Tuesday, June 30, 2015

श्रीविद्या साधना की प्रमाणिकता एवं प्राचीनता


तीसरे महाविद्या के रूप में श्री विद्या महा त्रिपुरसुन्दरी, षोडशी, ललित, कामेश्वरी नमो से विख्यात हैं, देवी अत्यंत मनोहर तथा सुन्दर रूप वाली सोलह वर्षीय कन्या रूप में विद्यमान हैं ।

**श्रीविद्या साधना की प्रमाणिकता एवं
प्राचीनता
जिस प्रकार अपौरूषेय वेदों की प्रमाणिकता है
उसी प्रकार
शिव प्रोक्त होने से आगमशास्त्र (तंत्र)
की भी प्रमाणिकता है। सूत्ररूप (सूक्ष्म
रूप) में वेदों में ,
एवं विशद्रूप से तंत्र-शास्त्रों में
श्रीविद्या साधना का विवेचन है।
शास्त्रों में श्रीविद्या के बारह उपासक बताये गये है-
मनु ,
चन्द्र , कुबेर, लोपामुद्रा , मन्मथ, अगस्त्य अग्नि , सूर्य ,
इन्द्र , स्कन्द, शिव और दुर्वासा ये श्रीविद्या के द्वादश
उपासक है।
श्रीविद्या के उपासक आचार्यो में दत्तात्रय , परशुराम,
ऋषि अगस्त , दुर्वासा , आचार्य गौडपाद ,
आदिशंकराचार्य , पुण्यानंद नाथ, अमृतानन्द नाथ,
भास्कराय , उमानन्द नाथ प्रमुख है।
इस प्रकार श्रीविद्या का अनुष्ठान चार भगवत्
अवतारों दत्तात्रय, श्री परशुराम, भगवान
ह्यग्रीव और
आद्यशंकराचार्य ने किया है। श्रीविद्या साक्षात्
ब्रह्मविद्या है।
श्रीविद्या साधना
समस्त ब्रह्मांड प्रकारान्तर से
शक्ति का ही रूपान्तरण
है। सारे जीव-निर्जीव , दृश्य-अदृश्य ,
चल-अचल
पदार्थो और उनके समस्त क्रिया कलापों के मूल में
शक्ति ही है। शक्ति ही उत्पत्ति ,
संचालन और संहार
का मूलाधार है।
जन्म से लेकर मरण तक सभी छोटे-बड़े कार्यो के मूल
में
शक्ति ही होती है।
शक्ति की आवश्यक मात्रा और उचित
उपयोग ही मानव जीवन में
सफलता का निर्धारण
करती है, इसलिए शक्ति का अर्जन और
उसकी वृद्धि ही मानव की मूल
कामना होती है। धन ,
सम्पत्ति , समृद्धि , राजसत्ता , बुद्धि बल , शारीरिक
बल ,
अच्छा स्वास्थ्य, बौद्धिक क्षमता , नैतृत्व
क्षमता आदि ये सब शक्ति के ही विभिन्न रूप है। इन
में
असन्तुलन होने पर अथवा किसी एक
की अतिशय
वृद्धि मनुष्य के विनाश का कारण बनती है। सर्वाधिक
महत्वपूर्ण तथ्य है
कि शक्ति की प्राप्ति पूर्णता का प्रतीक
नहीं है, वरन्
शक्ति का सन्तुलित मात्रा में होना ही पूर्णता है।
शक्ति का सन्तुलन विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।
वहीं इसका असंतुलन विनाश का कारण बनता है।
समस्त
प्रकृति पूर्णता और सन्तुलन के सिद्धांत पर कार्य
करती है।
मनुष्य के पास प्रचुर मात्र में केवल धन
ही हो तो वह
धीरे-धीरे विकारों का शिकार होकर वह ऐसे
कार्यों में लग
जायेगा जो उसके विनाश का कारण बनेगें। इसी प्रकार
यदि मनुष्य के पास केवल ज्ञान हो तो वह केवल चिन्तन
और विचारों में उलझकर योजनाएं बनाता रहेगा। साधनों के
अभाव में योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो पायेगा।
यदि मनुष्य में असिमित शक्ति हो तो वह
अपराधी या राक्षसी प्रवृत्ति का हो जायेगा।
इसका परिणाम विनाश ही है।
जीवन के विकास और उसे सुन्दर बनाने के लिये धन-
ज्ञान
और शक्ति के बीच संतुलन आवश्यक है।
श्रीविद्या-
साधना वही कार्य करती है,
श्रीविद्या-साधना मनुष्य
को तीनों शक्तियों की संतुलित मात्रा प्रदान
करती है और
उसके लोक परलोक दोनों सुधारती है।
जब मनुष्य में शक्ति संतुलन होता है तो उसके विचार
पूर्णतः पॉजिटिव (सकारात्मक , धनात्मक) होते है। जिससे
प्रेरित कर्म शुभ होते है और शुभ कर्म ही मानव के
लोक-
लोकान्तरों को निर्धारित करते है तथा मनुष्य सारे भौतिक
सुखों को भोगता हुआ मोक्ष प्राप्त करता है।
श्रीविद्या-साधना ही एक मात्र
ऐसी साधना है
जो मनुष्य के जीवन में संतुलन स्थापित
करती है। अन्य
सारी साधनाएं असंतुलित या एक तरफा शक्ति प्रदान
करती है। इसलिए कई तरह की साधनाओं
को करने के बाद
भी हमें साधकों में न्यूनता (कमी) के दर्शन
होते है। वे कई
तरह के अभावों और संघर्ष में दुःखी जीवन
जीते हुए
दिखाई देते है और इसके परिणाम स्वरूप जन सामान्य के
मन में साधनाओं के प्रति अविश्वास और भय का जन्म
होता है और वह साधनाओं से दूर भागता है। भय और
अविश्वास के अतिरिक्त योग्य गुरू का अभाव , विभिन्न
यम-नियम-संयम , साधना की सिद्धि में लगने
वाला लम्बा समय और कठिन परिश्रम भी जन सामान्य
को साधना क्षेत्र से दूर करता है। किंतु श्रीविद्या-
साधना की सबसे बड़ी विशेषता यह है
कि वह अत्यंत
सरल , सहज और शीघ्र फलदायी है।
सामान्य जन अपने
जीवन में बिना भारी फेरबदल के सामान्य
जीवन जीते हुवे
भी सुगमता पूर्वक साधना कर लाभान्वित हो सकते है।
परम पूज्य गुरूदेव डॉ. सर्वेश्वर शर्मा ने
चमत्कारी शीघ्र
फलदायी श्रीविद्या-साधना को जनसामान्य तक
पहुचाने
के लिए विशेष शोध किये और कई निष्णात विद्ववानों,
साधकों और सन्यासियों से वर्षो तक विचार-विमर्श और
गहन अध्ययन चिंतन के बाद यह विधि खोज
निकाली जो जनसामान्य को सामान्य जीवन
जीते हुए
अल्प प्रयास से ही जीवन में सकारात्मक
परिवर्तन कर
सफलता और समृद्धि प्रदान करती है। गुरूदेव
प्रणीत
श्रीविद्या-साधना जीवन के प्रत्येक क्षे़त्र
नौकरी ,
व्यवसाय , आर्थिक उन्नति , सामाजिक उन्नति ,
पारिवारिक शांति , दाम्पत्य सुख , कोर्ट कचहरी , संतान-
सुख, ग्रह-नक्षत्रदोष शांति में साधक को पूर्ण
सफलता प्रदान करती है। यह साधना व्यक्ति के
सर्वांगिण विकास में सहायक है। कलियुग में
श्रीविद्या की साधना ही भौतिक ,
आर्थिक समृद्धि और
मोक्ष प्राप्ति का साधन है।
श्रीविद्या-साधना के सिद्धांत
संतुलन का सिद्धांत- शक्ति के सभी रूपों में धन-
समृद्धि , सत्ता, बुद्धि, शक्ति , सफलता के क्षेत्र में।
संपूर्णता का सिद्धांत- धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष
की प्राप्ति।
सुलभता का सिद्धांत- मिलने में आसान।
सरलता का सिद्धांत- करने में आसान।
निर्मलता का सिद्धांत- बिना किसी दुष्परिणाम के
साधना।
निरंतरता का सिद्धांत- सदा , शाश्वत लाभ और
उन्नति।
सार्वजनिकता का सिद्धांत - हर किसी के लिए
सर्वश्रेष्ठ साधना ।
देवताओं और ऋषियों द्वारा उपासित श्रीविद्या-
साधना वर्तमान समय की आवश्यकता है। यह
परमकल्याणकारी उपासना करना मानव के लिए अत्यंत
सौभाग्य की बात है। आज के युग में
बढ़ती प्रतिस्पर्धा ,
अशांति , सामाजिक असंतुलन और मानसिक तनाव ने
व्यक्ति की प्रतिभा और क्षमताओं को कुण्ठित कर
दिया है। क्या आपने कभी सोचा है
कि हजारों प्रयत्नों के
बाद भी आप वहां तक क्यों नहीं पहुच
पाये
जहां होना आपकी चाहत रही है ?
आप के लिए अब कुछ
भी असंभव नहीं है, चाहें वह सुख-
समृद्धि हो , सफलता ,
शांति ऐश्वर्य या मुक्ति (मोक्ष) हो। ऐसा नहीं कि साधक
के जीवन में विपरीत
परिस्थितियां नहीं आती है।
विपरीत
परिस्थितियां तो प्रकृति का महत्वपूर्ण अंग है। संसार में
प्रकाश है तो अंधकार भी है। सुख-दुःख ,
सही-गलत , शुभ-
अशुभ , निगेटिव-पॉजिटिव , प्लस-मायनस आदि। प्रकाश
का महत्व तभी समझ में आता है जब अंधकार हो।
सुख
का अहसास तभी होता हैं जब दुःख का अहसास
भी हो चुका हो। श्रीविद्या-साधक के
जीवन में भी सुख-
दुःख का चक्र तो चलता है, लेकिन अंतर यह है
कि श्रीविद्या-साधक की आत्मा व मस्तिष्क
इतने
शक्तिशाली हो जाते है कि वह ऐसे कर्म
ही नहीं करता कि उसे दुःख उठाना पड़े किंतु
फिर
भी यदि पूर्व जन्म के संस्कारों , कर्मो के कारण
जीवन में
दुःख संघर्ष है तो वह उन सभी विपरीत
परिस्थितियों से
आसानी से मुक्त हो जाता है। वह अपने
दुःखों को नष्ट
करने में स्वंय सक्षम
औषधे चिंतये विष्णुम(1),भोजने च जनार्दनम(2),
शयने पद्मनाभं च(3), विवाहे च प्रजापतिम(4),
युद्धे चक्रधरम देवं(5), प्रवासे च त्रिविक्रमं(6),
नारायणं तनु त्यागे(7), श्रीधरं प्रिय संगमे(8),
दुःस्वप्ने स्मर गोविन्दम(9),संकटे मधुसूधनम(10),
कानने नारासिम्हम च(11),पावके जलाशयिनाम(12),
जलमध्ये वराहम च(13), पर्वते रघु नन्दनं(14),
गमने वामनं चैव(15), सर्व कार्येशु माधवं(16).
षोडशैतानी नमानी प्रातरुत्थाय यह पठेत
सर्वपापा विर्निमुक्तो विष्णुलोके महीयते

श्रीविद्या  त्रिपुरसुन्दरी साधना

श्रीविद्या साधना भारतवर्ष की परम रहस्यमयी सर्वोत्कृष्ट साधना प्रणाली मानी जाती है। ज्ञान, भक्ति, योग, कर्म आदि समस्त साधना प्रणालियों का समुच्चय (सम्मिलित रूप) ही श्रीविद्या-साधना है। जिस प्रकार अपौरूषेय वेदों की प्रमाणिकता है उसी प्रकार शिव प्रोक्त होने से आगमशास्त्र (तंत्र) की भी प्रमाणिकता है। सूत्ररूप (सूक्ष्म रूप) में वेदों में, एवं विशद्रूप से तंत्र-शास्त्रों में श्रीविद्या साधना का विवेचन है।
शास्त्रों में श्रीविद्या के बारह उपासक बताये गये है- मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्त्य अग्नि, सूर्य, इन्द्र, स्कन्द, शिव और दुर्वासा ये श्रीविद्या के द्वादश उपासक है। श्रीविद्या के उपासक आचार्यो में दत्तात्रय, परशुराम, ऋषि अगस्त, दुर्वासा, आचार्य गौडपाद, आदिशंकराचार्य, पुण्यानंद नाथ, अमृतानन्द नाथ, भास्कराय, उमानन्द नाथ प्रमुख है। इस प्रकार श्रीविद्या का अनुष्ठान चार भगवत् अवतारों दत्तात्रय, श्री परशुराम, भगवान ह्यग्रीव और आद्यशंकराचार्य ने किया है। श्रीविद्या साक्षात् ब्रह्मविद्या है।
समस्त ब्रह्मांड प्रकारान्तर से शक्ति का ही रूपान्तरण है। सारे जीव-निर्जीव, दृश्य-अदृश्य, चल-अचल पदार्थो और उनके समस्त क्रिया कलापों के मूल में शक्ति ही है। शक्ति ही उत्पत्ति, संचालन और संहार का मूलाधार है। जन्म से लेकर मरण तक सभी छोटे-बड़े कार्यो के मूल में शक्ति ही होती है। शक्ति की आवश्यक मात्रा और उचित उपयोग ही मानव जीवन में सफलता का निर्धारण करती है, इसलिए शक्ति का अर्जन और उसकी वृद्धि ही मानव की मूल कामना होती है। धन, सम्पत्ति, समृद्धि, राजसत्ता, बुद्धि बल, शारीरिक बल, अच्छा स्वास्थ्य, बौद्धिक क्षमता, नैतृत्व क्षमता आदि ये सब शक्ति के ही विभिन्न रूप है। इन में असन्तुलन होने पर अथवा किसी एक की अतिशय वृद्धि मनुष्य के विनाश का कारण बनती है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य है कि शक्ति की प्राप्ति पूर्णता का प्रतीक नहीं है, वरन् शक्ति का सन्तुलित मात्रा में होना ही पूर्णता है। शक्ति का सन्तुलन विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। वहीं इसका असंतुलन विनाश का कारण बनता है। समस्त प्रकृति पूर्णता और सन्तुलन के सिद्धांत पर कार्य करती है। जीवन के विकास और उसे सुन्दर बनाने के लिये धन-ज्ञान और शक्ति के बीच संतुलन आवश्यक है। श्रीविद्या-साधना वही कार्य करती है, श्रीविद्या-साधना मनुष्य को तीनों शक्तियों की संतुलित मात्रा प्रदान करती है और उसके लोक परलोक दोनों सुधारती है।
श्रीविद्या-साधना ही एक मात्र ऐसी साधना है जो मनुष्य के जीवन में संतुलन स्थापित करती है। श्रीविद्या-साधना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अत्यंत सरल, सहज और शीघ्र फलदायी है। सामान्य जन अपने जीवन में बिना भारी फेरबदल के सामान्य जीवन जीते हुवे भी सुगमता पूर्वक साधना कर लाभान्वित हो सकते है। यह साधना व्यक्ति के सर्वांगिण विकास में सहायक है। कलियुग में श्रीविद्या की साधना ही भौतिक, आर्थिक समृद्धि और मोक्ष प्राप्ति का साधन है। देवताओं और ऋषियों द्वारा उपासित श्रीविद्या-साधना वर्तमान समय की आवश्यकता है। यह परमकल्याणकारी उपासना करना मानव के लिए अत्यंत सौभाग्य की बात है। आज के युग में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, अशांति, सामाजिक असंतुलन और मानसिक तनाव ने व्यक्ति की प्रतिभा और क्षमताओं को कुण्ठित कर दिया है। श्रीविद्या-साधक के जीवन में भी सुख-दुःख का चक्र तो चलता है, लेकिन अंतर यह है कि श्रीविद्या-साधक की आत्मा व मस्तिष्क इतने शक्तिशाली हो जाते है कि वह ऐसे कर्म ही नहीं करता कि उसे दुःख उठाना पड़े किंतु फिर भी यदि पूर्व जन्म के संस्कारों, कर्मो के कारण जीवन में दुःख संघर्ष है तो वह उन सभी विपरीत परिस्थितियों से आसानी से मुक्त हो जाता है। वह अपने दुःखों को नष्ट करने में स्वंय सक्षम होता है।…

भोग और मोक्ष देती हैं मां त्रिपुरसुंदरी

महात्रिपुर सुन्दरी माहेश्वरी शाक्ति की सबसे मनोहर श्री विग्रह वाली सिद्घ देवी हैं। महात्रिपुर सुन्दरी को श्री विद्या, षोडशी, ललिता, राज-राजेश्वरी, बाला पंचदशी अनेक नामों से जाना जाता है। इनके चारों हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण सुशोभित है। वर देने के लिए सदा-सर्वदा तत्पर भगवती मां का श्रीविग्रह सौम्य और हृदय दया से पूर्ण है। जो इनका आश्रय लेते है, उन्हें इनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इनकी महिमा अवर्णनीय है। संसार के समस्त तंत्र-मंत्र इनकी आराधना करते हैं। प्रसन्न होने पर ये भक्तों को अमूल्य निधियां प्रदान कर देती हैं। चार दिशाओं में चार और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें तंत्र शास्त्रों में ‘पंचवक्त्र’ अर्थात् पांच मुखों वाली कहा गया है। आप सोलह कलाओं से परिपूर्ण हैं, इसलिए इनका नाम ‘षोडशी’ भी है।

एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवजी से पूछा, ‘भगवन! आपके द्वारा वर्णित तंत्र शास्त्र की साधना से जीव के आधि-व्याधि, शोक संताप, दीनता-हीनता तो दूर हो जाएगी, किन्तु गर्भवास और मरण के असह्य दुख की निवृति और मोक्ष पद की प्राप्ति का कोई सरल उपाय बताइये।’ तब पार्वती जी के अनुरोध पर भगवान शिव ने त्रिपुर सुन्दरी श्री विद्या साधना प्रणाली को प्रकट किया। ‘‘भैरवयामल और शक्ति लहरी’’ में आपकी उपासना का विस्तृत वर्णन मिलता है। ऋषि दुर्वासा आपके परम आराधक थे। आपकी उपासना ‘‘श्री चक्र’’ में होती है। आदि गुरू शंकरचार्य ने भी सौन्दर्य लहरी में त्रिपुर सुन्दरी श्री विद्या की स्तुति की है। भगवती के आशीर्वाद से साधक को भोग और मोक्ष दोनों सहज उपलब्ध हो जाते हैं।

महात्रिपुर सुन्दरी श्री कुल की विद्या है। महाविद्या समुदाय में त्रिपुरा नाम की अनेक देवियां हैं, जिनमें त्रिपुरा-भैरवी, त्रिपुरा और त्रिपुर सुंदरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। देवी त्रिपुरसुंदरी ब्रह्मस्वरूपा हैं, भुवनेश्वरी विश्वमोहिनी हैं। ये श्रीविद्या, षोडशी, ललिता, राज-राजेश्वरी, बाला पंचदशी अनेक नामों से जानी जाती हैं। त्रिपुरसुंदरी का शक्ति-संप्रदाय में असाधारण महत्त्व है। महात्रिपुर सुन्दरी देवी माहेश्वरी शाक्ति की सबसे मनोहर श्री विग्रह वाली सिद्घ देवी हैं।

इनकी महिमा अवर्णनीय है। संसार के समस्त तंत्र-मंत्र इनकी आराधना करते हैं। प्रसन्न होने पर ये भक्तों को अमूल्य निधियां प्रदान कर देती हैं। चार दिशाओं में चार और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें तंत्र शास्त्रों में ‘पंचवक्त्र’ अर्थात् पांच मुखों वाली कहा गया है। आप सोलह कलाओं से परिपूर्ण हैं, इसलिए इनका नाम ‘षोडशी’ भी है।

ये चार पायों से युक्त हैं जिनके नीचे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर पाया बन जिस सिंहासन को अपने मस्तक पर विराजमान किए हैं उसके ऊपर सदा शिव लेटे हुए हैं और उनकी नाभी से एक कमल जो खिलता है, उस पर ये त्रिपुरा विराजमान हैं। सैकड़ों पूर्वजन्म के पुण्य प्रभाव और गुरु कृपा से इनका मंत्र मिल पाता है। किसी भी ग्रह, दोष, या कोई भी अशुभ प्रभाव इनके भक्त पर नहीं हो पाता। श्रीयंत्र का पूजन सभी के वश की बात नहीं है।

