भूत-प्रेत आदि तथा पापी प्राणियों से हमें जो-जो भय हो और जो हमारे मङ्गल के विरोधी हों – वे सभी भगावान् के नाम, रूप तथा आयुधों का कीर्तन करने से तत्काल नष्ट हो जायें ।।२७-२८

गरूड़ो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ।।२९

बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान् गरूड़ और विष्वक्सेनजी अपने नामोच्चारण के प्रभाव से हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचायें।।२९

सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः।
बुद्धिन्द्रियमनः प्राणान् पान्तु पार्षदभूषणाः ।।३०

श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और श्रेष्ठ पार्षद हमारी बुद्धि , इन्द्रिय , मन और प्राणों को सब प्रकार की आपत्तियों से बचायें ।।३०

यथा हि भगवानेव वस्तुतः सद्सच्च यत्।
सत्यनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपाद्रवाः ।।३१

जितना भी कार्य अथवा कारण रूप जगत है, वह वास्तव में भगवान् ही है इस सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जायें ।।३१

यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्।
भूषणायुद्धलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ।।३२

तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ।।३३

जो लोग ब्रह्म और आत्मा की एकता का अनुभव कर चुके हैं, उनकी दृष्टि में भगवान् का स्वरूप समस्त विकल्पों से रहित है-भेदों से रहित हैं फिर भी वे अपनी माया शक्ति के द्वारा भूषण, आयुध और रूप नामक शक्तियों को धारण करते हैं यह बात निश्चित रूप से सत्य है इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक भगवान् श्रीहरि सदा -सर्वत्र सब स्वरूपों से हमारी रक्षा करें ।।३२-३३

विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्तादन्तर्बहिर्भगवान् नारसिंहः।
प्रहापयँल्लोकभयं स्वनेन ग्रस्तसमस्ततेजाः ।।३४

जो अपने भयंकर अट्टहास से सब लोगों के भय को भगा देते हैं और अपने तेज से सबका तेज ग्रस लेते हैं, वे भगवान् नृसिंह दिशा -विदिशा में, नीचे -ऊपर, बाहर-भीतर – सब ओर से हमारी रक्षा करें ।।३४

मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारयणात्मकम्।
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ।।३५

देवराज इन्द्र ! मैने तुम्हें यह नारायण कवच सुना दिया है इस कवच से तुम अपने को सुरक्षित कर लो बस, फिर तुम अनायास ही सब दैत्य – यूथपतियों को जीत कर लोगे ।।३५

एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा।
पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ।।३६

इस नारायण कवच को धारण करने वाला पुरूष जिसको भी अपने नेत्रों से देख लेता है अथवा पैर से छू देता है, तत्काल समस्त भयों से से मुक्त हो जाता है 36

न कुतश्चित भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ।।३७

जो इस वैष्णवी विद्या को धारण कर लेता है, उसे राजा, डाकू, प्रेत, पिशाच आदि और बाघ आदि हिंसक जीवों से कभी किसी प्रकार का भय नहीं होता ।।३७

इमां विद्यां पुरा कश्चित् कौशिको धारयन् द्विजः।
योगधारणया स्वाङ्गं जहौ स मरूधन्वनि ।।३८

देवराज! प्राचीनकाल की बात है, एक कौशिक गोत्री ब्राह्मण ने इस विद्या को धारण करके योगधारणा से अपना शरीर मरूभूमि में त्याग दिया ।।३८

तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा।
ययौ चित्ररथः स्त्रीर्भिवृतो यत्र द्विजक्षयः ।।३९

जहाँ उस ब्राह्मण का शरीर पड़ा था, उसके उपर से एक दिन गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के साथ विमान पर बैठ कर निकले ।।३९

गगनान्न्यपतत् सद्यः सविमानो ह्यवाक् शिराः।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ।।४०

वहाँ आते ही वे नीचे की ओर सिर किये विमान सहित आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़े इस घटना से उनके आश्चर्य की सीमा न रही जब उन्हें बालखिल्य मुनियों ने बतलाया कि यह नारायण कवच धारण करने का प्रभाव है, तब उन्होंने उस ब्राह्मण देव की हड्डियों को ले जाकर पूर्ववाहिनी सरस्वती नदी में प्रवाहित कर दिया और फिर स्नान करके वे अपने लोक को चले गये ।।४०

