Saturday, October 31, 2015

काली-शाबर-मन्त्र

काली-शाबर-मन्त्र

“काली काली महा-काली, इन्द्र की बेटी, ब्रह्मा की साली। पीती भर भर रक्त प्याली, उड़ बैठी पीपल की डाली। दोनों हाथ बजाए ताली। जहाँ जाए वज्र की ताली, वहाँ ना आए दुश्मन हाली। दुहाई कामरो कामाख्या नैना योगिनी की, ईश्वर महादेव गोरा पार्वती की, दुहाई वीर मसान की।।”

विधिः- प्रतिदिन १०८ बार ४० दिन तक जप कर सिद्ध करे। प्रयोग के समय पढ़कर तीन बार जोर से ताली बजाए। जहाँ तक ताली की आवाज जायेगी, दुश्मन का कोई वार या भूत, प्रेत असर नहीं करेगा।

अगर आपका जन्म रात में हुआ है तो..

अगर आपका जन्म रात में हुआ है तो..


रात में जन्म लेने वाले लोग निडर और दुस्साहसी होते है। ये जोखिम भरे काम करने के शौकिन होते है। कोई भी काम शुरू करने पर उसे अधुरा नही छोड़ते। रात को जन्में लोग स्वभाव से तो आलसी होते है लेकिन हर काम को जुनून के साथ पूरा करते है। ऐसे लोग भावनात्मक न होकर कर्म प्रधान होते है। इनको जीवन में हार बर्दाश्त नही होती। ऐसे लोग किस्मत बहुत कम भरोसा करते है। इनके इरादे बुलंद होते हैं।

ज्योतिष के अनुसार जिन व्यक्तियों का जन्म रात के समय होता है। वे कम बोलने वाले होते हैं, यानी चुप रहना पसंद करते हैं। लेकिन इनका मन हमेशा अशांत रहता है। रात को जन्म लेने वाले लोग मन ही मन कुछ योजनाएं या षडयंत्र बनाते रहते है। ये कामी होते हैं, परायी स्त्रियों के प्रति इनमें आकर्षण अधिक होता है। तामसिक यानि नकारात्मक शक्तियों का इन पर विशेष प्रभाव होता है इस कारण ये अधिक गुस्सा करने वाले होते है। ऐसे लोग अनुचित तरिके से धन कमाने में नही हिचकिचाते। ये लोग हमेशा अपने स्वास्थ्य और शारीरिक परेशानियों को लेकर चिन्तित रहते है।

ऐसे उपाय करें-

- शिवलिंग की पूजा करें और कच्चा दूध चढ़ाएं।

- गरीब ब्राह्मण को भोजन कराएं।

- 9 वर्ष से कम उम्र की कन्या को भोजन कराएं और दान दें।

- काली गाय को चारा खिलाएं।

- रोज सूर्य को जल चढ़ाएं।

- अपने कुल के देवी देवताओं की पूजा करें।

- काले कुत्ते को रोटी दें।

- चींटीयों को आटा और चीनी डालें।

Sunday, October 25, 2015

श्री हनुमान् वडवानल

श्री हनुमान् वडवानल
🙏🏻

यह वडवानल स्तोत्र  सभी रोगों के निवारण में, शत्रुनाश, दूसरों के द्वारा किये गये पीड़ा कारक कृत्या अभिचार के निवारण, राज-बंधन विमोचन आदि कई प्रयोगों में काम आता है ।

🅰विधिः- सरसों के तेल का दीपक जलाकर १०८ पाठ नित्य ४१ दिन तक करने पर सभी बाधाओं का शमन होकर अभीष्ट कार्य की सिद्धि होती है।

