Saturday, April 18, 2020

दीक्षा के भेद पार्ट २ टू

दीक्षा के भेद ,
मित्रो यह सब दीक्षा प्रकार का वर्णन बाबा भोलेनाथ ओर  महाविधा देवी माँ महाकाली के बीच जो वार्तालाप है वो ही यहाँ हम पस्तुत कर रहे जो देवी महासिद्धविधा माँ राजराजेश्वरी त्रिपुरासुंदरी ललितेम्बीका के परम शिष्य हमारे परम पुजनीये श्री श्री श्री 1008 आत्माविकासानन्द जी गिरी द्वारा कहाँ गया वर्णन हम यहाँ पस्तुत कर रहे है जिनकी जीवित समाधि हमारे आसीन्द मे है तपोस्थली प्रतापगढ गुप्त गंगा ओर बांसवाड़ा, देवी महासिद्धविधा त्रिपुरासुंदरी का मंदिर, इसके अलावा देवी माँ कालिका मंदिर हरिद्वार, प्रयागराज, हिमाचल उतराखंड आदि रहा है उन तक जाना या पहुच पाना हमारे बस मे नही है बस हम तो उनका दिया हुआ ग्यान आगे बढा सकते है नादान बालक की कलम से आज बस इतना ही बाकी फिर कभी,, मित्रो आप यहाँ से कांपी कर सकते हो पर शब्दो से छेड़छाड़ करना मतलब आपको पाप का भागी बना सकती है क्योंकि यह पुरा ब्लाक हमारे पंचगुरूओ को समर्पित है,, ओर माँ बाबा की सेवा मे है आगे जैसी आपकी इच्छा ओर माँ बाबा की कृपा
मित्रो दीक्षा आठ प्रकार की कही गयी है ये सब हम हमारे गुरूओ को समर्पित करते है यहाँ भी लेखनी है वो नादान बालक अपने माँ बाबा के चरणो मे अर्पित करता है, किसी दिन समय मिला या कोई योग्य हुआ तो माँ बाबा का भेद भी उन पर उजागर किया जायेगा ये जो आठ प्रकार की दीक्षा के जो भेद है हमारे गुरूजनो के श्री चरणो मे हमारी ओर श्रद्धा के फुलो की तरह पुणेयता समर्पित है,
पहली दीक्षा स्पर्श दीक्षा, दुसरी दृग् दीक्षा, तीसरी, वेधदीक्षा, चौथी ,क्रिया दीक्षा, पांचवी, वर्ण दीक्षा, छठी, कला दीक्षा, सातंवी, शाम्भवी दीक्षा, आठंवी वाग् दीक्षा, ।सम्पूर्ण जानकारी सविस्तार से कहे नादान सुने आप सभी,,
१, स्पर्श दीक्षा,
यथा पक्षी स्वपक्षाभ्यां शिशृन् उध्दरते शनैः ,। स्पर्शदीक्षापदेशच्श तादृशः कथितः प्रियै, ।।
यानि ,है प्रिये, जैसे मादा पक्षी अपने पंखो से अपने बच्चो की रक्षा करती है ओर उनको बड़ा करती है इसी प्रकार,, गुरूदेव,,, अपना वरदहस्त शिष्य के मस्तक पर रखकर उसकी रक्षा करते ओर उसके ग्यान की वृद्धि करते है यह स्पर्श दीक्षा कही जाती है,,, इसलिए कहाँ जाता है कि उतने ही बच्चो को अपनाओ या जन्म देओ जहाँ तक तूम पाल पोस सको वरना अपने साथ शिष्यो का भी तूम बेडा गर्क कर सकते हो, आध्यात्मिक की पहली सीढी जब तक आध्यात्मिक उर्जा शिष्य को नही मिलती तब तक गुरू की अपनी ऊर्जा शिष्य को देनी पडती है यानी जब तक बेटा कमाने लायक ना हो तब तक बाप को ही बेटे को खिलाना पडता है, ओर बेटा कमा रहो हो तो बाप को खिलाये यह भी सत्य है,,
२,,,, दृग् दीक्षा,,, (दृष्टिशक्तिपात )
स्वापत्यानि यथा मत्स्यो वाक्षणेनैव पोषयेत्, । दृग्भयां दीक्षोपदेशच्श्र तादृशः परमेश्वरी, ।