।।श्रीशुक उवाच।।

य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चादृतः।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ।।४१

श्रीशुकदेवजी कहते हैं – परिक्षित् जो पुरूष इस नारायण कवच को समय पर सुनता है और जो आदर पूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने सभी प्राणी आदर से झुक जाते हैं और वह सब प्रकार के भयों से मुक्त हो जाता है ।।४१

एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्यऽमृधेसुरान् ।।४२

परीक्षित् ! शतक्रतु इन्द्र ने आचार्य विश्वरूपजी से यह वैष्णवी विद्या प्राप्त करके रणभूमि में असुरों को जीत लिया और वे त्रैलोक्यलक्ष्मी का उपभोग करने लगे।। 42

।।इति श्रीनारायणकवचं सम्पूर्णम्।।

2…..….।। नारायण ह्रदयम ।।
लक्ष्मीनारायण की प्रसन्नता के लिए लक्ष्मीह्रदय के साथ इसका पाठ करने से धनधान्य एश्वर्य की वृद्धि होती है । अगर आप लक्ष्मी ह्रदय का पाठ करने में असमर्थ है तो लक्ष्मी मंत्र के साथ भी इसका पाठ किया जा सकता है ।
ध्यानम
” उद्यदादित्यसंकाशं पीतवास समच्युतम । शंखचक्रगदापाणिम ध्यायेल्लक्ष्मीपतिं हरिम ।। ”
” ॐ नमो नारायणाय ” फिर ध्यानम के बाद इस मंत्र का १०८ बार जप करके स्तोत्र का पाठ करें ।
स्तोत्रम
ॐ नारायणः परं ज्योतिरात्मा नारायणः परः । नारायणः परमब्रह्म नारायण नमोस्तुते ।।
नारायणः परोदेव दाता नारायणः परः । नारायणः परो ध्याता नारायण नमोस्तुते ।।
नारायणः परंधाम ध्यानं नारायणः परः । नारायणः परो धर्म्मो नारायण नमोस्तुते ।।
नारायणः परो वेद्यो विद्या नारायणः परः । विश्वं नारायणः साक्षान्नारायण नमोस्तुते ।।
नारायणद्विधिजार्तो जातो नारायणाच्छिवः । जातो नारायणादिन्द्रो नारायण नमोस्तुते ।।
रविर्नारायणं तेजश्चान्द्रम नारायणं महः । वह्रिर्नारायणः साक्षान्नारायण नमोस्तुते ।।
नारायण उपास्यः स्यादगुरुर्नारायणः परः । नारायणः परोबोधो नारायण नमोस्तुते ।।
नारायणः फलं मुख्यं सिध्दिर्नारायणः सुखम। सेव्यो नारायणः सुध्दो नारायण नमोस्तुते ।।
.