🌷विनियोगः- ॐ अस्य श्री हनुमान् वडवानल-स्तोत्र-मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः, श्रीहनुमान् वडवानल देवता, ह्रां बीजम्, ह्रीं शक्तिं, सौं कीलकं, मम समस्त विघ्न-दोष-निवारणार्थे, सर्व-शत्रुक्षयार्थे सकल- राज- कुल- संमोहनार्थे, मम समस्त- रोग- प्रशमनार्थम् आयुरारोग्यैश्वर्याऽभिवृद्धयर्थं समस्त- पाप-क्षयार्थं श्रीसीतारामचन्द्र-प्रीत्यर्थं च हनुमद् वडवानल-स्तोत्र जपमहं करिष्ये ।

🌷ध्यानः-
मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं । वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये ।।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते प्रकट-पराक्रम सकल- दिङ्मण्डल- यशोवितान- धवलीकृत- जगत-त्रितय वज्र-देह रुद्रावतार लंकापुरीदहय उमा-अर्गल-मंत्र उदधि-बंधन दशशिरः कृतान्तक सीताश्वसन वायु-पुत्र अञ्जनी-गर्भ-सम्भूत श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर कपि-सैन्य-प्राकार सुग्रीव-साह्यकरण पर्वतोत्पाटन कुमार- ब्रह्मचारिन् गंभीरनाद सर्व- पाप- ग्रह- वारण- सर्व- ज्वरोच्चाटन डाकिनी- शाकिनी- विध्वंसन ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीर-वीराय सर्व-दुःख निवारणाय ग्रह-मण्डल सर्व-भूत-मण्डल सर्व-पिशाच-मण्डलोच्चाटन भूत-ज्वर-एकाहिक-ज्वर, द्वयाहिक-ज्वर, त्र्याहिक-ज्वर चातुर्थिक-ज्वर, संताप-ज्वर, विषम-ज्वर, ताप-ज्वर, माहेश्वर-वैष्णव-ज्वरान् छिन्दि-छिन्दि यक्ष ब्रह्म-राक्षस भूत-प्रेत-पिशाचान् उच्चाटय-उच्चाटय स्वाहा ।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः आं हां हां हां हां ॐ सौं एहि एहि ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते श्रवण-चक्षुर्भूतानां शाकिनी डाकिनीनां विषम-दुष्टानां सर्व-विषं हर हर आकाश-भुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय मारय मारय शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय प्रहारय प्रहारय शकल-मायां भेदय भेदय स्वाहा ।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते सर्व-ग्रहोच्चाटन परबलं क्षोभय क्षोभय सकल-बंधन मोक्षणं कुर-कुरु शिरः-शूल गुल्म-शूल सर्व-शूलान्निर्मूलय निर्मूलय नागपाशानन्त- वासुकि- तक्षक- कर्कोटकालियान् यक्ष-कुल-जगत-रात्रिञ्चर-दिवाचर-सर्पान्निर्विषं कुरु-कुरु स्वाहा ।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते राजभय चोरभय पर-मन्त्र-पर-यन्त्र-पर-तन्त्र पर-विद्याश्छेदय छेदय सर्व-शत्रून्नासय नाशय असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा ।

।। इति विभीषणकृतं हनुमद् वडवानल स्तोत्रं ।।

ज्योतिष : कुंडली से जाने :संतान प्राप्ति का समय :निःसंतान योग :संतान बाधा दूर करने के सरल उपाय

ज्योतिष : कुंडली से जाने :संतान प्राप्ति का समय :निःसंतान योग :संतान बाधा दूर करने के सरल उपाय:
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  ज्योतिषीय विश्लेषण के लिए हमारे शास्त्रों मे कई  सूत्र दिए हैं।
 कुछ प्रमुख सूत्र इस प्रकार से  हैं। 