यानि, है परमेश्वरी, जिस प्रकार मछली अपने बच्चो ( )से दुर रहकर भी अपने बच्चो का लालन पोषण ओर संरक्षण करती है ओर अपनी दृष्टि बच्चो पर बनाये रखती है उसी तरह सद्गुरू भी अपने शिष्य यानी बच्चो को अपने पास बैठकर अपनी दिव्य दिृष्ट से (यानी शिष्य की आंखो मे आंखे मिलाकर )शिष्य मे ग्यान का संचार कर देते है यानि शिष्य की ओर देखने से ओर आग्या चक्र पर ध्यान केन्द्रित करने से ही शिष्य मे शक्तिपात हो जाता है,,यह एक पिता पुत्र का रिश्ते जैसा होता है या जैसी गुरू परम्पराओं मे या गुरू क्रिया होती है वो सारी शक्तियां स्वयंम शिष्यो के साथ हो जाती है पर यहाँ शिष्यो को अपना अभिमान घमण्ड का त्याग करना पडता है वरना यही शक्तियों शिष्यो के पतन का कारण बन सकती है इसलिए ध्यान रहे शक्तिपात के बाद गुरू की सारी शक्तियां आपके साथ बनी रहती है वो आपका स्वभाव को ज्यादा उग्र बना देती है यहाँ संभलना जरूरी है,,
३,,, वेध दीक्षा,, यानि स्मरण, याद, ध्यानम, समर्पण दीक्षा,,
यथा कर्मः स्वतनयान् ध्यानमात्रेण पोषयेत्, । वेधदीक्षाेपदेशच्श्र मानुषस्य तथा विधीः ।।
यानि,, जैसे कछुवे के बच्चो की माता अपने बच्चो का केवल ध्यान रखने से ही लालन पोषण करती है ,यानि सक्ष्म गुरूदेव मात्र अपने ध्यान करने मात्र से ही शिष्य मे शक्तिपात कर सकते है यानी शक्ति का संचार कर सकते मतलब शिष्य का कल्याण कर देते है,, पर यहाँ शिष्यो का अपने गुरू पर भी विश्वास होना जरूरी है अगर विश्वास है तो सब कुछ है, यानि उतने ही बच्चे पालने चाहिए जिनका तूम भरण पोषण कर सको ओर शिष्य अपने गुरू का ध्यान रख सके यही भेद शिष्यो को समर्पित ओर समर्पण की भावना को जागृत कर सकता है,,
४,,, क्रिया दीक्षा,,
क्रियादीक्षाअ्ष्टधा प्रोक्ता कुलमण्डपपूर्विका, । कलशादिसमायुक्ता कर्तव्या गुरूणा वहिः।।
मित्रो क्रिया दीक्षा भी आठ तरह की बताई गयी है संक्षिप्त रुप मे जाने तो पहले विधिपूर्वक षडध्वशोधन किया जाता है बाद मे गुरूदेव अपने शरीर से यानि आंतरिक उर्जा यानि चितशक्ति को क्रमपुर्वक निकालकर अपने शिष्य के भीतर हृदय मे प्रवेश कराते है या उसके मस्तक के ऊपर आग्या चक्र को उन्नत करते हुये अपने हाथो के अंगुठे से दबाव डालकर अपनी उर्जा ओर गुरूओ ओर इष्ट के प्रति समर्पित होकर अपनी उर्जा का प्रवेश शिष्य के अंदर किया जाता है पर सभी मे उग्रता आना स्वाभाविक है इसलिए यहाँ शिष्य को अपने मन ओर चित को शांत रखना जरूरी है वरना वो सारी आत्मसात की हुयी शक्तियों बुरा परिणाम भी दे सकती है,
बाकी कल वर्ण, कला, शाम्भवी वाग्दीक्षा के प्रकार अगली पोस्ट मे कही जायेगी नादान बालक की कलम से आज बस इतना ही बाकी फिर कभी,,
जय माँ जय बाबा महाकाल जय श्री राधे कृष्णा अलख आदेश 🙏🏻🌹🌹🌹🙏🏻

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