3…|| श्रीदत्तात्रेयवज्रकवचम्‌ ||
॥श्रीहरि:||
श्रीगणेशाय नम: ।
श्रीदत्तात्रेयाय नम: ।
ऋषय ऊचु: ।
कथं संकल्पसिद्धि: स्याद्वेदव्यास कलौ युगे ।
धर्मार्थकाममोक्षणां साधनं किमुदाह्रतम्‌ ॥ १ ॥
व्यास उवाच ।
श्रृण्वन्तु ऋषय: सर्वे शीघ्रं संकल्पसाधनम्‌ ।
सकृदुच्चारमात्रेण भोगमोक्षप्रदायकम्‌ ॥ २ ॥
गौरीश्रृङ्गे हिमवत: कल्पवृक्षोपशोभितम्‌ ।
दीप्ते दिव्यमहारत्नहेममण्डपमध्यगम्‌ ॥ ३ ॥
रत्नसिंहासनासीनं प्रसन्नं परमेश्वरम्‌ ।
मन्दस्मितमुखाम्भोजं शङ्करं प्राह पार्वती॥ ४ ॥
श्रीदेव्युवाच
देवदेव महादेव लोकशङ्कर शङ्कर ।
मन्त्रजालानि सर्वाणि यन्त्रजालानि कृत्स्नश: ॥ ५ ॥
तन्त्रजालान्यनेकानि मया त्वत्त: श्रुतानि वै ।
इदानीं द्रष्टुमिच्छामि विशेषेण महीतलम्‌ ॥ ६ ॥
इत्युदीरितमाकर्ण्य पार्वत्या परमेश्वर: ।
करेणामृज्य संतोषात्पार्वतीं प्रत्यभाषत ॥ ७ ॥
मयेदानीं त्वया सार्धं वृषमारुह्य गम्यते ।
इत्युक्त्वा वृषमारुह्य पार्वत्या सह शङ्कर: ॥ ८ ॥
ययौ भूमण्डलं द्रष्टुं गौर्याश्चित्राणि दर्शयन्‌ ।
क्वचिद्‌ विन्ध्याचलप्रान्ते महारण्ये सुदुर्गमे ॥ ९ ॥
तत्र व्याहन्तुमायान्तं भिल्लं परशुधारिणम्‌ ।
वध्यमानं महाव्याघ्रं नखदंष्ट्राभिरावृतम्‌ ॥ १० ॥
अतीव चित्रचारित्र्यं वज्रकायसमायुतम्‌ ।
अप्रयत्नमनायासमखिन्नं सुखमास्थितम्‌ ॥ ११ ॥
पलायन्तं मृगं पश्चाद्‌ व्याघ्रो भीत्या पलायित: ।
एतदाश्चर्यमालोक्य पार्वती प्राह शङ्करम्‌ ॥ १२ ॥
पार्वत्युवाच
किमाश्चर्यं किमाश्चर्यमग्ने शम्भो निरीक्ष्यताम्‌ ।
इत्युक्त: स तत: शम्भूर्दृष्ट्‌वा प्राह पुराणवित्‌ ॥ १३ ॥
श्रीशङ्कर उवाच
गौरि वक्ष्यामि ते चित्रमवाङ्मनसगोचरम्‌ ।
अदृष्टपूर्वमस्माभिर्नास्ति किञ्चिन्न कुत्रचित्‌ ॥ १४ ॥
मया सम्यक्‌ समासेन वक्ष्यते श्रृणु पार्वति ।
अयं दूरश्रवा नाम भिल्ल: परमधार्मिक: ॥ १५ ॥
समित्कुशप्रसूनानि कन्दमूलफलादिकम्‌ ।
प्रत्यहं विपिनं गत्वा समादाय प्रयासत: ॥ १६ ॥
प्रिये पूर्वं मुनीन्द्रेभ्य: प्रयच्छति न वाञ्छति ।
तेऽपि तस्मिन्नपि दयां कुर्वते सर्वमौनिन: ॥ १७ ॥
दलादनो महायोगी वसन्नेव निजाश्रमे ।
कदाचिदस्मरत्‌ सिद्धम दत्तात्रेयं दिगम्बरम्‌ ॥ १८ ॥