ज्योतिषीय नियम हैं जो घटना के समय बताने  में सहायक होते हैं . 
संतान प्राप्ति  का समय : 
लग्न और लग्नेश को देखा  जाता  है। 
घटना का संबंध किस भाव से है
भाव का स्वामी कौन  है । 
भाव का कारक ग्रह कौन है।  
भाव में कौन कौन से ग्रह हैं।  
भाव पर किस  ग्रह की दृष्टि। 
कौन से ग्रह महादशा ,अंतर्दशा, प्रत्यंतर्दशा, सूक्ष्म एवं प्राण दशा चल रही है।
भाव को प्रभावित करने वाले ग्रहों की गोचर स्थिति भी देखना चाहिये। 
 इन सभी का अध्ययन करने   से किसी भी घटना का समय जाना जा सकता है।
 संतान प्राप्ति के समय को जानने के लिए पंचम भाव, पंचमेश अर्थात पंचम भाव का स्वामी, पंचम कारक गुरु, पंचमेश, पंचम भाव में स्थित ग्रह और पंचम भाव ,पंचमेश पर दृष्टियों पर ध्यान देना चाहिए।   जातक का विवाह हो चुका हो और संतान अभी तक नहीं हुई हो , संतान का समय निकाला जा सकता है। 
पंचम भाव जिन शुभ ग्रहों से प्रभावित हो उन ग्रहों की दशा-अंतर्दशा और गोचर के शुभ रहते संतान की प्राप्ति होती है। 
गोचर में जब ग्रह पंचम भाव पर या पंचमेश पर या पंचम भाव में बैठे ग्रहों के भावों पर गोचर करता है तब संतान सुख की प्राप्ति का समय होता है।यदि गुरु गोचरवश पंचम, एकादश, नवम या लग्न में भ्रमण करे तो भी संतान लाभ की संभावना होती है। जब गोचरवश लग्नेश, पंचमेश तथा सप्तमेश एक ही राशि में भ्रमण करे तो संतान लाभ होता है।  

  संतान कब (साधारण योग):
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 पंचमेश यदि पंचम भाव में स्थित हो या लग्नेश के निकट हो, तो विवाह के पश्चात् संतान शीघ्र होती है दूरस्थ हो तो मध्यावस्था में, अति दूर हो तो वृद्धावस्था में संतान प्राप्ति होती है। यदि पंचमेश केंद्र में हो तो यौवन के आरंभ में, पणफर में हो तो युवावस्था में और आपोक्लिम में हो तो अधिक अवस्था में संतान प्राप्ति होती है।

 पुत्र और पुत्री प्राप्ति का समय कैसे जानें? 
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  संतान प्राप्ति के समय के निर्धारण में यह भी जाना जा सकता है कि पुत्र की प्राप्ति होगी या पुत्री की। यह ग्रह महादशा, अंतर्दशा और गोचर पर निर्भर करता है। यदि पंचम भाव को प्रभावित करने वाले ग्रह पुरुष कारक हों तो संतान पुत्र और यदि स्त्री कारक हों तो पुत्री होगी।पुरुष ग्रह की महादशा तथा पुरुष ग्रह की ही अंतर्दशा चल रही हो एवं कुंडली में गुरु की स्थिति अच्छी हो तो निश्चय ही पुत्र की प्राप्ति होती है। विपरीत स्थितियों में कन्या जन्म की संभावनाएं होती हैं।

जन्म कुंडली में संतान योग जन्म कुंडली में संतान विचारने के लिए पंचम भाव का अहम रोल होता है। पंचम भाव से संतान का विचार करना चाहिए। दूसरे संतान का विचार करना हो तो सप्तम भाव से करना चाहिए। तीसरी संतान के बारे में जानना हो तो अपनी जन्म कुंडली के भाग्य स्थान से विचार करना चाहिए भाग्य स्थान यानि नवम भाव से करें।