कलिका पुराण के अनुसार एक बार पार्वती जी ने भगवान शंकर से पूछा, ‘भगवन! आपके द्वारा वर्णित तंत्र शास्त्र की साधना से जीव के आधि-व्याधि, शोक संताप, दीनता-हीनता तो दूर हो जाएगी, किन्तु गर्भवास और मरण के असह्य दुख की निवृत्ति और मोक्ष पद की प्राप्ति का कोई सरल उपाय बताइए।’

तब पार्वती जी के अनुरोध पर भगवान शंकर ने त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या साधना-प्रणाली को प्रकट किया। "भैरवयामल और शक्तिलहरी" में त्रिपुर सुन्दरी उपासना का विस्तृत वर्णन मिलता है। ऋषि दुर्वासा आपके परम आराधक थे। इनकी उपासना "श्री चक्र" में होती है। आदिगुरू शंकरचार्य ने भी अपने ग्रन्थ सौन्दर्यलहरी में त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या की बड़ी सरस स्तुति की है। कहा जाता है भगवती त्रिपुर सुन्दरी के आशीर्वाद से साधक को भोग और मोक्ष दोनों सहज उपलब्ध हो जाते हैं।

शाम सुर्यास्त से एक घंटा पूजा घर में उत्तरमुखी होकर गुलाबी रंग के आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने लकड़ी के पट्टे पर गुलाबी वस्त्र बिछाकर उस पर महात्रिपुर सुन्दरी का चित्र और श्री यंत्र को विराजमान करें। दाएं हाथ में जल लेकर संकल्प करें तत्पश्चात हाथ जोड़कर महात्रिपुर सुन्दरी का ध्यान करें।

ध्यान: सा काली द्विविद्या प्रोक्ता श्यामा रक्ता प्रभेदत:। श्यामा तु दक्षिणा प्रोक्ता रक्ता श्री सुन्दरी मता।।

देवी महात्रिपुर सुन्दरी की विभिन्न प्रकार से पूजा करें। आटे से बना चौमुखी शुद्ध घी का दीपक जलाएं। देवी पर गुलाल चढ़ाएं। देवी पर गुलाब के फूल चढ़ाएं। खुशबूदार धूप जलाएं और इत्र अर्पित करें। काजू व मावे से बने मिष्ठान का भोग लगाएं। तत्पश्चात बाएं हाथ मे कमलगट्टे लेकर दाएं हाथ से स्फटिक की माला से देवी के इस अदभूत मंत्र का यथासंभव जाप करें।

मंत्र: ह्रीं क ए इ ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं ॥

जाप पूरा होने के बाद कमलगट्टे गुलाबी कपड़े मे बांधकर घर की उत्तर दिशा में स्थापित करें तथा स्फटिक की माला गले में पहन लें। बची हुई सामग्री को जल प्रवाह कर दें। इस साधना से धन, सुख, वैभव और सर्व ऐश्वर्य प्राप्त होता है तथा सर्व मनोकामनाएंं पूर्ण होती हैं।







तीसरे महाविद्या के रूप में श्री विद्या महा त्रिपुरसुन्दरी, षोडशी, ललित, कामेश्वरी नमो से विख्यात हैं, देवी अत्यंत मनोहर तथा सुन्दर रूप वाली सोलह वर्षीय कन्या रूप में विद्यमान हैं ।
श्री विद्या, महा त्रिपुरसुन्दरी

श्री विद्या, महा त्रिपुरसुन्दरी
महाविद्याओं में तीसरी श्री विद्या महा त्रिपुर सुन्दरी, तीनो लोको में सर्व गुण सम्पन्न या सर्व प्रकार से पूर्ण ।
आद्या शक्ति माँ, अपने तीसरे महाविद्या के रूप में श्री विद्या, महा त्रिपुरसुन्दरी के नाम से जानी जाती हैं, देवी अत्यंत सुन्दर रूप वाली सोलह वर्षीय कन्या रूप में विद्यमान हैं । तीनो लोको ( स्वर्ग, पाताल तथा पृथ्वी ) में देवी सर्वाधिक सुन्दर, मनोहर रूप वाली तथा चिर यौवन हैं । देवी आज भी यौवनावस्था धारण की हुई है तथा सोलह कला सम्पन्न है । सोलह अंक जो की पूर्णतः का प्रतिक है (सोलह की संख्या में प्रत्येक तत्व पूर्ण मानी जाती हैं, जैसे १६ आना एक रूपया होता हैं), सोलह प्रकार के कलाओं तथा गुणों से परिपूर्ण, देवी का एक अन्य नाम षोडशी विख्यात हैं । देवी प्रत्येक प्रकार कि मनोकामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं, मुख्यतः सुंदरता तथा यौवन से घनिष्ठ सम्बन्ध होने के परिणामस्वरूप, मोहित कार्य और यौवन स्थाई रखने हेतु, इनकी साधना उत्तम मनी जाती हैं । ये ही धन, संपत्ति, समृद्धि दात्री श्री शक्ति के नाम से भी जानी जाती है, इन्हीं देवी की आराधना कर कमला नाम से विख्यात दसवी महाविद्या, धन, सुख तथा समृद्धि की देवी महा लक्ष्मी हुई । देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध पारलौकिक शक्तियों से हैं, समस्त प्रकार की दिव्य, अलौकिक तंत्र तथा मंत्र शक्तिओ की ये अधिष्ठात्री हैं । तंत्रो में उल्लेखित मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्थम्भन इत्यादि (जादुई शक्ति) या इंद्रजाल विद्या, देवी कि कृपा के बिना पूर्ण नहीं होते हैं ।
योनि पीठ 'कामाख्या', देवी श्री विद्या महा त्रिपुरसुंदरी, षोडशी से सम्बंधित सर्वश्रेष्ठ तंत्र पीठ या तीर्थ ।
काम देव द्वारा सर्वप्रथम तथा समस्त देवताओं द्वारा पूजित देवी की योनि पीठ, कामाख्या नाम से विख्यात हैं । यहाँ शिव पत्नी सती कि योनि गिरी थी, यह आदि काल से ही सिद्धि दायक शक्ति पीठ रहा हैं । यह पीठ नीलाचल पर्वत श्रेणी के ऊपर विद्यमान हैं तथा इस प्रान्त को आदि काल मैं प्रागज्योतिषपुर के नाम से जाना जाता था । आज यहाँ देवी का एक भव्य मंदिर विद्यमान है, जिसे कूचबिहार के राज वंश ने बनवाया था तथा ये भारत वर्ष के असम राज्य में अवस्थित हैं । आदि काल से ही यह पीठ समस्त प्रकार के आगमोक्त तांत्रिक, पारा विद्या तथा गुप्त साधनाओ हेतु श्रेष्ठ माना जाता हैं तथा आदि कल से ही प्रयोग किया जाता हैं । त्रेता तथा द्वापर युग में इस पीठ पर देवी की आराधना नरकासुर करते थे, इस प्रान्त के विभिन्न स्थानों का उल्लेख महाभारत ग्रन्थ से प्राप्त होता हैं । वाराणसी में विद्यमान राज राजेश्वरी मंदिर में देवी राज राजेश्वरी ( तीनो लोको की रानी ) के रूप में पूजिता हैं । कामाक्षी स्वरूप में देवी तमिलनाडु के कांचीपुरम में पूजी जाती हैं । मीनाक्षी स्वरुप में देवी का विशाल तथा भव्य मंदिर तमिलनाडु के मदुरै में हैं । बंगाल के हुगली जिले में बाँसबेरिआ नमक स्थान में देवी हंशेश्वरी नाम से पूजित हैं ।
देवी श्री विद्या त्रिपुरसुन्दरी के स्वरूप का वर्णन ।
महाविद्याओं में तीसरे स्थान पर विद्यमान महा शक्ति त्रिपुर सुंदरी, तीनो लोकों में, सोलह वर्षीय कन्या स्वरूप में सर्वाधिक मनोहर तथा सुन्दर रूप से सुशोभित हैं । देवी का शारीरक वर्ण हजारों उदयमान सूर्य के कांति कि भाति है, देवी की चार भुजाये तथा तीन नेत्र ( त्रि-नेत्रा ) हैं । अचेत पड़े हुए सदाशिव के ऊपर कमल जो सदाशिव के नाभि से निकली है, के आसन पर देवी विराजमान हैं । देवी अपने चार हाथों में पाश, अंकुश, धनुष तथा बाण से सुशोभित है । देवी षोडशी पंचवक्त्र है अर्थार्त देवी के पांच मस्तक या मुख है, चारो दिशाओं में चार तथा ऊपर की ओर एक मुख हैं । देवी के पांचो मस्तक या मुख तत्पुरुष, सद्ध्योजात, वामदेव, अघोर तथा ईशान नमक पांच शिव स्वरूपों के प्रतिक हैं क्रमशः हरा, लाल, धूम्र, नील तथा पीत वर्ण वाली हैं । देवी दस भुजाओ वाली हैं तथा अभय, वज्र, शूल, पाश, खड़ग, अंकुश, टंक, नाग तथा अग्नि धारण की हुई हैं । देवी अनेक प्रकार के अमूल्य रत्नो से युक्त आभूषणो से सुशोभित हैं तथा देवी ने अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण कर रखा हैं । ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा यम देवी के आसन को अपने मस्तक पर धारण करते हैं ।


श्री विद्या, महा त्रिपुर सुंदरी की प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा ।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी त्रिपुरसुंदरी के उत्पत्ति का रहस्य; सती वियोग के पश्चात् भगवान शिव सर्वदा ध्यान मग्न रहते थे । उन्होंने अपने संपूर्ण कर्म का परित्याग कर दिया था, परिणामस्वरूप तीनो लोको के सञ्चालन में व्याधि उत्पन्न हो रही थी । उधर तारकासुर ब्रह्मा जी से वार प्राप्त कर, कि उसकी मृत्यु शिव के पुत्र द्वारा ही होगी । एक प्रकार से अमर हो, तारकासुर ने तीनो लोको पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया, समस्त देवताओं को प्रताड़ित कर स्वर्ग से निकल दिया तथा समस्त भोगो को वो स्वयं ही भोगने लगा । समस्त देवताओ ने भगवान शिव को ध्यान से जगाने हेतु, कामदेव तथा उन की पत्नी रति देवी को कैलाश भेजा । (सती हिमालय राज के यहाँ पुनर्जन्म ली चुकी थी तथा भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिया वो नित्य शिव के सन्मुख जा उन की साधना करती थी ।) काम देव ने कुसुम सर नमक वाण से भगवान शिव पर प्रहार किया, परिणामस्वरूप शिव जी का ध्यान भंग हो गया । देखते ही देखते काम देव, भगवान शिव के तीसरे नेत्र से उत्पन्न क्रोध अग्नि में जल कर भस्म हो गया । तदनंतर भगवान शिव के एक गण द्वारा काम देव के भस्म से मूर्ति निर्मित की गई तथा उस निर्मित मूर्ति से एक परुष का प्राकट्य हुआ । उस प्राकट्य पुरुष ने भगवान शिव कि, अति उत्तम स्तुति की तथा स्तुति से प्रसन्न हो भगवान शिव ने भांड (अच्छा)! भांड! कहा । तदनंतर भगवान शिव द्वारा उस पुरुष का नाम भांड रखा गया तथा तथा उसे ६० हजार वर्षों कर राज दे दिया गया । शिव के क्रोध से उत्पन्न होने के परिणामस्वरूप वो तमो गुण सम्पन्न था तथा वो धीरे धीरे तीनो लोको पर भयंकर उत्पात मचाने लगा ।देवराज इंद्र के राज्य के समान ही, भाण्डासुर ने स्वर्ग जैसे राज्य का निर्माण किया तथा राज करने लगा । तदनंतर, भाण्डासुर ने स्वर्ग लोक पर अपना अधिकार आक्रमण कर देवराज इन्द्र तथा स्वर्ग राज्य को चारो ओर से घेर लिया । भयभीत इंद्र, नारद मुनि के शरण में गए तथा इस समस्या के निवारण हेतु उपाए पूछा । देवर्षि नारद ने, आद्या शक्ति की यथा विधि अपने रक्त तथा मांस से आराधना करने का परामर्श दिया । देवराज इंद्र ने देवर्षि नारद द्वारा बताये हुए साधना पथ का अनुसरण कर, देवी की आराधना की तथा देवी ने त्रिपुरसुंदरी स्वरूप से प्रकट हो भाण्डासुर का वध कर देवराज पर कृपा की तथा समस्त देवताओं को भय मुक्त किया ।

कहा जाता हैं, भण्डासुर तथा देवी त्रिपुर सुंदरी ने अपने चार-चार अवतारी स्वरूपों को युद्ध लड़ने हेतु अवतरित किया । भाण्डासुर ने हिरण्यकश्यप दैत्य का अवतार धारण किया तथा देवी ललित प्रह्लाद स्वरूप में प्रकट हो, हिरण्यकश्यप का वध किया । भाण्डासुर ने महिषासुर का अवतार धारण किया तथा देवी त्रिपुरा, दुर्गा अवतार धारण कर महिषासुर का वध किया । भाण्डासुर, रावण अवतार धारण कर, देवी के नखो द्वारा अवतार धारण करने वाले राम के हाथों मारा गया । अंततः देवी त्रिपुरा ने, भाण्डासुर का वध किया ।
देवी श्री विद्या त्रिपुरसुंदरी से सम्बंधित अन्य तथ्य ।
समस्त तंत्र और मंत्र देवी कि आराधना करते है तथा वेद भी इनकी महिमा करने में असमर्थ हैं । अपने भक्तों के सभी प्रार्थना स्वीकार कर, देवी भक्त के प्रति समर्पित रहती है । भक्त पर प्रसन्न हो देवी सर्वस्व प्रदान करती हैं । देवी की साधना, आराधना योनि रूप में भी की जाती है, देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध काम उत्तेजना से हैं, इस स्वरूप में देवी कामेश्वरी नाम से पूजित हैं ।

देवी काली की समान ही देवी त्रिपुर सुंदरी चेतना से सम्बंधित हैं । देवी त्रिपुरा ब्रह्मा, शिव, रुद्र तथा विष्णु के शव पर आरूढ़ हैं, तात्पर्य, चेतना रहित देवताओं के देह पर देवी चेतना रूप से विराजमान हैं तथा ब्रह्मा, शिव, विष्णु, लक्ष्मी तथा सरस्वती द्वारा पूजिता हैं । कुछ शास्त्रों के अनुसार, देवी कमल के आसन पर भी विराजमान हैं, जो अचेत शिव के नाभि से निकलती हैं तथा शिव, ब्रह्मा, विष्णु तथा यम, चेतना रहित शिव को अपने मस्तक पर धारण किये हुए हैं ।

यंत्रो में श्रेष्ठ श्री यन्त्र या श्री चक्र, साक्षात् देवी त्रिपुरा का ही स्वरूप हैं तथा श्री विद्या या श्री संप्रदाय, पंथ या कुल का निर्माण करती हैं । देवी त्रिपुरा आदि शक्ति हैं, कश्मीर, दक्षिण भारत तथा बंगाल में आदि काल से ही, श्री संप्रदाय विद्यमान हैं तथा देवी अराधना की जाती हैं, विशेषकर दक्षिण भारत में देवी, श्री विद्या नाम से विख्यात हैं । मदुरै में विद्यमान मीनाक्षी मंदिर, कांचीपुरम में विद्यमान कामाक्षी मंदिर, दक्षिण भारत में हैं तथा यहाँ देवी श्री विद्या के रूप में पूजिता हैं । वाराणसी मैं विद्यमान राजराजेश्वरी मंदिर, देवी श्री विद्या से ही सम्बंधित हैं तथा आकर्षण सम्बंधित विद्याओ की प्राप्ति हेतु प्रसिद्ध हैं ।

देवी की उपासना श्री चक्र में होती है, श्री चक्र से सम्बंधित मुख्य शक्ति देवी त्रिपुर सुंदरी ही हैं । देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध गुप्त अथवा परा शक्तियों, विद्याओं से हैं, तन्त्रो की ये अधिष्ठात्री मानी जाती हैं । समस्त प्रकार के तांत्रिक कर्म देवी की कृपा के बिना सफल नहीं होते हैं । तंत्र में वर्णित मरण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तंभन इत्यादि प्रयोगों की देवी अधिष्ठात्री है । आदि काल से ही देवी के पीठ कामाख्या में, समस्त तंत्र साधनाओ का विशेष विधान हैं । देवी आज भी वर्ष में एक बार ऋतु वत्सला होती है जो ३ दिन का होता है, इस काल में असंख्य भक्त तथा साधु, सन्यासी देवी कृपा प्राप्त करने हेतु कामाख्या आते हैं । देवी कि रक्त वस्त्र जो ऋतुस्रव के पश्चात् प्राप्त होता है, प्रसाद के रूप में प्राप्त कर उसे अपनी सुरक्षा हेतु अपने पास रखते हैं । देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध गुप्त अथवा परा शक्तियों, विद्याओं से हैं, तन्त्रो की ये अधिष्ठात्री मानी जाती हैं । समस्त प्रकार के तांत्रिक कर्म देवी की कृपा के बिना सफल नहीं होते हैं ।
यंत्रो में सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वोच्च श्री यन्त्र, से देवी की समरसता ।
श्री यन्त्र
देवी त्रिपुरा या त्रिपुर सुंदरी, श्री यंत्र तथा श्री मंत्र के स्वरूप से समरसता रखती हैं, जो यंत्रो-मंत्रो में सर्वश्रेष्ठ पद पर आसीन हैं, यन्त्र शिरोमणि हैं, देवी साक्षात् श्री चक्र के रूप में यन्त्र के केंद्र में विद्यमान हैं । श्री विद्या के नाम से देवी, एक अलग संप्रदाय का भी निर्माण करती हैं, जो श्री कुल के नाम से विख्यात हैं तथा देवी श्री कुल की अधिष्ठात्री हैं । देवी श्री विद्या, स्थूल, सूक्ष्म तथा परा, तीनो रूपों में 'श्री चक्र' में विद्यमान हैं, चक्र स्वरूपी देवी त्रिपुरा, श्री यन्त्र के केंद्र में निवास करती हैं तथा चक्र ही देवी का अराधना स्थल हैं, चक्र के रूप में देवी श्री विद्या की पूजा आराधना होती हैं । श्री यन्त्र, सर्व प्रकार के कामनाओ को पूर्ण करने की क्षमता रखती हैं, इसे त्रैलोक्य मोहन यन्त्र भी कहाँ जाता हैं । श्री यन्त्र को महा मेरु, नव चक्र के नाम से भी जाना जाता हैं ।

यह यन्त्र देवी लक्ष्मी से भी समरसता रखती हैं, देवी श्री लक्ष्मी जो धन, सौभाग्य, संपत्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं, उन की आराधना श्री यन्त्र के मध्य में होती हैं । सामान्यतः धन तथा सौभाग्य की दात्री होने के परिणामस्वरूप, श्री चक्र में देवी की आराधना, पूजा होती हैं, सामान्य लोगो के पूजा घरों से कुछ विशेष मंदिरों में देवी इसी श्री चक्र के रूप में ही पूजिता हैं । कामाक्षी मंदिर, कांचीपुरम, तमिलनाडु, अम्बाजी मंदिर, गब्बर पर्वत, गुजरात (सती पीठो), देवी की पूजा श्री चक्र के रूप में ही होती हैं । शास्त्रों में यंत्रो को देवताओं का स्थूल देह माना गया हैं, श्री यन्त्र की मान्यता सर्वप्रथम यन्त्र के से भी हैं, यह सर्वरक्षा कारक, सौभाग्य प्रदायक, सर्व सिद्धि प्रदायक तथा सर्वविघ्न नाशक हैं । निर्धनता तथा ऋण से मुक्ति हेतु, श्री यन्त्र की स्थापना तथा पूजा अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, श्री यन्त्र के स्थापना मात्र से लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती हैं ।
श्री यंत्र के मध्य या केन्द्र या में एक बिंदु है, इस बिंदु के चारों ओर ९ अंतर्ग्रथित त्रिभुज हैं जो ९ शक्तिओ का प्रतिनिधित्व करती हैं । १. बिंदु, २. त्रिकोण, ३. अष्टकोण, ४. दशकोण, ५. बहिर्दर्शरा, ६. चतुर्दर्शारा, ७. अष्ट दल, ८. षोडश दल, ९. वृत्तत्रय, १०. भूपुर से श्री यन्त्र का निर्माण हुआ हैं, ९ त्रिभुजों के अन्तःग्रथित होने से कुल ४३ लघु त्रिभुज बनते हैं तथा अपने अंदर समस्त प्रकार के अलौकिक तथा दिव्या शक्ति समाये हुए हैं । ९८ शक्तिओ की अराधना श्री चक्र में की जाती हैं तथा समस्त शक्तियां सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का नियंत्रण तथा सञ्चालन करती हैं ।