दत्तात्रेय: स्मर्तृगामी चेतिहासं परीक्षितुम‌ ।
तत्क्षणात्सोऽपि योगीन्द्रो दत्तात्रेय: समुत्थित: ॥ १९ ॥
तं दृष्ट्वाऽऽश्चर्यतोषाभ्यां दलादनमहामुनि: ।
सम्पूज्याग्रे निषीदन्तं दत्तात्रेयमुवाच तम्‍ ॥ २० ॥
मयोपहूत: सम्प्राप्तो दत्तात्रेय महामुने ।
स्मर्तृगामी त्वमित्येतत्‌ किंवदन्तीं परीक्षितुम्‌ ॥ २१ ॥
मयाद्य संस्मृतोऽसि त्वमपराधं क्षमस्व मे ।
दत्तात्रेयो मुनिं प्राह मम प्रकृतिरीदृशी ॥ २२ ॥
अभक्त्या वा सुभक्त्या वा य: स्मरेन्मामनन्यधी: ।
तदानीं तमुपागत्य ददामि तदभीप्सितम्‌ ॥ २३ ॥
दत्तात्रेयो मुनि: प्राह दलादनमुनीश्वरम्‌ ।
यदिष्टं तद्‌ वृणीष्व त्वं यत्‌ प्राप्तोऽहं त्वया स्मृत: ॥ २४ ॥
दत्तात्रेयं मुनि: प्राह मया किमपि नोच्यते ।
त्वच्चित्ते यत्स्थितं तन्मे प्रयच्छ मुनिपुङ्गव ॥ २५ ॥
ममास्ति वज्रकवचं गृहाणेत्यवदन्मुनिम्‌ ।
तथेत्यङ्गिकृतवते दलादमुनये मुनि: ॥ २६ ॥
स्ववज्रकवचं प्राह ऋषिच्छन्द:पुर:सरम्‌ ।
न्यासं ध्यानं फलं तत्र प्रयोजनमशेषत: ॥ २७ ॥
अथ विनियोगादि :
अस्य श्रीदत्तात्रेयवज्रकवचस्तोत्रमन्त्रस्य किरातरूपी महारुद्र ऋषि:, अनुष्टप्‌ छन्द:,
श्रीदत्तात्रेयो देवता, द्रां बीजम्‌, आं शक्ति:, क्रौं कीलकम्‌, ॐ आत्मने नम: ।
ॐ द्रीं मनसे नम: । ॐ आं द्रीं श्रीं सौ: ॐ क्लां क्लीं क्लूं क्लैं क्लौं क्ल: ।
श्रीदत्तात्रेयप्रसादसिद्‌ध्यर्थे जपे विनियोग: ॥ ॐ द्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नम: ।
ॐ द्रीं तर्जनीभ्यां नम: । ॐ द्रूं मध्यमाभ्यां नम: ।
ॐ द्रैं अनामिकाभ्यांनम: । ॐ द्रौं कनिष्ठिकाभ्यांनम: ।
ॐद्र: करतलकरपृष्ठाभ्यां नम: । ॐ द्रां ह्रदयाय नम: । ॐ द्रीं शिरसे स्वाहा ।
ॐ द्रूं शिखायै वषट्‌ । ॐ द्रैं कवचाय हुम्‌ । ॐ द्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्‍ ।
ॐ द्र: अस्त्राय फट्‍ । ॐ भूर्भुव:स्वरोम्‍ इरि दिग्बन्ध: ।
अथ ध्यानम्‍
जगदङ्कुरकन्दाय सच्चिदानन्दमूर्तये ।
दत्तात्रेयाय योगीन्द्रचन्द्राय परमात्मने (नम:) ॥ १ ॥
कदा योगी कदा भोगी कदा नग्न: पिशाचवत्।
दत्तात्रेयो हरि: साक्षाद्‍ भुक्तिमुक्तिप्रदायक: ॥ २ ॥
वाराणसीपुरस्नायी कोल्हापुरजपादर:
माहुरीपुरभिक्षाशी सह्यशायी दिगम्बर: ॥ ३ ॥
इन्द्रनीलसमाकारश्चन्द्रकान्तसमद्युति: ।
वैदुर्यसदृशस्फूर्तिश्चलत्किञ्चिज्जटाधर: ॥ ४ ॥
स्निग्धधावल्ययुक्ताक्षोऽत्यन्तनीलकनीनिक: ।
भ्रूवक्ष:श्मश्रुनीलाङ्क: शशाङ्कसदृशानन: ॥ ५ ॥
हासनिर्जितनीहार: कण्ठनिर्जितकम्बुक: ।
मांसलांसो दीर्घबाहु: पाणिनिर्जितपल्लव: ॥ ६ ॥
विशालपीनवक्षाश्च ताम्रपाणिर्दरोदर: ।
पृथुलश्रोणिललितो विशालजघनस्थल: ॥ ७ ॥
रम्भास्तम्भोपमानोरूर्जानुपूर्वैकजंघक: ।
गूढगुल्फ: कूर्मपृष्ठो लसत्पादोपरिस्थल: ॥ ८ ॥
रक्तारविन्दसदृशरमणीयपदाधर: ।
चर्माम्बरधरो योगी स्मर्तृगामी क्षणे क्षणे ॥ ९ ॥
ज्ञानोपदेशनिरतो विपद्धरनदीक्षित: ।
सिद्धासनसमासीन ऋजुकायो हसन्मुख: ॥ १० ॥
वामह्स्तेन वरदो दक्षिणेनाभयंकर: ।
बालोन्मत्तपिशाचीभि: क्वचिद्युक्त: परीक्षित: ॥ ११ ॥
त्यागी भोगी महायोगी नित्यानन्दो निरञ्जन: ।
सर्वरूपी सर्वदाता सर्वग: सर्वकामद: ॥१२॥
भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गो महापातकनाशन: ।
भुक्तिप्रदो मुक्तिदाता जीवन्मुक्तो न संशय: ॥ १३ ॥
एवं ध्यात्वाऽनन्यचित्तो मद्वज्रकवचं पठेत्।
मामेव पश्यन्सर्वत्र स मया सह संचरेत् ॥ १४ ॥
दिगम्बरं भस्मसुगन्धलेपनं चक्रं त्रिशूलम डमरुं गदायुधम् ।
पद्‌मासनं योगिमुनीन्द्रवन्दितं दत्तेति नामस्मरेणन नित्यम् ॥ १५ ॥
अथ पञ्चोपचारपूजा
ॐ नमो भगवते दत्तात्रेयाय लं पृथिवीगन्धतन्मात्रात्मकं चन्दनं परिकल्पयामि ।
ॐ नमो भगवते दत्तात्रेयायं हं आकाशशब्दतन्मात्रात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि ।
ॐ नमो भगवते दत्तात्रेयाय यं वायुस्पर्शतन्मात्रात्मकं धूपं परिकल्पयामि ।
ॐ नमो भगवते दत्तात्रेयाय रं तेजोरूपतन्मात्रात्मकं दीपं परिकल्पयामि ।
ॐ नमोभगवते दत्तात्रेयाय वं अमृतरसत्नमात्रात्मकं नैवेद्यं परिकल्पयामि ।
ॐ द्रां’ इति मन्त्रम् अष्टोत्तरशतवारं (१०८) जपेत्।)
अथ वज्रकवचम्‍
ॐ दत्तात्रेय: शिर: पातु सहस्त्राब्जेषु संस्थित: ।
भालं पात्वानसूयेयश्चन्द्रमण्डलमध्यग: ॥ १ ॥
कूर्चं मनोमय: पातु हं क्षं द्विदलपद्मभू: ।
ज्योतीरूपोऽक्षिणी पातु पातु शब्दात्मक: श्रुती ॥ २ ॥
नासिकां पातु गन्धात्मा मुखं पातु रसात्मक: ।