१   पंचम भाव का स्वामी स्वग्रही हो
२.पंचम भाव पर पाप ग्रहों की दॄष्टि ना होकर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो अथवा स्वयं चतु सप्तम भाव को देखता हो.
३.पंचम भाव का स्वामी कोई नीच ग्रह ना हो यदि  भावपंचम में कोई उच्च ग्रह हो तो अति सुंदर योग होता है.
४.पंचम भाव में कोई पाप ग्रह ना होकर शुभ ग्रह विद्यमान हों और षष्ठेश या अष्टमेश की उपस्थिति  भावपंचम में नही होनी चाहिये.
५. पंचम भाव का स्वामी को षष्ठ, अष्टम एवम द्वादश भाव में नहीं होना चाहिये. पंचम भाव के स्वामी के साथ कोई पाप ग्रह भी नही होना चाहिये साथ ही स्वयं पंचमभाव का स्वामी नीच का नही होना चाहिये.
६. पंचम भाव का स्वामी उच्च राशिगत होकर केंद्र त्रिकोण में हो.
७ पति एवम पत्नी दोनों की कुंडलियों का अध्ययन करना चाहिए |  
८ सप्तमांश लग्न का स्वामी जन्म कुंडली में :बलवान ,शुभ स्थान ,सप्तमांश लग्न भी शुभ ग्रहों से युक्त  |
 ८  एकादश भाव में शुभ ग्रह बलवान हो |
संतान सुख मे परेशानी के योग :
ऊपर बताये गये  ग्रह निर्बल पाप ग्रह अस्त ,शत्रु –नीच राशि  में लग्न से 6,8 12 वें भाव में स्थित हों , तो संतान प्राप्ति में बाधा आती है | 
पंचम भाव: राशि ( वृष ,सिंह कन्या ,वृश्चिक ) हो  तो कठिनता से संतान होती है |

निःसंतान योग 
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 पंचम भाव में क्रूर, पापी ग्रहों की मौज़ूदगी
पंचम भाव में बृहस्पति की मौजूदगी
पंचम भाव पर क्रूर, पापी ग्रहों की दृष्टि
पंचमेश का षष्ठम, अष्टम या द्वादश में जाना
पंचमेश की पापी, क्रूर ग्रहों से युति या दृष्टि संबंध
पंचम भाव, पंचमेश व संतान कारक बृहस्पति तीनों ही पीड़ित हों  
नवमांश कुण्डली में भी पंचमेश का शत्रु, नीच आदि राशियों में स्थित होना
पंचम भाव व पंचमेश को कोई भी शुभ ग्रह न देख रहे हों संतानहीनता की स्थिति बन जाती है। 
 पुत्र या पुत्री :
सूर्य ,मंगल, गुरु पुरुष ग्रह हैं | 
शुक्र ,चन्द्र स्त्री ग्रह हैं |
 बुध और शनि नपुंसक ग्रह हैं |
 संतान योग कारक पुरुष ग्रह होने पर पुत्र होता  है। 
 संतान योग कारक स्त्री ग्रह होने पर पुत्री होती  है | 
शनि और बुध  योग कारक हो  पुत्र व पुत्री होती  है|
ऊपर बताये गये  ग्रह निर्बल पाप ग्रह अस्त ,शत्रु –नीच राशि  में लग्न से 6,8 12 वें भाव में स्थित हों तो ,  पुत्र या पुत्रियों की हानि होगी |
 बाधक ग्रहों की क्रूर व पापी ग्रहों की किरण रश्मियों को पंचम भाव, पंचमेश तथा संतान कारक गुरु से हटाने के लिए रत्नों का उपयोग करना होता  है।  


By..ज्योतिष Pirya Sharan Shastri Amratsar

रावण शाप के डर से मौत से भयभीत होने के कारण

रावण शाप के डर से मौत से भयभीत होने के कारण  माँ भगवती
सीता का स्पर्श नही करता था