कामेश्वरी की स्वारसिक समरसता को प्राप्त परातत्व ही महा त्रिपुर सुंदरी के रूप में विराजमान हैं तथा यही सर्वानन्दमयी, सकलाधिष्ठान ( सर्व स्थान में व्याप्त ) देवी ललिताम्बिका हैं । देवी में सभी वेदांतो का तात्पर्य-अर्थ समाहित हैं तथा चराचर जगत के समस्त कार्य इन्हीं देवी में प्रतिष्ठित हैं । देवी में न शिव के प्रधानता हैं और न ही शक्ति की, अपितु शिव तथा शक्ति, दोनों की समानता हैं । समस्त तत्वों के रूप में विद्यमान होते हुए भी, देवी सबसे अतीत हैं, परिणामस्वरूप इन्हें ‘तात्वातीत’ कहा जाता हैं, देवी जगत के प्रत्येक तत्व में व्याप्त भी हैं और पृथक् भी, परिणामस्वरूप इन्हें ‘विश्वोत्तीर्ण’ भी कहा जाता हैं । ये ही परा ( जिसे हम देख नहीं सकते ) विद्या भी कही गए हैं, ये दृश्यमान प्रपंच इनका केवल उन्मेष मात्र हैं , देवी चर तथा अचर दोनों तत्वों के निर्माण करने में समर्थ हैं तथा निर्गुण तथा सगुण दोनों रूप में अवस्थित हैं । ऐसे ही परा शक्ति, नाम रहित होते हुए भी अपने साधको पर कृपा कर, सगुण रूप धारण करती हैं, देवी विविध रूपों में अपने रूपों का अवतरण कर विश्व का कल्याण करती हैं, तथा श्री विद्या के नाम से विख्यात हैं । देवी ब्रह्माण्ड की नायिका हैं तथा विभिन्न प्रकार के असंख्य देवताओं, गन्धर्वो, राक्षसों इत्यादि द्वारा सेवित तथा वन्दित हैं । देवी त्रिपुरा, चैतान्यरुपा चिद शक्ति तथा चैतन्य ब्रह्म हैं । भंडासुर की संहारिका, त्रिपुर सुंदरी, सागर के मध्य में स्थित मणिद्वीप का निर्माण कर चित्कला के रूप में विद्यमान हैं । तदनंतर, तत्वानुसार अपने त्रिविध रूप को व्यक्त करती हैं, १. अत्मतत्व, २. विद्यातत्व, ३. शिवतत्व, इन्हीं तत्वत्रय के कारण ही देवी १. शाम्भवी २. श्यामा तथा ३. विद्या के रूप में त्रिविधता प्राप्त करती हैं । इन तीनो शक्तिओ के पति या भैरव क्रमशः परमशिव, सदाशिव तथा रूद्र हैं ।

देवी त्रिपुरसुन्दरी के पूर्व भाग में श्यामा और उत्तर भाग में शाम्भवी विराजित हैं तथा इन्हीं तीन विद्याओं के द्वारा अन्य अनेक विद्याओं का प्राकट्य या प्रादुर्भाव हुआ हैं तथा श्री विद्या परिवार का निर्माण करती हैं । भक्तों को अनुग्रहीत करने की इच्छा से, भंडासुर का वध करने के निमित्त एक होना महाशक्ति का वैविध्य हैं ।
संक्षेप में देवी श्री विद्या त्रिपुर सुंदरी से सम्बंधित मुख्य तथ्य ।
मुख्य नाम : महा त्रिपुर सुंदरी ।
अन्य नाम : श्री विद्या, त्रिपुरा, श्री सुंदरी, राजराजेश्वरी, ललित, षोडशी, कामेश्वरी, मीनाक्षी ।
भैरव : कामेश्वर ।
तिथि : मार्गशीर्ष पूर्णिमा ।
भगवान विष्णु के २४ अवतारों से सम्बद्ध : भगवान परशुराम ।
कुल : श्री कुल ( इन्हीं के नाम से उत्पन्न तथा संबंधित ) ।
दिशा : उत्तर पूर्व ।
स्वभाव : सौम्य ।
सम्बंधित तीर्थ स्थान या मंदिर : कामाख्या मंदिर, ५१ शक्ति पीठो में सर्वश्रेष्ठ, योनि पीठ गुवहाटी, आसाम ।
कार्य : सम्पूर्ण या सभी प्रकार के कामनाओं को पूर्ण करने वाली ।
शारीरिक वर्ण : उगते हुए सूर्य के समान ।

तंत्र से करें सुख-समृद्धि

 तंत्र से करें सुख-समृद्धि



1‌‌‍॰ यदि परिश्रम के पश्चात् भी कारोबार ठप्प हो, या धन आकर खर्च हो जाता हो तो यह टोटका काम में लें। किसी गुरू पुष्य योग और शुभ चन्द्रमा के दिन प्रात: हरे रंग के कपड़े की छोटी थैली तैयार करें। श्री गणेश के चित्र अथवा मूर्ति के आगे “संकटनाशन गणेश स्तोत्र´´ के 11 पाठ करें। तत्पश्चात् इस थैली में 7 मूंग, 10 ग्राम साबुत धनिया, एक पंचमुखी रूद्राक्ष, एक चांदी का रूपया या 2 सुपारी, 2 हल्दी की गांठ रख कर दाहिने मुख के गणेश जी को शुद्ध घी के मोदक का भोग लगाएं। फिर यह थैली तिजोरी या कैश बॉक्स में रख दें। गरीबों और ब्राह्मणों को दान करते रहे। आर्थिक स्थिति में शीघ्र सुधार आएगा। 1 साल बाद नयी थैली बना कर बदलते रहें।



2॰ किसी के प्रत्येक शुभ कार्य में बाधा आती हो या विलम्ब होता हो तो रविवार को भैरों जी के मंदिर में सिंदूर का चोला चढ़ा कर “बटुक भैरव स्तोत्र´´ का एक पाठ कर के गौ, कौओं और काले कुत्तों को उनकी रूचि का पदार्थ खिलाना चाहिए। ऐसा वर्ष में 4-5 बार करने से कार्य बाधाएं नष्ट हो जाएंगी।



3॰ रूके हुए कार्यों की सिद्धि के लिए यह प्रयोग बहुत ही लाभदायक है। गणेश चतुर्थी को गणेश जी का ऐसा चित्र घर या दुकान पर लगाएं, जिसमें उनकी सूंड दायीं ओर मुड़ी हुई हो। इसकी आराधना करें। इसके आगे लौंग तथा सुपारी रखें। जब भी कहीं काम पर जाना हो, तो एक लौंग तथा सुपारी को साथ ले कर जाएं, तो काम सिद्ध होगा। लौंग को चूसें तथा सुपारी को वापस ला कर गणेश जी के आगे रख दें तथा जाते हुए कहें `जय गणेश काटो कलेश´।



4॰ सरकारी या निजी रोजगार क्षेत्र में परिश्रम के उपरांत भी सफलता नहीं मिल रही हो, तो नियमपूर्वक किये गये विष्णु यज्ञ की विभूति ले कर, अपने पितरों की `कुशा´ की मूर्ति बना कर, गंगाजल से स्नान करायें तथा यज्ञ विभूति लगा कर, कुछ भोग लगा दें और उनसे कार्य की सफलता हेतु कृपा करने की प्रार्थना करें। किसी धार्मिक ग्रंथ का एक अध्याय पढ़ कर, उस कुशा की मूर्ति को पवित्र नदी या सरोवर में प्रवाहित कर दें। सफलता अवश्य मिलेगी। सफलता के पश्चात् किसी शुभ कार्य में दानादि दें।



5॰ व्यापार, विवाह या किसी भी कार्य के करने में बार-बार असफलता मिल रही हो तो यह टोटका करें- सरसों के तैल में सिके गेहूँ के आटे व पुराने गुड़ से तैयार सात पूये, सात मदार (आक) के पुष्प, सिंदूर, आटे से तैयार सरसों के तैल का रूई की बत्ती से जलता दीपक, पत्तल या अरण्डी के पत्ते पर रखकर शनिवार की रात्रि में किसी चौराहे पर रखें और कहें -“हे मेरे दुर्भाग्य तुझे यहीं छोड़े जा रहा हूँ कृपा करके मेरा पीछा ना करना।´´ सामान रखकर पीछे मुड़कर न देखें।



6॰ सिन्दूर लगे हनुमान जी की मूर्ति का सिन्दूर लेकर सीता जी के चरणों में लगाएँ। फिर माता सीता से एक श्वास में अपनी कामना निवेदित कर भक्ति पूर्वक प्रणाम कर वापस आ जाएँ। इस प्रकार कुछ दिन करने पर सभी प्रकार की बाधाओं का निवारण होता है।



7॰ किसी शनिवार को, यदि उस दिन `सर्वार्थ सिद्धि योग’ हो तो अति उत्तम सांयकाल अपनी लम्बाई के बराबर लाल रेशमी सूत नाप लें। फिर एक पत्ता बरगद का तोड़ें। उसे स्वच्छ जल से धोकर पोंछ लें। तब पत्ते पर अपनी कामना रुपी नापा हुआ लाल रेशमी सूत लपेट दें और पत्ते को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। इस प्रयोग से सभी प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं और कामनाओं की पूर्ति होती है।



८॰ रविवार पुष्य नक्षत्र में एक कौआ अथवा काला कुत्ता पकड़े। उसके दाएँ पैर का नाखून काटें। इस नाखून को ताबीज में भरकर, धूपदीपादि से पूजन कर धारण करें। इससे आर्थिक बाधा दूर होती है। कौए या काले कुत्ते दोनों में से किसी एक का नाखून लें। दोनों का एक साथ प्रयोग न करें।



9॰ प्रत्येक प्रकार के संकट निवारण के लिये भगवान गणेश की मूर्ति पर कम से कम 21 दिन तक थोड़ी-थोड़ी जावित्री चढ़ावे और रात को सोते समय थोड़ी जावित्री खाकर सोवे। यह प्रयोग 21, 42, 64 या 84 दिनों तक करें।



10॰ अक्सर सुनने में आता है कि घर में कमाई तो बहुत है, किन्तु पैसा नहीं टिकता, तो यह प्रयोग करें। जब आटा पिसवाने जाते हैं तो उससे पहले थोड़े से गेंहू में 11 पत्ते तुलसी तथा 2 दाने केसर के डाल कर मिला लें तथा अब इसको बाकी गेंहू में मिला कर पिसवा लें। यह क्रिया सोमवार और शनिवार को करें। फिर घर में धन की कमी नहीं रहेगी।



11॰ आटा पिसते समय उसमें 100 ग्राम काले चने भी पिसने के लियें डाल दिया करें तथा केवल शनिवार को ही आटा पिसवाने का नियम बना लें।



12॰ शनिवार को खाने में किसी भी रूप में काला चना अवश्य ले लिया करें।



13॰ अगर पर्याप्त धर्नाजन के पश्चात् भी धन संचय नहीं हो रहा हो, तो काले कुत्ते को प्रत्येक शनिवार को कड़वे तेल (सरसों के तेल) से चुपड़ी रोटी खिलाएँ।



14॰ संध्या समय सोना, पढ़ना और भोजन करना निषिद्ध है। सोने से पूर्व पैरों को ठंडे पानी से धोना चाहिए, किन्तु गीले पैर नहीं सोना चाहिए। इससे धन का क्षय होता है।



15॰ रात्रि में चावल, दही और सत्तू का सेवन करने से लक्ष्मी का निरादर होता है। अत: समृद्धि चाहने वालों को तथा जिन व्यक्तियों को आर्थिक कष्ट रहते हों, उन्हें इनका सेवन रात्रि भोज में नहीं करना चाहिये।



16॰ भोजन सदैव पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर के करना चाहिए। संभव हो तो रसोईघर में ही बैठकर भोजन करें इससे राहु शांत होता है। जूते पहने हुए कभी भोजन नहीं करना चाहिए।


17॰ सुबह कुल्ला किए बिना पानी या चाय न पीएं। जूठे हाथों से या पैरों से कभी गौ, ब्राह्मण तथा अग्नि का स्पर्श न करें।



18॰ घर में देवी-देवताओं पर चढ़ाये गये फूल या हार के सूख जाने पर भी उन्हें घर में रखना अलाभकारी होता है।



19॰ अपने घर में पवित्र नदियों का जल संग्रह कर के रखना चाहिए। इसे घर के ईशान कोण में रखने से अधिक लाभ होता है।



20॰ रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो, तब गूलर के वृक्ष की जड़ प्राप्त कर के घर लाएं। इसे धूप, दीप करके धन स्थान पर रख दें। यदि इसे धारण करना चाहें तो स्वर्ण ताबीज में भर कर धारण कर लें। जब तक यह ताबीज आपके पास रहेगी, तब तक कोई कमी नहीं आयेगी। घर में संतान सुख उत्तम रहेगा। यश की प्राप्ति होती रहेगी। धन संपदा भरपूर होंगे। सुख शांति और संतुष्टि की प्राप्ति होगी।

बन्दी-मोचन स्तोत्र

बन्दी-मोचन स्तोत्र




हा नाथ! हा नरा वरोत्तम! हा दयालो! सीता-पतेः रुचिर्कुन्तल-शोभि-वक्त्रम्।


भक्तार्ति-दाहक मनोहर-रुप-धारिन्! मां बन्धनात् सपदि मोचय माविलम्बम्।।


सम्मोचितोऽस्तु भरताग्रज-पुंगवाढ्याः। देवाश्च दानव-कुलाग्नि-सुदह्यमाना।


तत्सुन्दरी-शिरसि संस्थित-केश-बन्धः। सम्मोचितोऽस्तु करुणालय मां पादम्।।


अत्राह महा-सुरथेन सु-विगाढ़ पाशः। बद्धोऽस्मि मां पुरुषाशु देव!


नो मोचयिष्यसि यदि स्मरणर्तिरेक! त्वं सर्व-देव-परिपूजित-पाद-पद्मम्।।


लोको भवन्तमिदमुल्लसितो हसिष्ये। तस्मादविलम्बो हि मोचय मोचयाशु।


इति श्रुत्वा जगन्नाथो, रघुवीरः कृपा-निधिः। भक्तं मोचयितुं गतः, पुष्पकेनाशु-वेगिना।।



विशेषः- एक समय भगवान् श्रीराम ने हनुमान जी को आज्ञा दी कि आप जगन्नाथपुरी में रहें, नहीं तो समुद्र मेरी पुरी को डुबो देगा। अयोध्यापुरी में भगवान् श्रीराम की पूजा हो रही थी। शुद्ध घी के मगद के लड्डू व पूड़ी-कचौड़ियों की उत्तम सुगन्ध वायु देवता ने अपने पुत्र को अयोध्यापुरी से जगन्नाथपुरी में आकाश-मार्ग से पहुँचा दी। श्री हनुमान् जी जगन्नाथपुरी से अयोध्या जी में आ गए। भगवान् श्रीराम ने कहा कि ‘आप क्यों आ गए? समुद्र मेरी पुरी को डुबो सकता है।’ हनुमान जी ने कहा ‘आपके प्रसाद की सुगन्धि से हम अपने को रोक नहीं सके।’ तब भगवान् श्रीराम ने उनके पैरों में बेड़ी डाल दी और कहा कि ‘अब आप वहीं बन्दी बन कर रहें।’ श्री जगन्नाथपुरी में ‘बेड़ी हनुमान’ अब भी हैं। बेड़ी से मुक्त होने के लिए श्री हनुमान जी द्वारा उक्त स्तुति की गई, जिससे प्रसन्न होकर भगवान् तुरन्त पुष्पक विमान द्वारा पहुँचे और उन्हें मुक्त कर दिया।



इस स्तोत्र का नित्य कम से कम ११ पाठ करने से सब प्रकार का कष्ट दूर होता है एवं सभी प्रकार के बन्धन से मुक्ति मिलती है।

श्रीललिता चिन्तामणिमाला स्तोत्र


श्रीललिता चिन्तामणिमाला स्तोत्र

ॐ अस्य श्रीललिता चिन्तामणिमाला स्तोत्र महामन्त्रस्य दक्षिणामूर्तिर्भगवान् ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीचिन्तामणि महाविद्येश्वरी ललिता महाभट्टारिका देवता ऐं बीजं क्लीं शक्तिः सौः कीलकं श्रीललिताम्बिका प्रसादसिद्धर्थे जपे विनियोगः ||
ध्यानम्
बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् |
पाशाङ्कुशधनुर्बाणान् धारयन्तीं शिवां भजे ||

ऐं ह्रीं श्रीं
ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्सिंहासनेश्वरी |
चिदग्निकुण्डसम्भूता देवकार्यसमुद्यता ||
उद्यद्भानुसहस्राभा चतुर्बाहुसमन्विता |
रागस्वरूपपाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ||
मनोरूपेक्षुकोदण्डा पञ्चतन्मात्रसायका |
निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला ||
चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा |
कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता ||
अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभिता |
मुखचन्द्रकलङ्काभमृगनाभिविशेषका ||
वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिका |
वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचना ||
नवचम्पकपुष्पाभनासादण्डविराजिता |
ताराकान्तितिरस्कारिनासाभरणभासुरा ||
कदम्बमञ्जरीकॢप्तकर्णपूरमनोहरा |
ताटङ्कयुगलीभूततपनोडुपमण्डला ||
पद्मरागशिलादर्शपरिभाविकपोलभूः |
नवविद्रुमबिम्बश्रीन्यक्कारिरदनच्छदा ||
शुद्धविद्याङ्कुराकारद्विजपङ्क्तिद्वयोज्ज्वला |
कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षद्दिगन्तरा || १०||
निजसल्लापमाधुर्यविनिर्भर्त्सितकच्छपी |
मन्दस्मितप्रभापूरमज्जत्कामेशमानसा ||
अनाकलितसादृश्यचिबुकश्रीविराजिता |
कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरा ||
कनकाङ्गदकेयूरकमनीयभुजान्विता |
रत्नग्रैवेयचिन्ताकलोलमुक्ताफलान्विता ||
कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनी |
नाभ्यालवालरोमालिलताफलकुचद्वयी ||
लक्ष्यरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमा |
स्तनभारदलन्मध्यपट्टबन्धवलित्रया ||
अरुणारुणकौसुम्भवस्त्रभास्वत्कटीतटी |
रत्नकिङ्किणिकारम्यरशनादामभूषिता ||
कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विता |
माणिक्यमुकुटाकारजानुद्वयविराजिता ||
इन्द्रगोपपरिक्षिप्तस्मरतूणाभजङ्घिका |
गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठजयिष्णुप्रपदान्विता ||
नखदीधितिसंछन्ननमज्जनतमोगुणा |
पदद्वयप्रभाजालपराकृतसरोरुहा ||
शिञ्जानमणिमञ्जीरमण्डितश्रीपदाम्बुजा |
मरालीमन्दगमना महालावण्यशेवधिः ||
सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता |
शिवकामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीनवल्लभा ||
सुमेरुमध्यशृङ्गस्था श्रीमन्नगरनायिका |
चिन्तामणिगृहान्तस्था पञ्चब्रह्मासनस्थिता ||
महापद्माटवीसंस्था कदम्बवनवासिनी |
सुधासागरमध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ||
देवर्षिगणसंघातस्तूयमानात्मवैभवा |
भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विता ||
सम्पत्करीसमारूढसिन्धुरव्रजसेविता |
अश्वारूढाधिष्ठिताश्वकोटिकोटिभिरावृता ||
चक्रराजरथारूढसर्वायुधपरिष्कृता |
गेयचक्ररथारूढमन्त्रिणीपरिसेविता ||
किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता |
ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा ||
भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता |
नित्यापराक्रमाटोपनिरीक्षणसमुत्सुका ||
भण्डपुत्रवधोद्युक्तबालाविक्रमनन्दिता |
मन्त्रिण्यम्बाविरचितविषङ्गवधतोषिता ||
विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता |
कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरा ||
महागणेशनिर्भिन्नविघ्नयन्त्रप्रहर्षिता |
भण्डासुरेन्द्रनिर्मुक्तशस्त्रप्रत्यस्त्रवर्षिणी ||
कराङ्गुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिः |
महापाशुपतास्त्राग्निनिर्दग्धासुरसैनिका ||
कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यका |
ब्रह्मोपेन्द्रमहेन्द्रादिदेवसंस्तुतवैभवा ||
हरनेत्राग्निसंदग्धकामसञ्जीवनौषधिः |
श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुखपङ्कजा ||
कण्ठाधःकटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणी |
शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभागधारिणी ||
मूलमन्त्रात्मिका मूलकूटत्रयकलेबरा |
कुलामृतैकरसिका कुलसंकेतपालिनी ||
कुलाङ्गना कुलान्तस्था कौलिनी कुलयोगिनी |
अकुला समयान्तस्था समयाचारतत्परा ||
मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रन्थिविभेदिनी |
मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थिविभेदिनी ||
आज्ञाचक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थिविभेदिनी |
सहस्राराम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी ||
तटिल्लतासमरुचिः षट्चक्रोपरिसंस्थिता |
महासक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तुतनीयसी |
श्रीशिवा शिवशक्त्यैक्यरूपिणी ललिताम्बिका ||

|| इति शिवम् ||

कामाख्या-कवच’