जिह्वां वेदात्मक: पातु दन्तोष्ठौ पातु धार्मिक: ॥३॥
कपोलावत्रिभू: पातु पात्वशेषं ममात्मवित्।
स्वरात्मा षोडशाराब्जस्थित: स्वात्माऽवताद्ग्लम्॥४॥
स्कन्धौ चन्द्रानुज: पातु भुजौ पातु कृतादिभू: ।
जत्रुणी शत्रुजित्‍ पातु पातु वक्ष:स्थलं हरि: ॥५॥
कादिठान्तद्वादशारपद्म्गो मरुदात्मक: ।
योगीश्वरेश्वर: पातु ह्रदयं ह्रदयस्थित: ॥ ६ ॥
पार्श्वे हरि: पार्श्ववर्ती पातु पार्श्वस्थित: स्मृत: ।
हठयोगादियोगज्ञ: कुक्षी पातु कृपानिधि: ॥७॥
डकारादिफकारान्तदशारसरसीरुहे ।
नाभिस्थले वर्तमानो नाभिं वह्वयात्मकोऽवतु ॥८॥
वह्नितत्त्वमयो योगी रक्षतान्मणिपूरकम्।
कटिं कटिस्थब्रह्माण्डवासुदेवात्मकोऽवतु ॥९॥
बकारादिलकारान्तषट्प्त्राम्बुजबोधक: ।
जलतत्त्वमयो योगी स्वाधिष्ठानं ममावतु ॥ १० ॥
सिद्धासनसमासीन ऊरू सिद्धेश्वरोऽवतु ।
वादिसान्तचतुष्पत्रसरोरुहनिबोधक: ॥ ११ ॥
मूलाधारं महीरूपो रक्षताद्वीर्यनिग्रही ।
पृष्ठं च सर्वत: पातु जानुन्यस्तकराम्बुज: ॥१२॥
जङ्घे पत्ववधूतेन्द्र: पात्वङ्घ्री तीर्थपावन; ।
सर्वाङ्गं पातु सर्वात्मा रोमाण्यवतु केशव: ॥१३॥
चर्म चर्माम्बर: पातु रक्तं भक्तिप्रियोऽवतु ।
मांसं मांसकर: पातु मज्जां मज्जात्मकोऽवतु ॥१४॥
अस्थीनि स्थिरधी: पायान्मेधां वेधा: प्रपालयेत्।
शुक्रं सुखकर: पातु चित्तं पातु दृढाकृति: ॥ १५॥
मनोबुद्धिमहंकारम ह्रषीकेशात्मकोऽवतु ।
कर्मेन्द्रियाणि पात्वीश: पातु ज्ञानेन्द्रियाण्यज: ॥१६॥
बन्धून‍ बन्धूत्तम: पायाच्छत्रुभ्य: पातु शत्रुजित्
गृहारामधनक्षेत्रपुत्रादीञ्छ्ङ्करोऽवतु ॥१७॥
भार्यां प्रकृतिवित्पातु पश्वादीन्पातु शार्ङ्गभृत् ।
प्राणान्पातु प्रधानज्ञो भक्ष्यादीन्पातु भास्कर: ॥१८॥
सुखं चन्द्रात्मक: पातु दु:खात्पातु पुरान्तक: ।
पशून्पशुपति: पातु भूतिं भुतेश्वरो मम ॥१९॥
प्राच्यां विषहर: पातु पात्वाग्नेय्यां मखात्मक: ।
याम्यां धर्मात्मक: पतु नैऋत्यां सर्ववैरिह्रत्।२०॥
वराह: पातु वारुण्यां वायव्यां प्राणदोऽवतु ।
कौबेर्यां धनद: पातु पात्वैशान्यां महागुरु: ॥२१॥
ऊर्ध्व पातु महासिद्ध: पात्वधस्ताज्जटाधर: ।
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं रक्षत्वादिमुनीश्वर: ॥२२॥