जैसा
 1- तुलसीदास द्वारा  श्रीरामचरित मानस जोकि सम्पादित हे में
वर्णन नही है
 जबकि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में
 वर्णन है
   ✖➕✖ विश्व विजय करने के लिए जब रावण स्वर्ग लोक पहुंचा तो उसे
वहां रंभा नाम की अप्सरा दिखाई दी।
अपनी वासना पूरी करने के लिए रावण ने
उसे पकड़ लिया। तब उस अप्सरा ने कहा कि आप मुझे इस तरह
से स्पर्श न करें, मैं आपके बड़े भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर के
लिए आरक्षित हूं।
इसलिए मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूं, लेकिन रावण
नहीं माना और उसने रंभा से दुराचार किया। यह बात जब
नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को श्राप दिया कि
आज के बाद रावण बिना किसी स्त्री
की इच्छा के उसे स्पर्श करेगा तो उसका मस्तक सौ
टुकड़ों में बंट जाएगा।
 रावण ने अपने बहनोई का वध किया  ये बात सभी जानते हैं कि लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा
के नाक-कान काटे जाने से क्रोधित होकर ही रावण ने
सीता का हरण किया था, लेकिन स्वयं शूर्पणखा ने
भी रावण का सर्वनाश होने का श्राप दिया था। क्योंकि
रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह
था।
वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर
निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने
विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब शूर्पणखा ने मन
ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही
कारण तेरा सर्वनाश होगा।
- श्रीरामचरित मानस के अनुसार सीता
स्वयंवर के समय भगवान परशुराम वहां आए थे, जबकि रामायण
के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब
श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे, तब परशुराम वहां
आए और उन्होंने श्रीराम से अपने धनुष पर बाण
चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम के द्वारा बाण चढ़ा देने पर
परशुराम वहां से चले गए थे।

बलात्कारी रावण - वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने
पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था, तभी
उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, उसका नाम
वेदवती था। वह भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के
लिए तपस्या कर रही थी। रावण ने उसके
बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस
तपस्विनी ने उसी क्षण
अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप
दिया कि एक स्त्री के कारण ही
तेरी मृत्यु होगी। उसी
स्त्री ने दूसरे जन्म में सीता के रूप में
जन्म लिया।
- जिस समय भगवान श्रीराम वनवास गए, उस समय
उनकी आयु लगभग 27 वर्ष की
थी। राजा दशरथ श्रीराम को वनवास
नहीं भेजना चाहते थे, लेकिन वे वचनबद्ध थे। जब
श्रीराम को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा
तो उन्होंने श्रीराम से यह भी कह दिया कि
तुम मुझे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन जाओ।
- अपने पिता राजा दशरथ की मृत्यु का आभास भरत
को पहले ही एक स्वप्न के माध्यम से हो गया था।
सपने में भरत ने राजा दशरथ को काले वस्त्र पहने हुए देखा था।
उनके ऊपर पीले रंग की स्त्रियां प्रहार
कर रही थीं। सपने में राजा दशरथ लाल
रंग के फूलों की माला पहने और लाल चंदन लगाए गधे
जुते हुए रथ पर बैठकर तेजी से दक्षिण (यम
की दिशा) की ओर जा रहे थे।
- हिंदू धर्म में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं
की मान्यता है, जबकि रामायण के अरण्यकांड के
चौदहवे सर्ग के चौदहवे श्लोक में सिर्फ तैंतीस देवता
ही बताए गए हैं। उसके अनुसार बारह आदित्य, आठ
वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनी कुमार, ये
ही कुल तैंतीस देवता हैं।