महा-भागवत पुराणोक्त ‘कामाख्या-कवच’



श्री महादेव उवाच (पूर्व-पीठिका)-



अमायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा दिन-क्षये। नवम्यां रजनी-योगे, योजयेद् भैरवी-मनुम्।।


क्षेत्रेऽस्मिन् प्रयतो भूत्वा, निर्भयः साहसं वहन्। तस्य साक्षाद् भगवती, प्रत्यक्षं जायते ध्रुवम्।।


आत्म-संरक्षणार्थाय, मन्त्र-संसिद्धयेऽपि च। यः पठेत् कवचं देव्यास्ततो भीतिर्न जायते।।


तस्मात् पूर्वं विधायैवं, रक्षां सावहितो नरः। प्रजपेत् स्वेष्ट-मन्त्रस्तु, निर्भीतो मुनि-सत्तम!।।


नारद उवाच-



कवचं कीदृशं देव्या, महा-भय-निवर्तकम्। कामाख्यायास्तु तद् ब्रूहि, साम्प्रतं मे महेश्वर!।।



श्रीमहादेव उवाच-



श्रृणुष्व परमं गुह्यं, महा-भय-निवर्तकम्। कामाख्यायाः सुर-श्रेष्ठ, कवचं सर्व-मंगलम्।।


यस्य स्मरण-मात्रेण, योगिनी-डाकिनी-गणाः। राक्षस्यो विघ्न-कारिण्यो। याश्चात्म-विघ्नकारिकाः।।


क्षुत्-पिपासा तथा निद्रा, तथाऽन्ये ये च विघ्नदाः। दूरादपि पलायन्ते, कवचस्य प्रसादतः।।


निर्भयो जायते मर्त्यस्तेजस्वी भैरवोपमः। समासक्त-मनासक्त-मनाश्चापि, जप-होमादि-कर्मसु।।


भवेच्च मन्त्र-तन्त्राणां, निर्विघ्नेन सु-सिद्धये।।



अथ कवचम्



ॐ प्राच्यां रक्षतु मे तारा, कामरुप-निवासिनी। आग्नेय्यां षोडशी पातु, याम्यां धूमावती स्वयम्।।


नैऋत्यां भैरवी पातु, वारुण्यां भुवनेश्वरी। वायव्यां सततं पातु, छिन्न-मस्ता महेश्वरी।।


कौबेर्यां पातु मे नित्यं, श्रीविद्या बगला-मुखी। ऐशान्यां पातु मे नित्यं, महा-त्रिपुर-सुन्दरी।।


ऊर्ध्वं रक्षतु मे विद्या, मातंगी पीठ-वासिनी। सर्वतः पातु मे नित्यं, कामाख्या-कालिका स्वयम्।।


ब्रह्म-रुपा महाविद्या, सर्वविद्यामयी-स्वयम्। शीर्षे रक्षतु मे दुर्गा, भालं श्री भव-मोहिनी।।


त्रिपुरा भ्रू-युगे पातु, शर्वाणी पातु नासिकाम्। चक्षुषी चण्डिका पातु, श्रोत्रे नील-सरस्वती।।


मुखं सौम्य-मुखी पातु, ग्रीवां रक्षतु पार्वती। जिह्वां रक्षतु मे देवी, जिह्वा ललन-भीषणा।।


वाग्-देवी वदनं पातु, वक्षः पातु महेश्वरी। बाहू महा-भुजा पातु, करांगुलीः सुरेश्वरी।।


पृष्ठतः पातु भीमास्या, कट्यां देवी दिगम्बरी। उदरं पातु मे नित्यं, महाविद्या महोदरी।।


उग्रतारा महादेवी, जंघोरु परि-रक्षतु। गुदं मुष्कं च मेढ्रं च, नाभिं च सुर-सुन्दरी।।


पदांगुलीः सदा पातु, भवानी त्रिदशेश्वरी। रक्त-मांसास्थि-मज्जादीन्, पातु देवी शवासना।।


महा-भयेषु घोरेषु, महा-भय-निवारिणी। पातु देवी महा-माया, कामाख्या पीठ-वासिनी।।


भस्माचल-गता दिव्य-सिंहासन-कृताश्रया। पातु श्रीकालिका देवी, सर्वोत्पातेषु सर्वदा।।


रक्षा-हीनं तु यत् स्थानं, कवचेनापि वर्जितम्। तत् सर्वं सर्वदा पातु, सर्व-रक्षण-कारिणी।।



फल-श्रुति-



इदं तु परमं गुह्यं, कवचं मुनि-सत्तम! कामाख्याया मयोक्तं ते, सर्व-रक्षा-करं परम्।।


अनेन कृत्वा रक्षां तु, निर्भयः साधको भवेत्। न तं स्पृशेद् भयं घोरं, मन्त्र-सिद्धि-विरोधकम्।।


जायते च मनः-सिद्धिर्निर्विघ्नेन महा-मते! इदं यो धारयेत् कण्ठे, बाही वा कवचं महत्।।


अव्याहताज्ञः स भवेत्, सर्व-विद्या-विशारदः। सर्वत्र लभते सौख्यं, मंगलं तु दिने-दिने।।


यः पठेत् प्रयतो भूत्वा, कवचं चेदमद्भुतम्। स देव्याः पदवीं याति, सत्यं सत्यं न संशयः।।

रहस्यमय और अदभुत श्री यंत्र

रहस्यमय और अदभुत श्री यंत्र
भगवती महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति का सबसे प्रभावी उपाय है श्री यंत्र की विधिवत साधना. यह एक ऐसा विधान है जो अभूतपूर्व सफलता प्रदायक है. जब किसी भी अन्य उपाय से भगवती की प्रसन्नता प्राप्त न हो पा रही हो तो यह साधना विधान प्रयोग करना चाहिए. श्री यंत्र के बारे में कहा गया है कि.
    चतुः षष्टया तंत्रै सकल मति संधाय भुवनम ।
स्थितस्तत्सिद्धि प्रसव परतंत्रैः पशुपतिः ।
पुनस्त्वनिर्बन्धादखिल पुरूषार्थैक घटना ।
स्वतंत्रं ते तंत्रं क्षितितलमवातीतरदिदम ।

देवाधिदेव भगवान महादेव शिव ने इस सकल भुवन को ६४ तंत्रो से भर दिया और फिर अपने दिव्य तापसी तेज से समस्त पुरूषार्थों को प्रदान करने में सक्षम श्री तंत्र को इस धरा पर प्रतिष्ठित किया. आशय यह कि श्री विद्या से संबंधित तंत्र ब्रह्‌माण्ड का सर्वश्रेष्ठ तंत्र है जिसकी साधना ऐसे योग्य साधकों और शिष्यों को प्राप्त होती है जो समस्त तंत्र साधनाओं को आत्मसात कर चुके हों. इस साधना को प्रदान करने के लिए कहा गया है कि :-
गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः, पिता पुत्रो न दातव्यं गोपनीयं महत्वतः ...

इस विद्या को सप्रयास गोपनीय रखना चाहिये, यह इतनी गोपनीय विद्या है कि इसे पिता को पुत्र से भी छुपाकर रखना चाहिये.
तंत्र के क्षेत्र में श्री विद्या को निर्विवाद रूप से सर्वश्रेष्ठ तथा सबसे गोपनीय माना जाता है. श्री विद्या की साधना का सबसे प्रमुख साधन है श्री यंत्र... इसकी विशिष्टता का अनुमान इसी बात से लगाया जाता है कि सनातन धर्म के पुनरूद्धारक, भगवान शिव का अवतार माने जाने वाले, जगद्गुरू आदि शंकराचार्य ने जिन चार पीठों की स्थापना की, उनमें उन्होने पूरी प्रामाणिकता के साथ श्री यंत्र की स्थापना की. जिसके परिणाम के रूप में आज भी चारों पीठ हर दृष्टि से,फिर वह चाहे साधनात्मक हो या फिर आर्थिक, पूर्णता से युक्त हैं.
श्री यंत्र की आकृति
तंत्र में त्रिकोण को अत्यंत महत्व दिया गया है. मुख्य रूप से दो प्रकार के त्रिकोणों का प्रयोग यंत्रों के निर्माण में किया जाता है. पहला अधोमुखी तथा दूसरा उर्ध्वमुखी. एक पुरूष रूपी शिव का प्रतीक है तथा दूसरा स्त्री रूपी शक्ति का प्रतीक होता है. इन दोनों त्रिकोणों के विविध संयोजनों से यंत्रों का निर्माण होता है.
शिव प्रतीक शक्ति प्रतीक :
श्री यंत्र भी इन दोनों प्रतीकों का एक विशिष्ट संयोजन है. श्री यंत्र में चार उर्ध्वमुखी शिव प्रतीक त्रिकोण तथा पांच अधोमुखी शक्ति प्रतीक त्रिकोण हैं. इस प्रकार यह यंत्र शक्ति बाहुल्यता से युक्त भगवती महाविद्या श्री त्रिपुरसुंदरी का सिद्ध यंत्र है.
इन नौ त्रिकोणों के संयोग से निर्मित इस यंत्र के मय में स्थित त्रिकोण के अंदर इस यंत्र का हृदय भाग होता है जिसमें बिंदु प्रतीक के रूप में महाविद्या श्री त्रिपुरसुंदरी का वास होता है. इन नवत्रिकोणों को शरीर के नवद्वारों का प्रतीक है. इन नवत्रिकोणों को वृत्त के अंदर निर्मित किया जाता है. वृत्त के बाहर पहले अष्ट(आठ) दल वाला कमल होता है जो अष्ट सिद्धियों का प्रतीक है. पुनः वृत्त जो ब्रह्‌माण्ड का प्रतीक है के बाद षोडश (सोलह) दल वाला कमल होता है जो जीवन की संपूर्णता माने जाने वाले षोडश कलाओं का प्रतीक हैं. इसके बाहर चार द्वारों से युक्त आवरण होता ह.ै
भोजपत्र पर श्री यंत्र के निर्माण के लिए अष्टगंध को गंगाजल में घोलकर सोने की कलम से भोजपत्र पर लिखा जाना चाहिये. धातु पर यंत्र निर्माण की आधुनिक विधियां श्रेष्ठ हैं जिनमें इचिंग नामक तकनीक के द्वारा रेखाओं को बेहद स्पष्टता के साथ उकेरा जाता है. यदि प्राचीन विधि से धातु पर यंत्र को उकेरा जाए तो यह ध्यान रखना चाहिये कि उभरा हुआ भाग यंत्र का सीधा वाला भाग हो. अर्थात नालीदार भाग पीछे रहे.
श्री यंत्र से होने वाले लाभ
श्री यंत्र प्रमुख रूप से ऐश्वर्य तथा समृद्धि प्रदान करने वाली महाविद्या त्रिपुरसुंदरी महालक्ष्मी का सिद्ध यंत्र है. यह यंत्र सही अर्थों में यंत्रराज है. इस यंत्र को स्थापित करने का तात्पर्य श्री को अपने संपूर्ण ऐश्वर्य के साथ आमंत्रित करना होता है. कहा गया है कि :-

श्री सुंदरी साधन तत्पराणाम्‌ , भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव....
अर्थात जो साधक श्री यंत्र के माध्यम से त्रिपुरसुंदरी महालक्ष्मी की साधना के लिए प्रयासरत होता है, उसके एक हाथ में सभी प्रकार के भोग होते हैं, तथा दूसरे हाथ में पूर्ण मोक्ष होता है. आशय यह कि श्री यंत्र का साधक समस्त प्रकार के भोगों का उपभोग करता हुआ अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है. इस प्रकार यह एकमात्र ऐसी साधना है जो एक साथ भोग तथा मोक्ष दोनों ही प्रदान करती है, इसलिए प्रत्येक साधक इस साधना को प्राप्त करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है.
इस अद्भुत यंत्र से अनेक लाभ हैं, इनमें प्रमुख हैं :-
श्री यंत्र के स्थापन मात्र से भगवती लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है.
कार्यस्थल पर इसका नित्य पूजन व्यापार में विकास देता है.
घर पर इसका नित्य पूजन करने से संपूर्ण दांपत्य सुख प्राप्त होता है.
पूरे विधि विधान से इसका पूजन यदि प्रत्येक दीपावली की रात्रि को संपन्न कर लिया जाय तो उस घर में साल भर किसी प्रकार की कमी नही होती है.
श्री यंत्र पर ध्यान लगाने से मानसिक क्षमता में वृद्धि होती है. उच्च यौगिक दशा में यह सहस्रार चक्र के भेदन में सहायक माना गया है.
यह विविध वास्तु दोषों के निराकरण के लिए श्रेष्ठतम उपाय है.

विविध पदार्थों से निर्मित श्री यंत्र
श्री यंत्र का निर्माण विविध पदार्थों से किया जा सकता है. इनमें श्रेष्ठता के क्रम में प्रमुख हैं े-

क्र.
पदार्थ
विशिष्टता
1
पारद श्रीयंत्र
पारद को शिववीर्य कहा जाता है. पारद से निर्मित यह यंत्र सबसे दुर्लभ तथा प्रभावशाली होता है. यदि सौभाग्य से ऐसा पारद श्री यंत्र प्राप्त हो जाए तो रंक को भी वह राजा बनाने में सक्षम होता है.

स्फटिक श्रीयंत्र
स्फटिक का बना हुआ श्री यंत्र अतिशीघ्र सफलता प्रदान करता है. इस यंत्र की निर्मलता के समान ही साधक का जीवन भी सभी प्रकार की मलिनताओं से परे हो जाता है.

स्वर्ण श्रीयंत्र
स्वर्ण से निर्मित यंत्र संपूर्ण ऐश्वर्य को प्रदान करने में सक्षम माना गया है. इस यंत्र को तिजोरी में रखना चाहिए तथा ऐसी व्यवस्था रखनी चाहिये कि उसे कोई अन्य व्यक्ति स्पर्श न कर सके.

मणि श्रीयंत्र
ये यंत्र कामना के अनुसार बनाये जाते हैं तथा दुर्लभ होते हैं

रजत श्रीयंत्र
ये यंत्र व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की उत्तरी दीवाल पर लगाए जाने चाहिये.इनको इस प्रकार से फ्रेम में मढवाकर लगवाना चाहिए जिससे इसको कोई सीधे स्पर्श न कर सके.

ताम्र श्रीयंत्र
ताम्र र्निमित यंत्र का प्रयोग विशेष पूजन अनुष्ठान तथा हवनादि के निमित्त किया जाता है. इस प्रकार के यंत्र को पर्स में रखने से अनावश्यक खर्च में कमी होती है तथा आय के नए माध्यमों का आभास होता है.

भोजपत्र श्रीयंत्र
आजकल इस प्रकार के यंत्र दुर्लभ होते जा रहे हैं. इन पर निर्मित यंत्रों का प्रयोग ताबीज के अंदर डालने के लिए किया जाता है. इस प्रकार के यंत्र सस्ते तथा प्रभावशाली होते हैं.
उपरोक्त पदार्थों का उपयोग यंत्र निर्माण के लिए करना श्रेष्ठ है. लकडी, कपडा या पत्थर आदि पर श्री यंत्र का निर्माण न करना श्रेष्ठ रहता है.
श्री यंत्र के निर्माण के समान ही इसका पूजन भी श्रम साध्य होने के साथ-साथ विशेष तेजस्विता की अपेक्षा भी रखता है. कोई भी श्रेष्ठ कार्य करने के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त का होना भी अनिवार्य होता है. श्री यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा के निमित्त श्रेष्ठतम मुहूर्तों पर एक दृष्टिपात करते हुए पूजन विधि पर प्रकाश डालने का प्रयास करूंगा.
श्रेष्ठ मुहूर्त
श्री यंत्र के निर्माण व पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ मुहुर्त है कालरात्रि अर्थात दीपावली की रात्रि. इस रात्रि में स्थिर लग्न में यंत्र का निर्माण व पूजन संपन्न किया जाना चाहिये.
इसके बाद माघ माह की पूर्णिमा, शिवरात्रि, शरद पूर्णिमा, सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण का मुहूर्त श्रेष्ठ होता है. यद्यपि ग्रहण को सामान्यतः शुभ कर्मों के लिए प्रयोग नही किया जाता इसलिए यहां संदेह होना स्वाभाविक है, मगर श्री विद्या पूर्णते तांत्रोक्त विद्या है तथा तांत्रोक्त साधनाओं के लिए ग्रहण को श्रेष्ठतम मुहूर्त मान गया है.
उपरोक्त मुहूर्तों के अलावा अक्षय तृतीया, रवि पुष्य योग, गुरू पुष्य योग, आश्विन माह को छोडकर किसी भी अमावस्या या किसी भी पूर्णिमा को भी श्रेष्ठ समय मे यंत्र निर्माण व पूजन किया जा सकता है.
यहां मैं यह स्पष्ट कर देना अनिवार्य समझता हूं कि, सभी तांत्रोक्त विधानों की तरह, यदि श्री यंत्र का निर्माण तथा पूजन करने वाला, श्री विद्या का सिद्ध साधक या गुरू हो, तो उनके द्वारा निर्दिष्ट समय उपरोक्त मुहूर्तों से भी ज्यादा श्रेष्ठ तथा फलदायक होगा. किसी भी पूजन की विधि से ज्यादा महत्व पूजन को संपन्न कराने वाले साधक की साधनात्मक तेजस्विता का होता है. यदि पूजनकर्ता की साधनात्मक उर्जा नगण्य है तो पूजन और प्राण-प्रतिष्ठा अर्थहीन हो जाएगी. इसलिए श्री यंत्र के पूजन से पहले पूजनकर्ता के लिए यह आवश्यक है कि, वह कम से कम एक बार श्री विद्या या महालक्ष्मी मंत्र का पुरश्चरण पूर्ण कर चुका हो.
पूजन विधि
सबसे पहले शुद्ध जल से स्नान करके पूर्व दिशा की ओर देखते हुए बैठ जायें. सामने यंत्र को स्थापित करें.
सर्वप्रथम ÷क्क श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमे' से आचमन करें .
पवित्री करण करें.
संकल्प लें अपनी कामना को व्यक्त करें.
भूमि पूजन करें.
गणपति पूजन करें.
भैरव पूजन करें.
गुरू पूजन करें.
भूतशुद्धि करें, इसके लिए पुरूष सूक्त का पाठ करें.
घी का दीपक जलायें.
ऋष्यादिन्यास. करन्यास तथा अंगन्यास संपन्न करें.
श्री विद्या का ध्यान करने के बाद श्री सूक्त के सोलह पाठ संपन्न करें.
इसके पश्चात लक्ष्मी सूक्त का एक पाठ संपन्न करें.
श्री सूक्त के सोलह श्लोकों से श्री यंत्र का षोडशोचार पूजन संपन्न करें.
प्रत्येक श्लोक के साथ यंत्र के मध्य में केसर से बिंदी लगायें जैसे आप षोडशी की सोलह कलाओं को वहां स्थापित कर रहे हों.
अंत में श्री सूक्त के सोलह श्लोकों के साथ आहुति संपन्न करें. विधान १००० बार पाठ तथा १०० बार हवन का है.
इसमें प्रत्येक श्लोक के साथ स्वाहा लगाकर आहुति देंगें.
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मालामाल बनाती है श्रीयंत्र पूजा:


धन या पैसा जीवन की अहम जरुरतों में एक है। आज तेज रफ्तार के जीवन में कईं अवसरों पर यह देखा जाता है कि युवा पीढ़ी चकाचौंध से भरी जीवनशैली को देखकर प्रभावित होती है और बहुत कम समय में ज्यादा कमाने की सोच में गलत तरीकें अपनाती है। जबकि धन का वास्तविक सुख और शांति मेहनत, परिश्रम की कमाई में ही है। ऐसा कमाया धन न केवल आत्मविश्वास के साथ दूसरों का भरोसा भी देता है, बल्कि रुतबा और साख भी बनाता है।
धर्म में आस्था रखने वाला व्यक्ति ऐसे ही तरीकों में विश्वास रखता है। इसलिए मातृशक्ति की आराधना के इस काल में यहां बताया जा रहा है, एक ऐसा ही उपाय जिसको अपनाकर जीवन में किसी भी सुख से वंचित नहीं रहेंगे और धन का अभाव कभी नहीं सताएगा। यह उपाय है श्रीयंत्र पूजा।

धार्मिक दृष्टि से लक्ष्मी कृपा के लिए की जाने वाली श्रीयंत्र साधना संयम और नियम की दृष्टि से कठिन होती है। इसलिए यहां बताई जा रही है श्रीयंत्र पूजा की सरल विधि जिसे कोई भी साधारण भक्त अपनाकर सुख और वैभव पा सकता है। सरल शब्दों में यह पूजा मालामाल बना देती है। श्रीयंत्र पूजा की आसान विधि कोई भी भक्त नवरात्रि या उसके बाद भी शुक्रवार या प्रतिदिन कर सकता है।

श्रीयंत्र पूजा के पहले कुछ सामान्य नियमों का जरुर पालन करें -

- ब्रह्मचर्य का पालन करें और ऐसा करने का प्रचार न करें।

- स्वच्छ वस्त्र पहनें।

- सुगंधित तेल, परफ्यूम, इत्र न लगाएं।

- बिना नमक का आहार लें।

- प्राण-प्रतिष्ठित श्रीयंत्र की ही पूजा करें। यह किसी भी मंदिर, योग्य और सिद्ध ब्राह्मण, ज्योतिष या तंत्र विशेषज्ञ से प्राप्त करें।

- यह पूजा लोभ के भाव से न कर सुख और शांति के भाव से करें। इसके बाद श्रीयंत्र पूजा की इस विधि से करें। इसे किसी योग्य ब्राह्मण से भी करा सकते हैं - नवरात्रि या किसी भी दिन सुबह स्नान कर एक थाली में श्रीयंत्र स्थापित करें।

- इस श्रीयंत्र को लाल कपड़े पर रखें।

- श्रीयंत्र का पंचामृत यानि दुध, दही, शहद, घी और शक्कर को मिलाकर स्नान कराएं। गंगाजल से पवित्र स्नान कराएं।

- इसके बाद श्रीयंत्र की पूजा लाल चंदन, लाल फूल, अबीर, मेंहदी, रोली, अक्षत, लाल दुपट्टा चढ़ाएं। मिठाई का भोग लगाएं।

- धूप, दीप, कर्पूर से आरती करें।

- श्रीयंत्र के सामने लक्ष्मी मंत्र, श्रीसूक्त, दुर्गा सप्तशती या जो भी श्लोक आपको आसान लगे, का पाठ करें। किंतु लालच, लालसा से दूर होकर श्रद्धा और पूरी आस्था के साथ करें।

- अंत में पूजा में जाने-अनजाने हुई गलती के लिए क्षमा मांगे और माता लक्ष्मी का स्मरण कर सुख, सौभाग्य और समृद्धि की कामना करें। श्रीयंत्र पूजा की यह आसान विधि नवरात्रि में बहुत ही शुभ फलदायी मानी जाती है। इससे नौकरीपेशा से लेकर बिजनेसमेन तक धन का अभाव नहीं देखते। इसे प्रति शुक्रवार या नियमित करने पर जीवन में आर्थिक कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता।


श्री यंत्र
यह सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है,इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं,और उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है। यह बेहद शक्तिशाली ललितादेवी का पूजा चक्र है,इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र भी कहते है। यह सर्व रक्षाकर सर्वव्याधिनिवारक सर्वकष्टनाशक होने के कारण यह सर्वसिद्धिप्रद सर्वार्थ साधक सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है। इसे गंगाजल और दूध से स्वच्छ करने के बाद पूजा स्थान या व्यापारिक स्थान तथा अन्य शुद्ध स्थान पर रखा जाता है। इसकी पूजा पूरब की तरफ़ मुंह करके की जाती है,श्रीयंत्र का सीधा मतलब है,लक्ष्मी यंत्र जो धनागम के लिये जरूरी है। इसके मध्य भाग में बिन्दु व छोटे बडे मुख्य नौ त्रिकोण से बने ४३ त्रिकोण दो कमल दल भूपुर एक चतुरस ४३ कोणों से निर्मित उन्नत श्रंग के सद्रश्य मेरु प्रुष्ठीय श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों का प्रजनन केन्द्र बिद्नु कहा गया है। जिस प्रकार से सब कवचों से चन्डी कवच सर्वश्रेष्ठ कहा गया है,उसी प्रकार से सभी देवी देवताओं के यंत्रों में श्रीदेवी का यंत्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसी कारण से इसे यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इसे यन्त्रशिरोमणि भी कहा जाता है। दीपावली धनतेरस बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रान्ति के दिन यदि रविवार हो तो इस यंत्र का निर्माण व पूजन विशेष फ़लदायी माना गया है,ऐसा मेरा विश्वास है।
श्री महालक्ष्मी यंत्र
श्री महालक्षमी यंत्र की अधिष्ठात्री देवी कमला हैं,अर्थात इस यंत्र का पूजन करते समय श्वेत हाथियों के द्वारा स्वर्ण कलश से स्नान करती हुयी कमलासन पर बैठी लक्ष्मी का ध्यान करना चाहिये,विद्वानों के अनुसार इस यंत्र के नित्य दर्शन व पूजन से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इस यंत्र की पूजा वेदोक्त न होकर पुराणोक्त है इसमे बिन्दु षटकोण वृत अष्टदल एवं भूपुर की संरचना की गयी है,धनतेरस दीवावली बसन्त पंचमी रविपुष्य एवं इसी प्रकार के शुभ योगों में इसकी उपासना का महत्व है,स्वर्ण रजत ताम्र से निर्मित इस यन्त्र की उपासना से घर व स्थान विशेष में लक्ष्मी का स्थाई निवास माना जाता है।
बगलामुखी यंत्र
बगला दस महाविद्याओं में एक है इसकी उपासना से शत्रु का नाश होता है,शत्रु की जिव्हा वाणी व वचनों का स्तम्भन करने हेतु इससे बढकर कोई यंत्र नही है। इस यंत्र के मध्य बिंदु पर बगलामुखी देवी का आव्हान व ध्यान करना पडता है,इसे पीताम्बरी विद्या भी कहते हैं,क्योंकि इसकी उपासना में पीले वस्त्र पीले पुष्प पीली हल्दी की माला एवं केशर की खीर का भोग लगता है। इस यंत्र में बिन्दु त्रिकोण षटकोण वृत्त अष्टदल वृत्त षोडशदल एवं भूपुर की रचना की गयी है,नुकसान पहुंचाने वाले दुष्ट शत्रु की जिव्हा हाथ से खींचती हुयी बगलादेवी का ध्यान करते हुये शत्रु के सर्वनाश की कल्पना की जाती है। इस यंत्र के विशेष प्रयोग से प्रेतबाधा व यक्षिणीबाधा का भी नाश होता है।
श्रीमहाकाली यन्त्र
शमशान साधना में काली उपासना का बडा भारी महत्व है,इसी सन्दर्भ में महाकाली यन्त्र का प्रयोग शत्रु नाश मोहन मारण उच्चाटन आदि कार्यों में किया जाता है। मध्य बिन्दु में पांच उल्टे त्रिकोण तीन वृत अष्टदल वृत एव भूपुर से आवृत महाकाली का यंत्र तैयार होता है। इस यंत्र का पूजन करते समय शव पर आरूढ मुण्डमाला धारण की हुयी कडग त्रिशूल खप्पर व एक हाथ में नर मुण्ड धारण की हुयी रक्त जिव्हा लपलपाती हुयी भयंकर स्वरूप वाली महाकाली का ध्यान किया जाता है। जब अन्य विद्यायें असफ़ल होजातीं है,तब इस यंत्र का सहारा लिया जाता है। महाकाली की उपासना अमोघ मानी गयी है। इस यंत्र के नित्य पूजन से अरिष्ट बाधाओं का स्वत: ही नाश हो जाता है,और शत्रुओं का पराभव होता है,शक्ति के उपासकों के लिये यह यंत्र विशेष फ़लदायी है। चैत्र आषाढ अश्विन एवं माघ की अष्टमी इस यंत्र के स्थापन और महाकाली की साधना के लिये अतिउपयुक्त है।
महामृत्युंजय यंत्र
इस यंत्र के माध्यम से मृत्यु को जीतने वाले भगवान शंकर की स्तुति की गयी है,भगवान शिव की साधना अमोघ व शीघ्र फ़लदायी मानी गयी है। आरक दशाओं के लगने के पूर्व इसके प्रयोग से व्यक्ति भावी दुर्घटनाओं से बच जाता है,शूल की पीडा सुई की पीडा में बदल कर निकल जाती है। प्राणघातक दुर्घटना व सीरियस एक्सीडेंट में भी जातक सुरक्षित व बेदाग होकर बच जाता है। प्राणघातक मार्केश टल जाते हैं,ज्योतिषी लोग अरिष्ट ग्रह निवारणार्थ आयु बढाने हेतु अपघात और अकाल मृत्यु से बचने के लिये महामृत्युयंत्र का प्रयोग करना बताते हैं। शिवार्चन स्तुति के अनुसार पंचकोण षटकोण अष्टदल व भूपुर से युक्त मूल मन्त्र के बीच सुशोभित महामृत्युंजय यंत्र होता है। आसन्न रोगों की निवृत्ति के लिये एवं दीर्घायु की कामना के लिये यह यंत्र प्रयोग में लाया जाता है। इस यंत्र का पूजन करने के बाद इसका चरणामृत पीने से व्यक्ति निरोग रहता है,इसका अभिषिक्त किया हुआ जल घर में छिडकने से परिवार में सभी स्वस्थ रहते हैं,घर पर रोग व ऊपरी हवाओं का आक्रमण नहीं होता है।
कनकधारा यंत्र
लक्ष्मी प्राप्ति के लिये यह अत्यन्त दुर्लभ और रामबाण प्रयोग है,इस यंत्र के पूजन से दरिद्रता का नाश होता है,पूर्व में आद्य शंकराचार्य ने इसी यंत्र के प्रभाव से स्वर्ण के आंवलों की वर्षा करवायी थी। यह यंत्र रंक को राजा बनाने की सामर्थय रखता है। यह यंत्र अष्ट सिद्धि व नव निधियों को देने वाला है,इसमें बिन्दु त्रिकोण एवं दो वृहद कोण वृत्त अष्टदल वृत्त षोडस दल एव तीन भूपुर होते हैं,इस यंत्र के साथ कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना अनिवार्य होता है।
श्रीदुर्गा यंत्र
यह श्री दुर्गेमाता अम्बेमाता का यंत्र है,इसके मूल में नवार्ण मंत्र की प्रधानता है,श्री अम्बे जी का ध्यान करते हुये नवार्ण मंत्र माला जपते रहने से इच्छित फ़ल की प्राप्ति होती है। विशेषकर संकट के समय इस यंत्र की प्रतिष्ठा करके पूजन किया जाता है। नवरात्र में स्थापना के दिन अथवा अष्टमी के दिन इस यंत्र निर्माण करना व पूजन करना विशेष फ़लदायी माना जाता है,इस यन्त्र पर दुर्गा सप्तशती के अध्याय चार के श्लोक १७ का जाप करने पर दुख व दरिद्रता का नाश होता है। व्यक्ति को ऋण से दूर करने बीमारी से मुक्ति में यह यंत्र विशेष फ़लदायी है।
सिद्धि श्री बीसा यंत्र
कहावत प्रसिद्ध है कि जिसके पास हो बीसा उसका क्या करे जगदीशा,अर्थात साधकों ने इस यंत्र के माध्यम से दुनिया की हर मुश्किल आसान होती है,और लोग मुशीबत में भी मुशीबत से ही रास्ता निकाल लेते हैं। इसलिये ही इसे लोग बीसा यंत्र की उपाधि देते हैं। नवार्ण मंत्र से सम्पुटित करते हुये इसमे देवी जगदम्बा का ध्यान किया जाता है। यंत्र में चतुष्कोण में आठ कोष्ठक एक लम्बे त्रिकोण की सहायता से बनाये जाते हैं,त्रिकोण को मन्दिर के शिखर का आकार दिया जाता है,अंक विद्या के चमत्कार के कारण इस यंत्र के प्रत्येक चार कोष्ठक की गणना से बीस की संख्या की सिद्धि होती है। इस यंत्र को पास रखने से ज्योतिषी आदि लोगों को वचन सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। भूत प्रेत और ऊपरी हवाओं को वश में करने की ताकत मिलती है,जिन घरों में भूत वास हो जाता है उन घरों में इसकी स्थापना करने से उनसे मुक्ति मिलती है।
श्री कुबेर यंत्र
यह धन अधिपति धनेश कुबेर का यंत्र है,इस यंत्र के प्रभाव से यक्षराज कुबेर प्रसन्न होकर अतुल सम्पत्ति की रक्षा करते हैं। यह यंत्र स्वर्ण और रजत पत्रों से भी निर्मित होता है,जहां लक्ष्मी प्राप्ति की अन्य साधनायें असफ़ल हो जाती हैं,वहां इस यंत्र की उपासना से शीघ्र लाभ होता है। कुबेर यंत्र विजय दसमीं धनतेरस दीपावली तथा रविपुष्य नक्षत्र और गुरुवार या रविवार को बनाया जाता है। कुबेर यंत्र की स्थापना गल्ले तिजोरियों सेफ़ व बन्द अलमारियों में की जाती है। लक्ष्मी प्राप्ति की साधनाओं में कुबेर यंत्र अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
श्री गणेश यंत्र
गणेश यंत्र सर्व सिद्धि दायक व नाना प्रकार की उपलब्धियों व सिद्धियों के देने वाला है,इसमें देवताओं के प्रधान गणाध्यक्ष गणपति का ध्यान किया जाता है। एक हाथ में पास एक अंकुश एक में मोदक एवं वरद मुद्रा में सुशोभित एक दन्त त्रिनेत्र कनक सिंहासन पर विराजमान गणपति की स्तुति की जाती है। इस यंत्र के प्रभाव से और भक्त की आराधना से व्यक्ति विशेष पर रिद्धि सिद्धि की वर्षा करते हैं,साधक को इष्ट कृपा की अनुभूति होने लगती है। उसके कार्यों के अन्दर आने वाली बाधायें स्वत: ही समाप्त हो जातीं हैं,व्यक्ति को अतुल धन यश कीर्ति की प्राप्ति होती है,रवि पुष्य गुरु पुष्य अथवा गणेश चतुर्थी को इस यंत्र का निर्माण किया जाता है,इन्ही समयों में इस यंत्र की पूजा अर्चना करने पर सभी कामनायें सिद्धि होती हैं।
गायत्री यंत्र
गायत्री की महिमा शब्दातीत है,इस यंत्र को बनाते समय कमल दल पर विराजमान पद्मासन में स्थिति पंचमुखी व अष्टभुजा युक्त गायत्री का ध्यान किया जाता है,बिन्दु त्रिकोण षटकोण व अष्टदल व भूपुर से युक्त इस यंत्र को गायत्री मंत्र से प्रतिष्ठित किया जाता है। इस यंत्र की उपासना से व्यक्ति लौकिक उपलब्धियों को लांघ कर आध्यात्मिक उन्नति को स्पर्श करने लग जाता है। व्यक्ति का तेज मेधा व धारणा शक्ति बढ जाती है। इस यंत्र के प्रभाव से पूर्व में किये गये पाप कर्मों से मुक्ति मिल जाती है। गायत्री माता की प्रसन्नता से व्यक्ति में श्राप व आशीर्वाद देने की शक्ति आ जाती है। व्यक्ति की वाणी और चेहरे पर तेज बढने लगता है। गायत्री का ध्यान करने के लिये सुबह को माता गायत्री श्वेत कमल पर वीणा लेकर विराजमान होती है,दोपहर को गरूण पर सवार लाल वस्त्रों में होतीं है,और शाम को सफ़ेद बैल पर सवार वृद्धा के रूप में पीले वस्त्रों में ध्यान में आतीं हैं।
दाम्पत्य सुख कारक मंगल यंत्र
विवाह योग्य पुत्र या पुत्री के विवाह में बाधा आना,विवाह के लिये पुत्र या पुत्री का सीमाओं को लांघ कर सामाजिक मर्यादा को तोडना विवाह के बाद पति पत्नी में तकरार होना,विवाहित दम्पत्ति के लिये किसी न किसी कारण से सन्तान सुख का नहीं होना,गर्भपात होकर सन्तान का नष्ट हो जाना, मनुष्य का ध्यान कर्ज की तरफ़ जाना और लिये हुये कर्जे को चुकाने के लिये दर दर की ठोकरें खाना,किसी को दिये गये कर्जे का वसूल नहीं होना,आदि कारणों के लिये ज्योतिष शास्त्र में मंगल व्रत का विधान है,मंगल के व्रत में मंगल यंत्र का पूजन आवश्यक है। यह यंत्र जमीन जायदाद के विवाद में जाने और घर के अन्दर हमेशा क्लेश रहने पर भी प्रयोग किया जाता है,इसके अलावा इसे वाहन में प्रतिष्ठित कर लगाने से दुर्घटना की संभावना न के बराबर हो जाती है।
श्री पंचदसी यंत्र
पंचदसी यंत्र को पन्द्रहिया यन्त्र भी कहा जाता है,इसके अन्दर एक से लेकर नौ तक की संख्याओं को इस प्रकार से लिखा जाता है दायें बायें ऊपर नीचे किधर भी जोडा जाये तो कुल योग पन्द्रह ही होता है,इस यन्त्र का निर्माण राशि के अनुसार होता है,एक ही यन्त्र को सभी राशियों वाले लोग प्रयोग नहीं कर सकते है,पूर्ण रूप से ग्रहों की प्रकृति के अनुसार इस यंत्र में पांचों तत्वों का समावेश किया जाता है,जैसे जल तत्व वाली राशियां कर्क वृश्चिक और मीन होती है,इन राशियों के लिये चन्द्रमा का सानिध्य प्रारम्भ में और मंगल तथा गुरु का सानिध्य मध्य में तथा गुरु का सानिध्य अन्त में किया जाता है। संख्यात्मक प्रभाव का असर साक्षात देखने के लिये नौ में चार को जोडा जाता है,फ़िर दो को जोड कर योग पन्द्रह का लिया जाता है,इसके अन्दर मंगल को दोनों रूपों में प्रयोग में लाया जाता है,नेक मंगल या सकारात्मक मंगल नौ के रूप में होता है और नकारात्मक मंगल चार के रूप में होता है,तथा चन्द्रमा का रूप दो से प्रयोग में लिया जाता है। यह यंत्र भगवान शंकर का रूप है,ग्यारह रुद्र और चार पुरुषार्थ मिलकर ही पन्द्रह का रूप धारण करते है। इस यंत्र को सोमवार या पूर्णिमा के दिन बनाया जाता है,और उसे रुद्र गायत्री से एक बैठक में पन्द्रह हजार मंत्रों से प्रतिष्टित किया जाता है।
सम्पुटित गायत्री यंत्र
वेदमाता गायत्री विघ्न हरण गणपति महाराज समृद्धिदाता श्री दत्तात्रेय के सम्पुटित मंत्रों द्वारा इस गायत्री यंत्र का निर्माण किया जाता है। यह यंत्र व्यापारियों गृहस्थ लोगों के लिये ही बनाया जाता है इसका मुख्य उद्देश्य धन,धन से प्रयोग में लाये जाने वाले साधन और धन को प्रयोग में ली जाने वाली विद्या का विकास इसी यंत्र के द्वारा होता है,जिस प्रकार से एक गाडी साधन रूप में है,गाडी को चलाने की कला विद्या के रूप में है,और गाडी को चलाने के लिये प्रयोग में ली जाने वाली पेट्रोल आदि धन के रूप में है,अगर तीनों में से एक की कमी हो जाती है तो गाडी रुक जाती है,उसी प्रकार से व्यापारियों के लिये दुकान साधन के रूप में है,दुकान में भरा हुआ सामान धन के रूप में है,और उस सामान को बेचने की कला विद्या के रूप में है,गृहस्थ के लिये भी परिवार का सदस्य साधन के रूप में है,सदस्य की शिक्षा विद्या के रूप में है,और सदस्य द्वारा अपने को और अपनी विद्या को प्रयोग में लाने के बाद पैदा किया जाने फ़ल धन के रूप में मिलता है,इस यंत्र की स्थापना करने के बाद उपरोक्त तीनों कारकों का ज्ञान आसानी से साधक को हो जाता है,और वह किसी भी कारक के कम होने से पहले ही उसे पूरा कर लेता है।
श्री नित्य दर्शन बीसा यंत्र
इस यंत्र का निर्माण अपने पास हमेशा रखने के लिये किया जाता है,इसके अन्दर पंचागुली महाविद्या का रोपण किया जाता है,अष्टलक्ष्मी से युक्त इस यंत्र का निर्माण करने के बाद इसे चांदी के ताबीज में रखा जाता है,जब कोई परेशानी आती है तो इसे माथे से लगाकर कार्य का आरम्भ किया जाता है,कार्य के अन्दर आने वाली बाधा का निराकरण बाधा आने के पहले ही दिमाग में आने लगता है,इसे शराबी कबाबी लोग अपने प्रयोग में नही ला सकते हैं।