ॐ द्रां’ मन्त्रजप:, ह्रदयादिन्यास: च ।एतन्मे वज्रकवचं य: पठेच्छृणुयादपि ।
वज्रकायश्चिरञ्जीवी दत्तात्रेयोऽहमब्रुवम्॥२३॥
त्यागी भोगी महायोगी सुखदु:खविवर्जित: ।
सर्वत्रसिद्धसंकल्पो जीवन्मुक्तोऽथ वर्तते ॥२४॥
इत्युक्त्वान्तर्दधे योगी दत्तात्रेयो दिगम्बर: ।
दलादनोऽपि तज्जप्त्वा जीवन्मुक्त: स वर्तते ॥ २५ ॥
भिल्लो दूरश्रवा नाम तदानीं श्रुतवानिदम्।
सकृच्छ्र्वणमात्रेण वज्राङ्गोऽभवदप्यसौ ॥२६॥
इत्येतद्वज्रकवचं दत्तात्रेयस्य योगिन: ।
श्रुत्वाशेषं शम्भुमुखात्‍ पुनरप्याह पार्वती ॥२७॥
पार्वत्युवाच
एतत्कवचमाहात्म्यम वद विस्तरतो मम ।
कुत्र केन कदा जाप्यं किं यज्जाप्यं कथं कथम्॥२८॥
उवाच शम्भुस्तत्सर्वं पार्वत्या विनयोदितम्।
श्रीशिव उवाच
श्रृणु पार्वति वक्ष्यामि समाहितमनविलम्॥२९॥
धर्मार्थकाममोक्षणामिदमेव परायणम् ।
हस्त्यश्वरथपादातिसर्वैश्वर्यप्रदायकम्॥३०॥
पुत्रमित्रकलत्रादिसर्वसन्तोषसाधनम् ।
वेदशास्त्रादिविद्यानां निधानं परमं हि तत्॥३१॥
सङ्गितशास्त्रसाहित्यसत्कवित्वविधायकम्।
बुद्धिविद्यास्मृतिप्रज्ञामतिप्रौढिप्रदायकम्॥३२॥
सर्वसंतोषकरणं सर्वदु:खनिवारणम् ।
शत्रुसंहारकं शीघ्रं यश:कीर्तिविवर्धनम् ॥३३॥
अष्टसंख्या: महारोगा: सन्निपातास्त्रयोदश ।
षण्णवत्यक्षिरोगाश्च विंशतिर्मेहरोगका: ॥३४॥
अष्टादश तु कुष्ठानि गुल्मान्यष्टविधान्यपि ।
अशीतिर्वातरोगाश्च चत्वारिंशत्तु पैत्तिका: ॥३५॥
विंशति: श्लेष्मरोगाश्च क्षयचातुर्थिकादय: ।
मन्त्रयन्त्रकुयोगाद्या: कल्पतन्त्रादिनिर्मिता: ॥३६॥
ब्रह्मराक्षसवेतालकूष्माण्डादिग्रहोद्भनवा: ।
संगजा देशकालस्थास्तापत्रयसमुत्थिता: ॥३७ ॥
नवग्रहसमुद्भू्ता महापातकसम्भवा: ।
सर्वे रोगा: प्रणश्यन्ति सहस्त्रावर्तनाद्ध्रु वम्॥ ३८ ॥
अयुतावृत्तिमात्रेण वन्ध्या पुत्रवती भवेत्।
अयुतद्वितयावृत्त्या ह्यपमृत्युजयो भवेत्॥३९॥
अयुतत्रितयाच्चैव खेचरत्वं प्रजायते ।
सहस्त्रादयुतादर्वाक्‍ सर्वकार्याणि साधयेत्॥४०॥
लक्षावृत्त्या कार्यसिद्धिर्भवत्येव न संशय: ॥४१॥
विषवृक्षस्य मूलेषु तिष्ठन्‍ वै दक्षिणामुख: ।
कुरुते मासमात्रेण वैरिणं विकलेन्द्रियम्॥४२॥
औदुम्बरतरोर्मूले वृद्धिकामेन जाप्यते ।
श्रीवृक्षमूले श्रीकामी तिन्तिणी शान्तिकर्मणि ॥४३॥
ओजस्कामोऽश्वत्थमूले स्त्रीकामै: सहकारके ।
ज्ञानार्थी तुलसीमूले गर्भगेहे सुतार्थिभि: ॥४४॥
धनार्थिभिस्तु सुक्षेत्रे पशुकामैस्तु गोष्ठके ।
देवालये सर्वकामैस्तत्काले सर्वदर्शितम्॥४५॥
नाभिमात्रजले स्थित्वा भानुमालोक्य यो जपेत्।
युद्धे वा शास्त्रवादे वा सहस्त्रेन जयो भवेत्॥४६॥
कण्ठमात्रे जले स्थित्वा यो रात्रौ कवचं पठेत्।
ज्वरापस्मारकुष्ठादितापज्वरनिवारणम्॥४७॥
यत्र यत्स्यात्स्थिरं यद्यत्प्रसक्तं तन्निवर्तते ।
तेन तत्र हि जप्तव्यं तत: सिद्धिर्भवेद्ध्रु वम्॥४८ ॥
इत्युक्तवान्‍ शिवो गौर्ये रहस्यं परमं शुभम्।
य: पठेद्‍ वज्रकवचं दत्तात्रेयसमो भवेत्॥४९॥
एवम शिवेन कथितं हिमवत्सुतायै।
प्रोक्तं दलादमुनयेऽत्रिसुतेन पूर्वम्।
य: कोऽपि वज्रकवचं पठतीह लोके
दत्तोपमश्र्चरति योगिवरश्र्चिरायु: ॥५०॥
||इति श्रीरुद्रयामले हिमवत्खण्डे मन्त्रशास्त्रे उमामहेश्वरसंवादे
श्रीदत्तात्रेयवज्रकवचस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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