 रघुवंश में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका
नाम अनरण्य था। जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा
अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में राजा
अनरण्य की मृत्यु हो गई, लेकिन मरने से पहले
उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न
एक युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा।
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- रावण जब विश्व विजय पर निकला तो वह यमलोक
भी जा पहुंचा। वहां यमराज और रावण के
बीच भयंकर युद्ध हुआ। जब यमराज ने रावण के
प्राण लेने के लिए कालदण्ड का प्रयोग करना चाहा तो ब्रह्मा ने
उन्हें ऐसा करने से रोक दिया क्योंकि किसी देवता द्वारा
रावण का वध संभव नहीं था।
 - सीताहरण करते समय जटायु नामक गिद्ध ने
रावण को रोकने का प्रयास किया था। रामायण के अनुसार जटायु के
पिता अरुण बताए गए हैं। ये अरुण ही भगवान सूर्यदेव
के रथ के सारथी हैं।
- जिस दिन रावण सीता का हरण कर
अपनी अशोक वाटिका में लाया। उसी रात को
भगवान ब्रह्मा के कहने पर देवराज इंद्र माता सीता के
लिए खीर लेकर आए, पहले देवराज ने अशोक वाटिका में
उपस्थित सभी राक्षसों को मोहित कर सुला दिया। उसके
बाद माता सीता को खीर अर्पित
की, जिसके खाने से सीता की
भूख-प्यास शांत हो गई।

 जब भगवान राम और लक्ष्मण वन में सीता
की खोज कर रहे थे। उस समय कबंध नामक राक्षस
का राम-लक्ष्मण ने वध कर दिया। वास्तव में कबंध एक श्राप के
कारण ऐसा हो गया था। जब श्रीराम ने उसके
शरीर को अग्नि के हवाले किया तो वह श्राप से मुक्त
हो गया। कबंध ने ही श्रीराम को
सुग्रीव से मित्रता करने के लिए कहा था।

- श्रीरामचरितमानस के अनुसार समुद्र ने लंका जाने
के लिए रास्ता नहीं दिया तो लक्ष्मण बहुत क्रोधित हो
गए थे, जबकि वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि
लक्ष्मण नहीं बल्कि भगवान श्रीराम
समुद्र पर क्रोधित हुए थे और उन्होंने समुद्र को सुखा देने वाले
बाण भी छोड़ दिए थे। तब लक्ष्मण व अन्य लोगों ने
भगवान श्रीराम को समझाया था।


- सभी जानते हैं कि समुद्र पर पुल का निर्माण नल
और नील नामक वानरों ने किया था। क्योंकि उसे श्राप
मिला था कि उसके द्वारा पानी में फेंकी गई
वस्तु पानी में डूबेगी नहीं,
जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार नल देवताओं के
शिल्पी (इंजीनियर) विश्वकर्मा के पुत्र थे
और वह स्वयं भी शिल्पकला में निपुण था।
अपनी इसी कला से उसने समुद्र पर सेतु
का निर्माण किया था।


 रामायण के अनुसार समुद्र पर पुल बनाने में पांच दिन का समय
लगा। पहले दिन वानरों ने 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन,
तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवे
दिन 23 योजन पुल बनाया था। इस प्रकार कुल 100 योजन लंबाई
का पुल समुद्र पर बनाया गया। यह पुल 10 योजन चौड़ा था। (एक
योजन लगभग 13-16 किमी होता है)


 एक बार रावण जब भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां
उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप
की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान
मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को
श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।


 रामायण के अनुसार जब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न
करने के लिए कैलाश पर्वत उठा लिया तब माता पार्वती
भयभीत हो गई थी और उन्होंने रावण को
श्राप दिया था कि तेरी मृत्यु किसी
स्त्री के कारण ही होगी।

- जिस समय राम-रावण का अंतिम युद्ध चल रहा था, उस समय
देवराज इंद्र ने अपना दिव्य रथ श्रीराम के लिए भेजा
था। उस रथ में बैठकर ही भगवान श्रीराम
ने रावण का वध किया था।


 जब काफी समय तक राम-रावण का युद्ध चलता
रहा तब अगस्त्य मुनि ने श्रीराम से आदित्य ह्रदय
स्त्रोत का पाठ करने को कहा, जिसके प्रभाव से भगवान
श्रीराम ने रावण का वध किया।

  भाई का राज्य व् घर छीना

- रामायण के अनुसार रावण जिस सोने की लंका में
रहता था वह लंका पहले रावण के भाई कुबेर की
थी। जब रावण ने विश्व विजय पर निकला तो उसने
अपने भाई कुबेर को हराकर सोने की लंका तथा पुष्पक
विमान पर अपना कब्जा कर लिया।