शिव चरित्र के अनुसार, सती शक्ति पीठो की संख्या 51 हैं ।

शिव चरित्र के अनुसार, सती शक्ति पीठो की संख्या ५१ हैं ।

कालिका पुराण के अनुसार, सती शक्तिपीठों की संख्या २६ हैं ।

श्री देवी भागवत, पुराण के अनुसार, सती शक्तिपीठों की संख्या १०८ हैं ।

तंत्र चूड़ामणि तथा मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, सती शक्तिपीठों की संख्या ५२ हैं ।

हिंगलाज शक्तिपीठ, ब्रह्मरंध्र (सिर के ऊपर), बलूचिस्तान, पाकिस्तान ।
हिंगलाज या हिंगुला में, ब्रह्मरंध्र (सिर के ऊपर), हिंगलाज पर्वत के पहाड़ी गुफा में, हिंगोल नदी के तट पर, लास बेला के बलूचिस्तान प्रांत, ल्यारी तहसील, पाकिस्तान में गिरी । जो कराची से १२५ कि. मी. उत्तर-पूर्व, हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान के मध्य में स्थित हैं । यहाँ देवी कोट्टरी शक्ति और के रूप में तथा भीमलोचन भैरव के रूप में अवस्थित हैं । मंदिर में सिंदूर के साथ लिप्त गोल शिलाओं के रूप में देवी पूजिता हैं जो यहाँ के प्राकृतिक गुफा में स्थित है ।
शिवहारकराय या करविपुर शक्तिपीठ, (आंखें), कराची, पाकिस्तान ।
शिवहारकराय या करविपुर शक्ति पीठ, यह पाकिस्तान में कराची के, परकै रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। हिंदू शास्त्र के अनुसार सती की आँखों यहाँ गिर गया। देवी महिषमर्दिनी और भैरव क्रोधीश के रूप में पूजित तथा विद्यमान हैं ।
सुंगधा शक्तिपीठ, (नाक), बरिसाल, बांग्लादेश ।
सुगंधा शक्तिपीठ, बांग्लादेश में बरिसाल जिले, से २० कि. मी. उत्तर, शिकारपुर नमक स्थान में स्थित एकजटा के रूप में विद्यमान हैं। शिकारपुर गांव, सुगंधा नदी के तट पर, सती की नाक गिरी थी और यहां वह सुगंधा या देवी तारा के एकजटा स्वरूप के रूप में विद्यमान हैं तथा यहाँ के भैरव त्र्यंबक हैं । यह मंदिर शिव शिवरात्रि या शिव चतुर्दशी के उत्सव के लिए प्रसिद्ध है।
महामाया शक्तिपीठ, (गाला), अमरनाथ, पहलगाम, जम्मू और कश्मीर, भारत ।
महामाया शक्तिपीठ, जम्मू और कश्मीर, भारत के पहलगाम जिले में स्थित हैं । सती के गले का भाग यहाँ गिर गया था और यहां वह देवी "महामाया" के रूप में और त्रिसन्ध्येश्वर भैरव के रूप में स्थित है । भगवान शिव के इस पवित्र गुफा में लिंग, बर्फ से तथा प्राकृतिक रूप से बनती है, इस स्थान मैं शिव जी ने अपनी पत्नी पार्वती को जीवन और मरण चक्र से सम्बंधित रहस्य समझाया था । दो अन्य बर्फ संरचनायें माता पार्वती और शिव के पुत्र गणेश का प्रतिनिधित्व करते हैं । अमरनाथ के दर्शन के साथ श्रावण पूर्णिमा पर इस शक्ति पीठ भी दर्शन किया जाता हैं ।
ज्वाला शक्तिपीठ, (जीभ), ज्वालामुखी, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश, भारत ।
ज्वालामुखी, कांगड़ा घाटी के दक्षिण से ३० कि. मी. दूर स्थित हैं । भारत में एक बहुत प्रसिद्ध धार्मिक स्थल के रूप में जाना जाता है । पांडवों इस पवित्र पीठ की खोज की । यहाँ, सती की जीभ गिरी थी; यहाँ देवी अंबिका या सिद्धिदा और उन्मत्त भैरव के रूप में विद्यमान हैं । देवी के मंदिर में दर्शन, लौ के रूप में है और लौ चट्टानों की परत के नीचे से जलती रहती हैं । यह मंदिर मुहम्मद गजनी द्वारा १००९ में नष्ट कर दिया गया था। काँगड़ा के राजा भूमि चंद कटोच, देवी दुर्गा के बड़े भक्त थे, उन्हें देवी माँ ने रात को सपने में दर्शन दे, इस पवित्र स्थान के बारे में बताया । राजा ने उस स्थान को खोज कर, उस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण किया तथा चमत्कारिक ढंग से, अग्नि का एक स्रोत मिल। सम्राट अकबर ने इस पवित्र अग्नि को बुझाने के लिए, कई बार प्रयास किए लेकिन हर बार असफल उन्हें असफलता ही मिली । अंत में उन्होंने भी यहाँ के अलौकिक शक्ति को स्वीकार कर लिया ।
त्रिपुरा मालिनी शक्तिपीठ, (बायाँ सीना), जालंधर, पंजाब, भारत ।
त्रिपुरा मालिनी, यह पीठ भारत के राज्य में पंजाब, जालंधर रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर दूर जालंधर शहर में स्थित है। सती की बाई छाती गिर गया था, वह देवी "त्रिपुरा-मालिनी" के रूप में और भीषण भैरव के रूप में विद्यमान हैं । वशिष्ठ, व्यास, मनु, जमदग्नि, परशुराम जैसे विभिन्न महर्षिओं ने, त्रिपुरा मालिनी के रूप में, यहाँ आद्या शक्ति की पूजा की। जालंधर नमक दैत्य भगवान शिव द्वारा मारा गया था, दैत्य के नाम से ही शहर का नाम जालंधर पड़ा । यहाँ, ताजा पानी के एक तालाब के साथ, त्रिपुरा मालिनी के मंदिर खूबसूरती बहुत मनमोहक हैं ।
अंबा शक्तिपीठ, (ह्रदय), बनासकांठा, गुजरात, भारत ।
अंबाजी शक्तिपीठ, अंबाजी मंदिर अरावली पर्वत श्रृंखला से घिरा हुआ है, यह पालनपुर से लगभग ६५ कि. मी., माउंट आबू से ४५ किलोमीटर दूर, गुजरात-राजस्थान सीमा पर, श्री अमीरगढ़ से 42 कि. मी. और बनासकांठा जिले में कडियादृ गांव से ५० कि. मी. दुरी पर स्थित हैं । यहाँ, सती का हृदय गिर गया था; आद्या शक्ति देवी, अंबा नाम से और बटुक, भैरव रूप में विद्यमान है। यहाँ देवी यंत्र के रूप में अवस्थित है और केवल इसी रूप में पूजिता हैं; किसी की कोई प्रतिमा नहीं है । अंबा जी मंदिर गब्बर पर्वत के शिखर पर स्थित है । सुंदर पर्यटन स्थलों से युक्त ये एक उत्कृष्ट भ्रमण स्थानों में गिना जाता हैं, सूर्यास्त, गुफाएँ और रोपवे यहाँ के मुख्य आकर्षण का केंद्र हैं । अंबाजी मंदिर सूर्यवंशी सम्राट अरुण सेन द्वारा, ४ शताब्दी में वल्लभी के शासक द्वारा निर्मित किया गया था ।
गुह्येश्वरी शक्तिपीठ, (दोनों घुटनों), काठमांडू, नेपाल ।
गुह्येश्वरी मंदिर, काठमांडू, नेपाल में पशुपति नाथ मंदिर के पास स्थित है । यहाँ, सती के दोनों घुटने गिरे थे, यहाँ देवी महाशिरा के रूप में और कपाली भैरव रूप में विद्यमान है । यहाँ मंदिर पशुपतिनाथ मंदिर के निकट, बागमती नदी के तट पर स्थित है । गुह्येश्वर मंदिर, धर्मशाला (तीर्थयात्रियों विश्राम गृह) से घिरे हुए एक पक्का आँगन में है, 17 वीं सदी में राजा प्रताप मल्ल द्वारा गुहेश्वरी मंदिर बनाया गया था ।
दाक्षायनी शक्तिपीठ, (दांया हाथ), कैलाश पर्वत, तिब्बत, चीन ।
दाक्षायनी शक्तिपीठ, यह तिब्बत में कैलाश पर्वत, मानसरोवर (चीन) के पास एक शिला के रूप में विद्यमान हैं । यहाँ, सती का दाहिने हाथ गिर गया था, देवी यहाँ दाक्षायनी (दक्षा यज्ञ या यज्ञ को नष्ट कर दिया है) के रूप में और अमर भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
बिराज शक्तिपीठ, (नाभि), जाजपुर, भवनेश्वर, ओडिशा, भारत ।
बिराज शक्तिपीठ, लगभग १२५ कि. मी. भुवनेश्वर से उत्तर दिशा में, भारत के ओडिशा राज्य में है। यहाँ देवी विरजा या गिरिजा के नाम से पूजित हैं । यहाँ, सती की नाभि गिरी थी, वह देवी विमला के रूप में और जगन्नाथ भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
गंडकी चंडी शक्तिपीठ, (माथा), मुक्तिनाथ, नेपाल ।
गंडकी चंडी शक्तिपीठ, गंडकी नदी के किनारे स्थित हैं तथा नेपाल में मुक्तिनाथ, धवलगिरि में स्थित है। यहाँ, सती का माथा गिर गया था तथा देवी गंडकी-चंडी के रूप में और चक्रपाणी भैरव के रूप में विद्यमान । इस पवित्र स्थान के महत्व का विष्णु पुराण में वर्णन किया गया है, यह स्थान मुक्तिनाथ, हिंदुओं और बौद्धों के लिए, मुक्ति या मोक्ष प्रदान करने वाला हैं । यह स्थान चक्र निर्मित शालग्राम शीला के लिया विख्यात हैं ।
बहुला शक्तिपीठ, (बांया हाथ), बर्धमान, पश्चिम बंगाल, भारत ।
बहुला शक्तिपीठ, यह पीठ केतुग्राम, कटवा, वर्धमान जिला, पश्चिम बंगाल, भारत में अजय नदी के तट पर स्थित है। यहाँ, सती का बाँया हाथ गिरा था तथा यहाँ देवी बहुला के रूप में तथा भीरुक या सर्व-सिद्धिदायक, भैरव के रूप में अवस्थित हैं । यहाँ देवी अपने दोनों बेटो, कार्तिक और गणेश के साथ विद्यमान है। यह मंदिर १८ वीं सदी में बनाया गया था।
मंगला चंडिका शक्तिपीठ, ( दायी कलाई ), बर्धमान, पश्चिम बंगाल, भारत ।
मंगला चंडिका शक्तिपीठ, यह पीठ बर्द्धमान जिले के गुस्कारा के उजनी ग्राम, भारत, पश्चिम बंगाल में स्थित है। इस पवित्र स्थान पर, सती के दाहिनी कलाई गिर थी,यहाँ देवी मंगला चंडिका या मंगल चंडी के रूप में और कपिलाम्बर भैरव के रूप में विद्यमान है। यह गुस्कारा रेलवे स्टेशन से १६ किलोमीटर दूर हैं ।
त्रिपुरेश्वरी शक्तिपीठ, (दाहिना पैर), उदयपुर, त्रिपुरा, भारत ।
त्रिपुरेश्वरी शक्तिपीठ, यह महाराजा धन्य माणिक्य द्वारा १५०१ ईसवी में बनाया हुआ, बहुत ही शक्तिशाली तंत्र पीठ है । अगरतला, भारत में त्रिपुरा राज्य की राजधानी से करीब ५५ कि. मी. दूर, उदयपुर नमक स्थान पर, राधा किशोरपुर गांव में स्थित है तथा माता बाड़ी के नाम से प्रसिद्ध हैं । यहाँ सती देवी का दाहिना पैर गिरा, यहाँ देवी त्रिपुरेश्वरी या त्रिपुर सुंदरी और त्रिपुरेश भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
भवानी या चन्द्रनाथ शक्तिपीठ, (दाहिनी भुजा), चिटगांव, बांग्लादेश ।
भवानी या चन्द्रनाथ शक्तिपीठ, सीताकुंड चन्द्रनाथ मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है, यह पीठ बांग्लादेश के चंद्र-नाथ पर्वत के पास सीताकुंड स्टेशन, चटगांव, पर स्थित हैं । यहाँ, सती का दाहिना हाथ गिरा था, यहाँ देवी भवानी के रूप में और चंद्रशेखर भैरव के रूप में विद्यमान हैं । यहाँ गरम पानी के प्राकृतिक स्रोत हैं ।
भ्रामरी या त्रिसोता शक्तिपीठ, (बाया पैर), वोड़ागंज, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल, भारत ।
भ्रामरी या त्रिसोता शक्तिपीठ, यह पीठ भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में जलपागुड़ी जिले, के वोड़ागंज ग्राम में तीस्ता नदी के तट पर स्थित हैं । यहाँ, सती के बायाँ पैर गिर गया था, यहाँ देवी भ्रामरी या त्रिस्रोता और अंबर, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
कामाख्या शक्तिपीठ, (योनि या प्रजनन अंग), कामाख्या, आसाम, भारत ।
कामाख्या शक्ति पीठ, सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं महत्त्वपूर्ण, तंत्र पीठ, गुवाहाटी, आसाम, भारत में नील-पर्वत या नीलांचल पर्वत में स्थित है । सती की योनि (प्रजनन अंग), यहाँ गिर गया था । यहाँ देवी कामाख्या और उमानंद भैरव के रूप में विद्यमान हैं । यहाँ पीठ, देव शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया था यहाँ देवी की कोई प्रतिमा नहीं हैं । जिस स्थान पर देवी का प्रजनन अंग गिरा था, वहाँ सर्वदा ही प्राकृतिक जल श्रोत का प्रवाह होता रहता हैं ।
जुगाड़्या शक्तिपीठ, (दाहिने पैर का अंगूठा), खीरग्राम, बर्द्धमान, पश्चिम बंगाल, भारत ।
जुगाड़्या शक्तिपीठ, सती के दाहिने पैर का अँगूठा, भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में बर्द्धमान जिले के खीरग्राम गांव, मंगलकोट ब्लॉक के पास गिरा । यहाँ देवी जुगाड़्या शक्ति और क्षीर खंडक, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
कालिका शक्तिपीठ, दाहिने पैर की चार उँगलियाँ, कोलकाता (कलकत्ता), पश्चिम बंगाल, भारत ।
कालिका शक्तिपीठ, सती के दाहिने पैर के चार उँगलियाँ, आदि गंगा, नदी के तट पर गिरी थी । यह जगह कोलकाता के काली-घाट के नाम से प्रसिद्ध हैं, यह भी सती की पीठो के बीच बहुत प्रसिद्ध पीठ हैं । यहाँ देवी महा काली और नकुलेश्वर भैरव के रूप में विद्यमान हैं । भगवान ब्रह्मा ने इसी स्थान पर बैठ, देवी की साधना की थी । देवी काली की प्रतिमा, ब्रह्मा बेदी पर प्रतिष्ठित हैं, जिस आसन पर बैठ ब्रह्मा जी ने तपस्या की थी ।
ललिता या अलोपी शक्तिपीठ, (दोनों हाथों की उंगलियां), इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत ।
ललिता या अलोपी, प्रयाग शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है । सती के दोनों हाथों की उंगलियां, उत्तर प्रदेश राज्य, भारत के, अक्षय वट, इलाहाबाद के पास गिरा । यहाँ देवी "ललिता" शक्ति और वभ, भैरव के रूप में विद्यमान हैं । यह मंदिर तीन नदियों, गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम, इलाहाबाद किले के निकट स्थित है ।
जयंती शक्तिपीठ, (बाईं जांघ), कलजोरे बौरभग गांव, सिलेट जिला, बांग्लादेश ।
जयंती शक्तिपीठ, सती की बाई जाँघ, बांग्लादेश के कलजोरे बौरभग गाँव के पास जयंतिया पुर, सिलेट जिले में गिरा । यहाँ देवी जयंती शक्ति और क्रमदीश्वर, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
विमला शक्तिपीठ, (मुकुट), मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल, भारत ।
विमला शक्तिपीठ, यह पीठ भारत के पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के लालबाग कोर्ट रोड के पास स्थित है। यहाँ, सती के सर का मुकुट गिरा था, यहाँ देवी विमला के रूप में और संवर्त भैरव, के रूप में विद्यमान हैं ।
श्रावणी शक्तिपीठ, (रीढ़ की हड्डी), कुमारी कुंदा, चटगांव, बांग्लादेश ।
श्रावणी शक्तिपीठ, यह पीठ बांग्लादेश के चटगांव जिले, के कुमारी कुंदा गाँव में हैं । यहाँ, सती की रीढ़ की हड्डी गिरी थी, वह देवी श्रावणी के रूप में और भैरव के रूप में निमिष, विद्यमान हैं ।
सावित्री या भद्रकाली शक्तिपीठ, (टखने की हड्डी), थानेसर, कुरुक्षेत्र, हरियाणा, भारत ।
सावित्री या भद्रकाली शक्तिपीठ, द्वैपायन सरोवर के पास थानेसर, कुरुक्षेत्र, हरियाणा, भारत में हैं । सती के टखने की हड्डी यहाँ गिरी थी, यहाँ देवी सावित्री या भद्र काली, स्वरूप में और स्थाणु, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
गायत्री शक्तिपीठ, (कंगन), पुष्कर, राजस्थान, भारत ।
गायत्री शक्तिपीठ, भारत के राजस्थान राज्य, अजमेर में पुष्कर पर्वत श्रृंखला पर, सती के दो कंगन गिरे थे । यहाँ देवी गायत्री और "सर्वानंद भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
महालक्ष्मी शक्तिपीठ, (गर्दन), जौनपुर, सिलेट, बांग्लादेश ।
महालक्ष्मी शक्तिपीठ, बांग्लादेश में सिलेट शहर से 3 कि. मी. उत्तर-पूर्व, जौनपुर गांव के श्री-शैल पर, सती की गर्दन गिरी थी । यहाँ देवी महा-लक्ष्मी (धन की देवी) और शम्बरानन्द, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
देवगर्भ या कनकलेश्वरी शक्तिपीठ, (अस्थि), कनकली ताला या काँच, बोलपुर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत ।
देवगर्भ या कनकलेश्वरी शक्तिपीठ, सती की अस्थियां, भारत में पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में, बोलपुर (शांतिनिकेतन) के उत्तर पूर्व में कोपाई नदी के तट पर, गिरी । यहां देवी कनकलेश्वरी और रुरु, भैरव के रूप में अवस्थित हैं ।
काली शक्तिपीठ, (बायां कूल्हा), अमरकंटक, शहडोल, मध्य प्रदेश, भारत ।
काली शक्तिपीठ, सती की वाम भाग का कूल्हा, भारत के मध्य प्रदेश राज्य, शहडोल जिले के अमरकंटक नमक स्थान पर सोन नदी के तट पर, एक गुफा में गिरी । यहाँ देवी काली और असितांग, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
नर्मदा शक्तिपीठ, (दांया कूल्हा), सोनदेश, अमरकंटक, मध्य प्रदेश, भारत ।
नर्मदा शक्तिपीठ, सती का दाहिना कूल्हा, भारत में मध्य प्रदेश राज्य, के शहडोल जिले में सोनदेश, अमरकंटक नमक स्थान पर, नर्मदा नदी के उद्गम स्थान पर गिरा । यहाँ देवी नर्मदा और भद्रसेन, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
शिवानी शक्तिपीठ, (दांया स्तन), सीतापुर, चित्रकूट, उत्तर प्रदेश, भारत ।
शिवानी शक्तिपीठ, सती का दाहिना स्तन, भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के चित्रकूट जिले, सीतापुर गांव के रामगिरी पर्वत श्रंखला में गिरी । यहाँ देवी शिवानी और चांद, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
उमा शक्तिपीठ, (चूड़ामणि), वृन्दावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश, भारत ।
उमा शक्तिपीठ, सती के बालों की चूड़ामणि, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य, के मथुरा जिले में, वृंदावन, भूतेश्वर मंदिर के पास गिरा । यह स्थान, भगवान कृष्ण के जन्म स्थान के रूप में प्रसिद्ध है । यहाँ देवी उमा और भूतेश, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
नारायणी शक्तिपीठ, (ऊपरी जबड़े के दांत), कन्याकुमारी, तमिलनाडु, भारत ।
नारायणी शक्तिपीठ, यह पीठ भारत के तमिलनाडु राज्य की कन्या-कुमारी नमक स्थान के पास शुचितीर्थम में विद्यमान हैं । यहाँ, सती के ऊपरी जबड़े के दांत गिरे थे तथा देवी नारायणी और संहार, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
अपर्णा शक्तिपीठ, (वाम पैर का नुपुर), शेरपुर, बागुरा, बांग्लादेश ।
अपर्णा शक्तिपीठ, यह पीठ बांग्लादेश के बागरा जिले के भवानी पुर गाँव में है । यहाँ, सती की वाम पैर का पायल या नूपुर गिर गया था तथा यहाँ देवी अपर्णा के रूप में है और वामन, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
सुंदरी या बाला-त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ, (दाहिने पैर का पायल या नुपुर), त्रिपुरान्तकम्, श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश, भारत ।
सुंदरी या बाला-त्रिपुर सुंदरी, सती के दाहिने पैर का पायल या नूपुर, भारत के आंध्र प्रदेश राज्य, श्रीशैलम के पास, त्रिपुरान्तकम् में गिरी । यहां देवी सुंदरी या बाला-त्रिपुर सुंदरी और सुन्दरनन्द, भैरव के रूप में अधिष्ठित हैं ।
कपालिनी शक्तिपीठ, (बाएं टखने), तामलुक, मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल, भारत ।
कपालिनी शक्तिपीठ, सती के बाएँ टखने, भारत में पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में तामलुक, मैं गिरा । यहां देवी, कपालिनी शक्ति और सर्वानंद, भैरव के रूप में प्रतिष्ठित हैं ।
चंद्रभागा शक्तिपीठ, (पेट), जूनागढ़, गुजरात, भारत ।
चंद्रभागा शक्तिपीठ, देवी सती का पेट या आमाशय, भारत के गुजरात राज्य के जूनागढ़ जिले में सोमनाथ, वेरावल, सौराष्ट्र या प्रभास क्षेत्र में गिरी । यहाँ भगवान शिव का सोमनाथ नमक ज्योतिर्लिंग विद्यमान हैं । यहाँ देवी चंद्रभागा शक्ति के रूप में और वक्रतुंड, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
अवंती शक्तिपीठ, (ऊपरी होंठ), उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत ।
अवंती शक्तिपीठ, देवी सती का ऊपरी होंठ, भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन में गिरा । यहाँ महाकालेश्वर नाम से भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग हैं । यहाँ देवी अवंती शक्ति के रूप में और लम्बकर्ण, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
भ्रामरी शक्तिपीठ, (दोनों ठोड़ी), नासिक, महाराष्ट्र, भारत ।
भ्रामरी शक्तिपीठ, सती की ठोड़ी के दोनों हिस्से, भारत के महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले के गोदावरी नदी-घाटी में जनस्थान में गिरी । यहाँ देवी, भ्रामरी शक्ति के रूप में और वक्रकाटाक्ष, भैरव के रूप में अवस्थित हैं ।
विश्वेश्वरी शक्तिपीठ, (गाल), राजमुंदरी, आंध्र प्रदेश, भारत ।
विश्वेश्वरि द्राक्षरमं शक्तिपीठ, भारत के आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी जिले के पास, सती के गाल गिरे थे । यहाँ वह विश्वेश्वरि शक्ति के रूप में और वत्साम्भा, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
अम्बिका शक्तिपीठ, (बाएँ पैर की उंगलियां), भरतपुर, राजस्थान, भारत ।
अंबिका शक्तिपीठ, भारत में राजस्थान में भरतपुर जिले के बिरात में, सती के बाएँ पैर की उंगलियां गिरी थी । यहाँ देवी, अंबिका शक्ति के रूप में और अमृतेश्वर, भैरव के रूप में अधिष्ठित हैं ।
कुमारी शक्तिपीठ, (दाएँ कंधे), कृष्णागर, हुगली, पश्चिम बंगाल, भारत ।
कुमारी शक्तिपीठ, खनकुल ग्राम के रत्नाकर नदी के तट पर, भारत, पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के कृष्णागर, सती के दाहिने कंधे गिरे थे । यहाँ देवी, कुमारी शक्ति के रूप में और शिव, भैरव के रूप में प्रतिष्ठित हैं ।
उमा शक्तिपीठ, (बाएं कंधे), मिथिला, बिहार, भारत ।
उमा शक्तिपीठ, भारत के, बिहार राज्य (इंडो नेपाल सीमा के पास), मिथिला में, जनकपुर रेलवे स्टेशन के पास, सती का बायाँ कन्धा गिर था । यहाँ देवी, उमा या नील-सरस्वती शक्ति के रूप में और महोदर, भैरव के रूप में अवस्थित हैं ।
नल्हाटेश्वरी या कालिका, (गले की नली), नलहाटी, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत ।
नल्हाटेश्वरी या कालिका, यह पीठ भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम जिले के, नलहाटी में स्थित हैं । यहाँ, सती के गले की नाली गिरी थी, यहाँ देवी, नल्हाटेश्वरी शक्ति रूप में और योगेश, भैरव रूप में प्रकट हैं ।
चामुंडेश्वरी या दुर्गा शक्तिपीठ, (दोनों कान), मैसूर, कर्नाटक, भारत ।
चामुंडेश्वरी या दुर्गा, यह पीठ भारत के कर्नाटक राज्य के मैसूर के चामुंडी पर्वत पर हैं । यहाँ देवी, सती के दोनों कान गिरे, देवी यहाँ जय दुर्गा शक्ति और अभिरु भैरव के रूप में अवस्थित हैं ।
महिषमर्दिनी शक्तिपीठ, (भौंहें), वक्रेश्वर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत ।
महिषमर्दिनी शक्तिपीठ, यह पीठ भारत के पश्चिम बंगाल राज्य, बीरभूम जिले के वक्रेश्वर में पम्प्हारा नदी के तट पर अवस्थित हैं । यहाँ देवी सती, कि भौंहें गिरी थी तथा यहाँ देवी महिषमर्दिनी शक्ति रूप में और वक्रनाथ, भैरव के रूप में अवस्थित हैं । यहाँ २०० डिग्री सेल्सियस तापमान तक के गरम पानी के श्रोत हैं, जो अनेक प्रकार के अलौकिक शक्तिओ से सम्पन्न हैं ।
योगेश्वरी शक्तिपीठ, (पैर और हाथ के तलवे), खुलना, बांग्लादेश ।
योगेश्वर शक्तिपीठ, यह पीठ शक्ति काली को समर्पित हैं तथा ईस्वरीपुर गांव, जेसोर, खुलना जिला, बांग्लादेश में हैं तथा जसोरेश्वरी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हैं । महाराजा प्रतापादित्य ने इस शक्ति पीठ की खोज की तथा वे इस स्थान में काली की पूजा करते हैं। यहाँ देवी सती, के हाथ तथा पैर के तलवे गिरे थे, देवी योगेश्वरी शक्ति के रूप में और चंदा, भैरव के रूप में विद्यमान हैं ।
फुल्लौरा शक्तिपीठ, (निचले होंठ), लाभपुर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत ।
फुल्लौरा शक्तिपीठ, यह पीठ भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम जिले में, लाभपुर नमक गांव में स्थित हैं । यहाँ, देवी सती के निचले होंठ गिरे थे, देवी फुल्लौरा शक्ति के रूप में और विश्वेश, भैरव के रूप में अवस्थित हैं । यह मंदिर इमली के पेड़ो से घिरा हुआ है ।
नंदिनी शक्तिपीठ, (गर्दन अस्थि), नन्दीपुर ग्राम, सैंथिया, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत ।
नंदिनी या नदीकेश्वरी शक्तिपीठ, यह पीठ नन्दीपुर ग्राम, सैंथिया रेलवे स्टेशन के पास, बीरभूम जिला, पश्चिम बंगाल, भारत में अवस्थित हैं । यहाँ देवी सती की गर्दन अस्थि गिरी थी, यहाँ देवी नंदिनी या नन्दिकेश्वरी शक्ति और नंदिकेश्वर, भैरव के रूप में विद्यमान हैं । देवी कि विग्रह यहाँ सिंदूर से लिप्त है जो बड़ी चट्टान के आकार लिये, कछुये के पीठ के समान हैं ।
इन्द्राक्षी शक्तिपीठ, (पायल), जाफना, श्रीलंका ।
इन्द्राक्षी शक्तिपीठ, यह पीठ नैनातिवु (मणिपल्लवम्), श्रीलंका के जाफना के नल्लूर में स्थित हैं । देवराज इंद्र ने यहाँ पर देवी आदि शक्ति काली के पूजा की थी । दानव रावण (श्रीलंका के शासक या राजा) और भगवान राम ने भी यहाँ, देवी शक्ति की पूजा की हैं । यहाँ देवी सती कि पायल (आभूषण) गिरी थी तथा यहाँ देवी इन्द्राक्षी शक्ति के रूप में और राक्षसेश्वर,भैरव के रूप में अवस्थित हैं ।

Sunday, June 28, 2015

हनुमानजी के 10 रहस्य जानकर आप रह जाएंगे हैरान..

हनुमानजी के 10 रहस्य जानकर आप रह जाएंगे हैरान..
हनुमानजी इस कलियुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे। वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं। वे कहां रहते हैं, कब-कब व कहां-कहां प्रकट होते हैं और उनके दर्शन कैसे और किस तरह किए जा सकते हैं, हम यह आपको बताएंगे अगले पन्नों पर। और हां, अंतिम दो पन्नों पर जानेंगे आप एक ऐसा रहस्य जिसे जानकर आप सचमुच ही चौंक जाएंगे.
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरिभक्त कहाई॥
और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥

चारों युग में हनुमानजी के ही परताप से जगत में उजियारा है। हनुमान को छोड़कर और किसी देवी-देवता में चित्त धरने की कोई आवश्यकता नहीं है। द्वंद्व में रहने वाले का हनुमानजी सहयोग नहीं करते हैं। हनुमानजी हमारे बीच इस धरती पर सशरीर मौजूद हैं। किसी भी व्यक्ति को जीवन में श्रीराम की कृपा के बिना कोई भी सुख-सुविधा प्राप्त नहीं हो सकती है। श्रीराम की कृपा प्राप्ति के लिए हमें हनुमानजी को प्रसन्न करना चाहिए। उनकी आज्ञा के बिना कोई भी श्रीराम तक पहुंच नहीं सकता। हनुमानजी की शरण में जाने से सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं। इसके साथ ही जब हनुमानजी हमारे रक्षक हैं तो हमें किसी भी अन्य देवी, देवता, बाबा, साधु, ज्योतिष आदि की बातों में भटकने की जरूरत नहीं।
-------------युवाओं के आइडल बजरंग बली-------------
हनुमान इस कलियुग में सबसे ज्यादा जाग्रत और साक्षात हैं। कलियुग में हनुमानजी की भक्ति ही लोगों को दुख और संकट से बचाने में सक्षम है। बहुत से लोग किसी बाबा, देवी-देवता, ज्योतिष और तांत्रिकों के चक्कर में भटकते रहते हैं और अंतत: वे अपना जीवन नष्ट ही कर लेते हैं... क्योंकि वे हनुमान की भक्ति-शक्ति को नहीं पहचानते। ऐसे भटके हुए लोगों का राम ही भला करे।

क्यों प्रमुख देव हैं हनुमान : हनुमानजी 4 कारणों से सभी देवताओं में श्रेष्ठ हैं। पहला यह कि वे रीयल सुपरमैन हैं, दूसरा यह कि वे पॉवरफुल होने के बावजूद ईश्वर के प्रति समर्पित हैं, तीसरा यह कि वे अपने भक्तों की सहायता तुरंत ही करते हैं और चौथा यह कि वे आज भी सशरीर हैं। इस ब्रह्मांड में ईश्वर के बाद यदि कोई एक शक्ति है तो वह है हनुमानजी। महावीर विक्रम बजरंगबली के समक्ष किसी भी प्रकार की मायावी शक्ति ठहर नहीं सकती।
क्या हनुमानजी बंदर थे? : हनुमान का जन्म कपि नामक वानर जाति में हुआ था। नए शोधानुसार प्रभु श्रीराम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व अयोध्या में हुआ था। श्रीराम के जन्म के पूर्व हनुमानजी का जन्म हुआ था अर्थात आज (फरवरी 2015) से लगभग 7129 वर्ष पूर्व हनुमानजी का जन्म हुआ था। शोधकर्ता कहते हैं कि आज से 9 लाख वर्ष पूर्व एक ऐसी विलक्षण वानर जाति भारतवर्ष में विद्यमान थी, जो आज से 15 से 12 हजार वर्ष पूर्व लुप्त होने लगी थी और अंतत: लुप्त हो गई। इस जाति का नामकपि था।


हनुमानजी के संबंध में यह प्रश्न प्राय: सर्वत्र उठता है कि 'क्या हनुमानजी बंदर थे?' इसके लिए कुछ लोग रामायणादि ग्रंथों में लिखे हनुमानजी और उनके सजातीय बांधव सुग्रीव अंगदादि के नाम के साथ 'वानर, कपि, शाखामृग, प्लवंगम' आदि विशेषण पढ़कर उनके बंदर प्रजाति का होने का उदाहरण देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि उनकी पुच्छ, लांगूल, बाल्धी और लाम से लंकादहन का प्रत्यक्ष चमत्कार इसका प्रमाण है। यह *भी कि उनकी सभी जगह सपुच्छ प्रतिमाएं देखकर उनके पशु या बंदर जैसा होना सिद्ध होता है। रामायणमें वाल्मीकिजी ने जहां उन्हें विशिष्ट पंडित, राजनीति में धुरंधर और वीर-शिरोमणि प्रकट किया है, वहीं उनको लोमश ओर पुच्छधारी भी शतश: प्रमाणों में व्यक्त किया है।
दरअसल, आज से 9 लाख वर्ष पूर्व मानवों की एक ऐसी जाति थी, जो मुख और पूंछ से वानर समान नजर आती थी, लेकिन उस जाति की बुद्धिमत्ता और शक्ति मानवों से कहीं ज्यादा थी। अब वह जाति भारत में तो दुर्भाग्यवश विनष्ट हो गई, परंतु बाली द्वीप में अब भी पुच्छधारी जंगली मनुष्यों का अस्तित्व विद्यमान है जिनकी पूछ प्राय: 6 इंच के लगभग अवशिष्ट रह गई है। ये सभी पुरातत्ववेत्ता अनुसंधायक एकमत से स्वीकार करते हैं कि पुराकालीन बहुत से प्राणियों की नस्ल अब सर्वथा समाप्त हो चुकी है।

पहला जन्म स्थान : हनुमानजी की माता का नाम अंजना है, जो अपने पूर्व जन्म में एक अप्सरा थीं। हनुमानजी के पिता का नाम केसरी है, जो वानर जाति के थे। माता-पिता के कारण हनुमानजी को आंजनेय और केसरीनंदन कहा जाता है। केसरीजी को कपिराज कहा जाता था, क्योंकि वे वानरों की कपि नाम की जाति से थे। केसरीजी कपि क्षेत्र के राजा थे। कपिस्थल कुरु साम्राज्य का एक प्रमुख भाग था। हरियाणा का कैथल पहले करनाल जिले का भाग था। यह कैथल ही पहले कपिस्थल था। कुछ लोग मानते हैं कि यही हनुमानजी का जन्म स्थान है।


दूसरा जन्म स्थान : गुजरात के डांग जिले के आदिवासियों की मान्यता अनुसार डांग जिले के अंजना पर्वत में स्थित अंजनी गुफा में ही हनुमानजी का जन्म हुआ था।

तीसरा स्थान : कुछ लोग मानते हैं कि हनुमानजी का जन्म झारखंड राज्य के उग्रवाद प्रभावित क्षे*त्र गुमला जिला मुख्*यालय से 20 किलोमीटर दूर आंजन गांव की एक गुफा में हुआ था।

अंत में आखिर कहां जन्म लिया? : 'पंपासरोवर' अथवा 'पंपासर' होस्पेट तालुका, मैसूर का एक पौराणिक स्थान है। हंपी के निकट बसे हुए ग्राम अनेगुंदी को रामायणकालीन किष्किंधा माना जाता है। तुंगभद्रा नदी को पार करने पर अनेगुंदी जाते समय मुख्य मार्ग से कुछ हटकर बाईं ओर पश्चिम दिशा में, पंपासरोवर स्थित है। यहां स्थित एक पर्वत में एक गुफा भी है जिसे रामभक्तनी शबरी के नाम पर 'शबरी गुफा' कहते हैं। इसी के निकट शबरी के गुरु मतंग ऋषि के नाम पर प्रसिद्ध 'मतंगवन' था। हंपी में ऋष्यमूक के राम मंदिर के पास स्थित पहाड़ी आज भी मतंग पर्वत के नाम से जानी जाती है। कहते हैं कि मतंग ऋषि के आश्रम में ही हनुमानजी का जन्म हआ था। मतंग नाम की आदिवासी जाति से हनुमानजी का गहरा संबंध रहा है जिसका खुलासा होगा अगले पन्नों पर...
क्यों आज भी जीवित हैं हनुमानजी? : हनुमानजी इस कलयुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे। वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं। हनुमानजी को धर्म की रक्षा के लिए अमरता का वरदान मिला था। इस वरदान के कारण आज भी हनुमानजी जीवित हैं और वे भगवान के भक्तों तथा धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं। जब कल्कि रूप में भगवान विष्णु अवतार लेंगे तब हनुमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, विश्वामित्र, विभीषण और राजा बलि सार्वजनिक रूप से प्रकट हो
कलयुग में श्रीराम का नाम लेने वाले और हनुमानजी की भक्ति करने वाले ही सुरक्षित रह सकते हैं। हनुमानजी अपार बलशाली और वीर हैं और उनका कोई सानी नहीं है। धर्म की स्थापना और रक्षा का कार्य 4 लोगों के हाथों में है- दुर्गा, भैरव, हनुमान और कृष्ण।
चारों जुग परताप तुम्हारा : लंका विजय कर अयोध्या लौटने पर जब श्रीराम उन्हें युद्घ में सहायता देने वाले विभीषण, सुग्रीव, अंगद आदि को कृतज्ञतास्वरूप उपहार देते हैं तो हनुमानजी श्रीराम से याचना करते हैं- यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशय:।।
अर्थात : 'हे वीर श्रीराम! इस पृथ्वी पर जब तक रामकथा प्रचलित रहे, तब तक निस्संदेह मेरे प्राण इस शरीर में बसे रहें।' इस पर श्रीराम उन्हें आशीर्वाद देते हैं- 'एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशय:। चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका तावत् ते भविता कीर्ति: शरीरे प्यवस्तथा। लोकाहि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति में कथा।'

अर्थात् : 'हे कपिश्रेष्ठ, ऐसा ही होगा, इसमें संदेह नहीं है। संसार में मेरी कथा जब तक प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे ही। जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं भी स्थिर रहेंगी।'

चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा।।
1. त्रेतायुग में हनुमान : त्रेतायुग में तो पवनपुत्र हनुमान ने केसरीनंदन के रूप में जन्म लिया और वे राम के भक्त बनकर उनके साथ छाया की तरह रहे। वाल्मीकि 'रामायण' में हनुमानजी के संपूर्ण चरित्र का उल्लेख मिलता है।

2. द्वापर में हनुमान : द्वापर युग में हनुमानजी भीम की परीक्षा लेते हैं। इसका बड़ा ही सुंदर प्रसंग है। महाभारत में प्रसंग है कि भीम उनकी पूंछ को मार्ग से हटाने के लिए कहते हैं तो हनुमानजी कहते हैं कि तुम ही हटा लो, लेकिन भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूंछ नहीं हटा पाते हैं। इस तरह एक बार हनुमानजी के माध्यम से श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र और गरूड़ की शक्ति के अभिमान का मान-मर्दन करते हैं।

हनुमान की मदद से कृष्ण ने तोड़ा इनका अभिमान...

. कलयुग में हनुमान : यदि मनुष्य पूर्ण श्रद्घा और विश्वास से हनुमानजी का आश्रय ग्रहण कर लें तो फिर तुलसीदासजी की भांति उसे भी हनुमान और राम-दर्शन होने में देर नहीं लगेगी। कलियुग में हनुमानजी ने अपने भ*क्तों को उनके होने का आभास कराया है |

ये वचन हनुमानजी ने ही तुलसीदासजी से कहे थे- 'चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर। तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।।'
कहां रहते हैं हनुमानजी? : हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद् भागवत में वर्णन आता है। उल्लेखनीय है कि अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे थे। एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंच गए थे, जहां उन्होंने हनुमान को लेटे देखा और फिर हनुमान ने भीम का घमंड चूर कर दिया था।
''यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तन तत्र कृत मस्तकान्जलि।
वाष्प वारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तक॥'
अर्थात : कलियुग में जहां-जहां भगवान श्रीराम की कथा-कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं। सीताजी के वचनों के अनुसार- 'अजर-अमर गुन निधि सुत होऊ।। करहु बहुत रघुनायक छोऊ।।'

गंधमादन पर्वत क्षेत्र और वन : गंधमादन पर्वत का उल्लेख कई पौराणिक हिन्दू धर्मग्रंथों में हुआ है। महाभारत की पुरा-कथाओं में भी गंधमादन पर्वत का वर्णन प्रमुखता से आता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यहां के विशालकाय पर्वतमाला और वन क्षेत्र में देवता रमण करते हैं। पर्वतों में श्रेष्ठ इस पर्वत पर कश्यप ऋषि ने भी तपस्या की थी। गंधमादन पर्वत के शिखर पर किसी भी वाहन से नहीं पहुंचा जा सकता। गंधमादन में ऋषि, सिद्ध, चारण, विद्याधर, देवता, गंधर्व, अप्सराएं और किन्नर निवासकरते हैं। वे सब यहां निर्भीक विचरण करते हैं।

वर्तमान में कहां है गंधमादन पर्वत? : इसी नाम से एक और पर्वत रामेश्वरम के पास भी स्थित है, जहां से हनुमानजी ने समुद्र पार करने के लिए छलांग लगाई थी, लेकिन हम उस पर्वत की नहीं बात कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत की। यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था। सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था। आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है।पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था।

कैसे पहुंचे गंधमादन : पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था। इस क्षेत्र में दो रास्तों से जाया जा सकता है। पहला नेपाल के रास्ते मानसरोवर से आगे और दूसरा भूटान की पहाड़ियों से आगे और तीसरा अरुणाचल के रास्ते चीन होते हुए। संभवतमहाभारत काल में अर्जुन ने असम के एक तीर्थ में जब हनुमानजी से भेंट की थी, तो हनुमानजी भूटान या अरुणाचल के रास्ते ही असम तीर्थ में आए होंगे। गौरतलब है कि एक गंधमादन पर्वत उड़िसा में भी बताया जाता है लेकिन हम उस पर्वत की बात नहीं कर रहे हैं।
मकरध्वज था हनुमानजी का पुत्र : अहिरावण के सेवक मकरध्वज थे। मकरध्वज को अहिरावण ने पाताल पुरी का रक्षक नियुक्त कर दिया था।

पवनपुत्र हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी थे तब कैसे कोई उनका पुत्र हो सकता है? वाल्मीकि रामायण के अनुसार उनके पुत्र की कथा हनुमानजी के लंकादहन से जुड़ी है। कथा जानने के लिए आगे क्लिक करे...कौन था हनुमानजी का पुत्र, जानिए:
करध्वज था हनुमानजी का पुत्र : अहिरावण के सेवक मकरध्वज थे। मकरध्वज को अहिरावण ने पाताल पुरी का रक्षक नियुक्त कर दिया था।

पवनपुत्र हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी थे तब कैसे कोई उनका पुत्र हो सकता है? वाल्मीकि रामायण के अनुसार उनके पुत्र की कथा हनुमानजी के लंकादहन से जुड़ी है। कथा जानने के लिए आगे क्लिक करे...कौन था हनुमानजी का पुत्र, जानिए:

हनुमानजी की ही तरह मकरध्वज भी वीर, प्रतापी, पराक्रमी और महाबली थे। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण कोमुक्त कराया और मकरध्वज को पाताल लोक का अधिपति नियुक्त करते हुए उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी थी
हनुमानजी की पत्नी का नाम : क्या अपने कभी सुना है कि हनुमानजी का विवाह भी हुआ था? आज तक यह बात लोगों से छिपी रही, क्योंकि लोग हिन्दू शास्त्र नहीं पढ़ते और जो पंडित या आचार्य शास्त्र पढ़ते हैं वे ऐसी बातों का जिक्र नहीं करते हैं लेकिन आज हम आपको बता रहे हैं हनुमानजी का एक ऐसा सच जिसको जानकर आप रह जाएंगे हैरान...
आंध्रप्रदेश के खम्मम जिले में एक मंदिर ऐसा विद्यमान है, जो प्रमाण है हनुमानजी के विवाह का। इस मंदिर में हनुमानजी की प्रतिमा के साथ उनकी पत्नी की प्रतिमा भी विराजमान है। इस मंदिर के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। माना जाता है कि हनुमानजी के उनकी पत्नी के साथ दर्शन करने के बाद पति-पत्नी के बीच चल रहे सारे विवाद समाप्त हो जाते हैं। उनके दर्शन के बाद जो भी विवाद की शुरुआत करता है, उसका बुरा होता है।
हनुमानजी की पत्नी का नाम सुवर्चला था। वैसे तो हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी हैं और आज भी वे ब्रह्मचर्य के व्रत में ही हैं, विवाह करने का मतलब यह नहीं कि वे ब्रह्मचारी नहीं रहे। कहा जाता है कि पराशर संहिता में हनुमानजी का किसी खास परिस्थिति में विवाह होने का जिक्र है। कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण ही बजरंगबली को सुवर्चला के साथ विवाह बंधन में बंधना पड़ा।



इस संबंध में एक कथा है कि हनुमानजी ने भगवान सूर्य को अपना गुरु बनाया था। हनुमानजी भगवान सूर्य से अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। सूर्य कहीं रुक नहीं सकते थे इसलिए हनुमानजी को सारा दिन भगवान सूर्य के रथ के साथ-साथ उड़ना पड़ता था और भगवान सूर्य उन्हें तरह-तरह की विद्याओं का ज्ञान देते। लेकिन हनुमानजी को ज्ञान देते समय सूर्य के सामने एक दिन धर्मसंकट खड़ा हो गया।

कुल 9 तरह की विद्याओं में से हनुमानजी को उनके गुरु ने 5 तरह की विद्याएं तो सिखा दीं, लेकिन बची 4 तरह की विद्याएं और ज्ञान ऐसे थे, जो केवल किसी विवाहित को ही सिखाए जा सकते थे। हनुमानजी पूरी शिक्षा लेने का प्रण कर चुके थे और इससे कम पर वे मानने को राजी नहीं थे। इधर भगवान सूर्य के सामने संकट था कि वे धर्म के अनुशासन के कारण किसी अविवाहित को कुछ विशेष विद्याएं नहीं सिखा सकते थे। ऐसी स्थिति में सूर्यदेव ने हनुमानजी को विवाह की सलाह दी।

अपने प्रण को पूरा करने के लिए हनुमानजी ने विवाह करने की सोची। लेकिन हनुमानजी के लिए वधू कौन हो और कहां से वह मिलेगी? इसेलेकर सभी सोच में पड़ गए। ऐसे में सूर्यदेव ने अपनी परम तपस्वी और तेजस्वी पुत्री सुवर्चला को हनुमानजी के साथ शादी के लिए तैयार कर लिया। इसके बाद हनुमानजी ने अपनी शिक्षा पूर्ण की और सुवर्चला सदा के लिए अपनी तपस्या में रत हो गई। इस तरह हनुमानजी भले ही शादी के बंधन में बंध गए हो, लेकिन शारीरिक रूप से वे आज भी एक ब्रह्मचारी ही हैं।क्यों सिन्दूर चढ़ता है हनुमानजी को? : हनुमानजी को सिन्दूर बहुत ही प्रिय है। इसके पीछे ये कारण बताया जाता है कि एक दिन भगवान हनुमानजी माता सीता के कक्ष में पहुंचे। उन्होंने देखा माता लाल रंग की कोई चीज मांग में सजा रही है। हनुमानजी ने जब माता से पूछा, तब माता ने कहा कि इसे लगाने से प्रभु राम की आयु बढ़ती है औरप्रभु का स्नेह प्राप्त होता है।
हनुमानजी ने सोचा जब माता इतना-सा सिन्दूर लगाकर प्रभु का इतना स्नेह प्राप्त कर रही है तो अगर मैं इनसे ज्यादा लगाऊं तो मुझे प्रभु का स्नेह, प्यार और ज्यादा प्राप्त होगा और प्रभु की आयु भी लंबी होगी। ये सोचकर उन्होंने अपने सारे शरीर में सिन्दूर का लेप लगा लिया। इसलिए कहा जाता है कि भगवान हनुमानजी को सिन्दूर लगाना बहुत पसंद है।
पहली हनुमान स्तुति : हनुमानजी की प्रार्थना में तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान बहुक आदि अनेक स्तोत्र लिखे, लेकिन हनुमानजी की पहली स्तुति किसने की थी? तुलसीदासजी के पहले भी कई संतों और साधुओं ने हनुमानजी की श्रद्धा में स्तुति लिखी है। लेकिन क्या आप जानते हैं सबसे पहले हनुमानजी की स्तुति किसने की थी?

जब हनुमानजी लंका का दहन कर रहे थे तब उन्होंने अशोक वाटिका को इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि वहां सीताजी को रखा गया था। दूसरी ओर उन्होंने विभीषण का भवन इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि विभीषण के भवन के द्वार पर तुलसी का पौधा लगा था। भगवान विष्णु का पावन चिह्न शंख, चक्र और गदा भी बना हुआ था। सबसे सुखद तो यह कि उनके घर के ऊपर 'राम' नाम अंकित था। यह देखकर हनुमानजी ने उनके भवन को नहीं जलाया।

विभीषण के शरण याचना करने पर सुग्रीव ने श्रीराम से उसे शत्रु का भाई व दुष्ट बताकर उनके प्रति आशंका प्रकट की और उसे पकड़कर दंड देने का सुझाव दिया। हनुमानजी ने उन्हें दुष्ट की बजाय शिष्ट बताकर शरणागति देने की वकालत की
इस पर श्रीरामजी ने विभीषण को शरणागति न देने के सुग्रीव के प्रस्ताव को अनुचित बताया और हनुमानजी से कहा कि आपका विभीषण को शरण देना तो ठीक है किंतु उसे शिष्ट समझना ठीक नहीं है
इस पर श्री हनुमानजी ने कहा कि तुम लोग विभीषण को ही देखकर अपना विचार प्रकट कर रहे हो मेरी
ओर से भी तो देखो, मैं क्यों और क्या चाहता हूं...। फिर कुछ देर हनुमानजीने रुककर कहा- जो एक बार विनीत भाव से मेरी शरण की याचना करता है और कहता है- 'मैं तेरा हूं, उसे मैं अभयदान प्रदान कर देता हूं। यह मेरा व्रत है इसलिए विभीषण को अवश्य शरण दी जानी चाहए

पहली हनुमान स्तुति : हनुमानजी की प्रार्थना में तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान बहुक आदि अनेक स्तोत्र लिखे, लेकिन हनुमानजी की पहली स्तुति किसने की थी? तुलसीदासजी के पहले भी कई संतों और साधुओं ने हनुमानजी की श्रद्धा में स्तुति लिखी है। लेकिन क्या आप जानते हैं सबसे पहले हनुमानजी की स्तुति किसने की थी?

जब हनुमानजी लंका का दहन कर रहे थे तब उन्होंने अशोक वाटिका को इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि वहां सीताजी को रखा गया था। दूसरी ओर उन्होंने विभीषण का भवन इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि विभीषण के भवन के द्वार पर तुलसी का पौधा लगा था। भगवान विष्णु का पावन चिह्न शंख, चक्र और गदा भी बना हुआ था। सबसे सुखद तो यह कि उनके घर के ऊपर 'राम' नाम अंकित था। यह देखकर हनुमानजी ने उनके भवन को नहीं जलाया।

विभीषण के शरण याचना करने पर सुग्रीव ने श्रीराम से उसे शत्रु का भाई व दुष्ट बताकर उनके प्रति आशंका प्रकट की और उसे पकड़कर दंड देने का सुझाव दिया। हनुमानजी ने उन्हें दुष्ट की बजाय शिष्ट बताकर शरणागति देने की वकालत की। इस पर श्रीरामजी ने विभीषण को शरणागति न देने के सुग्रीव के प्रस्ताव को अनुचित बताया और हनुमानजी से कहा कि आपका विभीषण को शरण देना तो ठीक है किंतु उसे शिष्ट समझना ठीक नहीं है।


इस पर श्री हनुमानजी ने कहा कि तुम लोग विभीषण को ही देखकर अपना विचार प्रकट कर रहे हो मेरी ओर से भी तो देखो, मैं क्यों और क्या चाहता हूं...। फिर कुछ देर हनुमानजी ने रुककर कहा- जो एक बार विनीत भाव से मेरी शरण की याचना करता है और कहता है- 'मैं तेरा हूं, उसे मैं अभयदान प्रदान कर देता हूं। यह मेरा व्रत है इसलिए विभीषण को अवश्य शरण दी जानी चाहिए।'

इंद्रा*दि देवताओं के बाद धरती पर सर्वप्रथम विभीषण ने ही हनुमानजी की शरण लेकर उनकी स्तुति की थी। विभीषण को भी हनुमानजी की तरह चिरंजीवी होने का वरदान मिला है। वे भी आज सशरीर जीवित हैं। विभीषण ने हनुमानजी की स्तुति में एक बहुत ही अद्भुत और अचूक स्तोत्र की रचना की है। विभीषण द्वारा रचित इस स्तोत्र को 'हनुमान वडवानल स्तोत्र कहते हैं।

सब सुख लहे तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डरना।।

हनुमान की शरण में भयमुक्त जीवन : हनुमानजीने सबसे पहले सुग्रीव को बाली से बचाया और सुग्रीव को श्रीराम से मिलाया। फिर उन्होंने विभीषण को रावण से बचाया और उनको राम से मिलाया। हनुमानजी की कृपा से ही दोनों को ही भयमुक्त जीवन और राजपद मिला। इसी तरह हनुमानजी ने अपने जीवन में कई राक्षसों और साधु-संतों को भयमुक्त और जीवनमुक्त किया है।
एक वेबसाइट का दावा है कि प्रत्येक 41 साल बाद हनुमानजी श्रीलंका के जंगलों में प्राचीनकाल से रह रहे आदिवासियों से मिलने के लिए आते हैं। वेबसाइट के मुताबिक श्रीलंका के जंगलों में कुछ ऐसे कबीलाई लोगों का पता चला है जिनसे मिलने हनुमानजी आते हैं।

इन कबीलाई लोगों पर अध्ययन करने वाले आध्यात्मिक संगठन 'सेतु' के अनुसार पिछले साल ही हनुमानजी इन कबीलाई लोगों से मिलने आए थे। अब हनुमानजी 41 साल बाद आएंगे। इन कबीलाई या आदिवासी समूह के लोगों को 'मातंग' नाम दिया गया है। उल्लेखनीय है कि कर्नाटक में पंपा सरोवर के पास मातंग ऋषि का आश्रम है, जहां हनुमानजी का जन्म हुआ था।

वेबसाइट सेतु एशिया ने दावा किया है कि 27 मई 2014 को हनुमानजी श्रीलंका में मातंग के साथ थे। सेतु के अनुसार कबीले का इतिहास रामायणकाल से जुड़ा है। कहा जाता है कि भगवान राम के स्वर्ग चले जाने के बाद हनुमानजी दक्षिणभारत के जंगलों में लौट आए थे और फिर समुद्र पार कर श्रीलंका के जंगलों में रहने लगे। जब तक पवनपुत्र हनुमान श्रीलंका के जंगलों में रहे, वहां के कबीलाई लोगों ने उनकी बहुत सेवा की।

जब हनुमानजी वहां से जाने लगे तब उन्होंने वादा किया कि वे हर 41 साल बाद आकर वहां के कबीले की पीढ़ियों को ब्रह्मज्ञान देंगे। कबीले का मुखिया हनुमानजी के साथ की बातचीत को एक लॉग बुक में दर्ज कराता है। 'सेतु' नामक संगठन इस लॉग बुक का अध्ययन कर उसका खुलासा करने का दावा करता है।
हनुमान दर्शन और कृपा : हनुमानजी बहुत ही जल्द प्रसन्न होने वाले देवता हैं। उनकी कृपा आप पर निरंतर बनी रहे इसके लिए पहली शर्त यह है कि आप मन, वचन और कर्म से पवित्र रहें अर्थात कभी भी झूठ न बोलें, किसी भी प्रकार का नशा न करें, मांस न खाएं और अपने परिवार के सदस्यों से प्रेमपूर्ण संबंध बनाए रखें। इसके अलावा प्रतिदिन श्रीहनुमान चालीसा या श्रीहनुमान वडवानल स्तोत्र का पाठ करें। मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमानजी को चोला चढ़ाएं। इस तरह ये कार्य करते हुए नीचे लिखे उपाय करें...

हनुमान जयंती या महीने के किसी भी मंगलवार के दिन सुबह उठकर स्नान कर साफ कपड़े पहनें। 1 लोटा जल लेकर हनुमानजी के मंदिर में जाएं और उस जल से हनुमानजी की मूर्ति को स्नान कराएं।

पहले दिन एक दाना साबुत उड़द का हनुमानजी के सिर पर रखकर 11 परिक्रमा करें और मन ही मन अपनी मनोकामना हनुमानजी को कहें, फिर वह उड़द का दाना लेकर घर लौट आएं तथा उसे अलग रख दें।

दूसरे दिन से 1-1 उड़द का दाना रोज बढ़ाते रहें तथा लगातार यही प्रक्रिया करते रहें। 41 दिन 41 दाने रखने के बाद 42वें दिन से 1-1 दाना कम करते रहें। जैसे 42वें दिन 40, 43वें दिन 39 और 81वें दिन 1 दाना। 81वें दिन का यह अनुष्ठान पूर्ण होने पर उसी दिन, रात में श्रीहनुमानजी स्वप्न में दर्शन देकर साधक को मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद देते हैं। इस पूरी विधि के दौरान जितने भी उड़द के दाने आपने हनुमानजी को चढ़ाए हैं, उन्हें नदी में प्रवाहित कर दें।

( हनुमान जी के बारे में ये जानकारी मुझे इंटरनेट के माध्यम से मिली है जिसमे सच में कई चौकाने वाली बातें सामने आइन है इसलिए मैंने इस लेख को आप सबके साथ शेयर किया है ये मेरा खुद का लिखा हुआ नही है )

गुप्त नवरात्रि कब से है ओर क्या करे

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