 बलात्कारी रावण ने अपनी पत्नी की
बड़ी बहन माया के साथ भी छल किया था।
माया के पति वैजयंतपुर के शंभर राजा थे। एक दिन रावण शंभर के
यहां गया। वहां रावण ने माया को अपनी बातों में फंसा
लिया। इस बात का पता लगते ही शंभर ने रावण को
बंदी बना लिया।
उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर
दिया। उस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया
सती होने लगी तो रावण ने उसे अपने साथ
चलने को कहा। तब माया ने कहा कि तुमने वासनायुक्त मेरा सतित्व
भंग करने का प्रयास किया इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो
गई, अत: तुम्हारी मृत्यु भी
इसी कारण होगी।


- वाल्मीकि रामायण में 24 हज़ार श्लोक, 500
उपखण्ड, तथा सात कांड है।
जय श्रीराम ...

By...अशोक लाटा

Monday, October 12, 2015

नवार्ण मन्त्र विधि:

नवार्ण मन्त्र विधि:


श्रीगणपतिर्जयति


 ॐ अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दासि, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।


१. ऋष्यादिन्यास :


ब्रम्हविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः शिरसि

गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दोभ्यो नमः मुखे

श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमः हृदि

ऐं बीजाय नमः गुह्ये

ह्रीं शक्तये नमः पादयो

क्लीं कीलकाय नमः नाभौ


ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे :- इस मूल मन्त्र से हाथ धोकर करन्यास करें।


२. करन्यास:

ॐ ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः (दोनों हाथों की तर्जनी अँगुलियों से अंगूठे के उद्गम स्थल को स्पर्श करें )

ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ( दोनों अंगूठों से तर्जनी अँगुलियों का स्पर्श करें )

ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः ( दोनों अंगूठों से मध्यमा अँगुलियों का स्पर्श करें )

ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः ( दोनों अंगूठों से अनामिका अँगुलियों का स्पर्श करें )

ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः ( दोनों अंगूठों से कनिष्ट/ कानी / छोटी अँगुलियों का स्पर्श करें )

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ( हथेलियों और उनके पृष्ठ भाग का स्पर्श )


३. हृदयादिन्यास :


ॐ ऐं हृदयाय नमः (दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों से ह्रदय का स्पर्श )

ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा (शिर का स्पर्श )

ॐ क्लीं शिखायै वषट् (शिखा का स्पर्श)

ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम् ( दाहिने हाथ की अँगुलियों से बाएं कंधे एवं बाएं हाथ की अँगुलियों से दायें कंधे का स्पर्श)

ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट् ( दाहिने हाथ की उँगलियों के अग्रभाग से दोनों नेत्रों और मस्तक में भौंहों के मध्यभाग का स्पर्श)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट ( यह मन्त्र पढ़कर दाहिने हाथ को  सिर के ऊपर से बायीं  ओर से पीछे ले जाकर दाहिनी ओर से आगे लाकर तर्जनी और मध्यमा अँगुलियों से बाएं हाथ की हथेली पर ताली बजाएं।


४. वर्णन्यास :


**इस न्यास को करने से साधक सभी प्रकार के रोगों से मुक्त हो जाता है**


ॐ ऐं नमः शिखायाम्

ॐ ह्रीं नमः दक्षिणनेत्रे

ॐ क्लीं नमः वामनेत्रे

ॐ चां नमः दक्षिणकर्णे

ॐ मुं नमः वामकर्णे

ॐ डां नमः दक्षिणनासापुटे

ॐ यैं नमः वामनासापुटे

ॐ विं नमः मुखे

ॐ च्चें नमः गुह्ये


इस प्रकार न्यास करके मूलमंत्र से आठ बार व्यापक न्यास (दोनों हाथों से शिखा से लेकर पैर तक सभी अंगों का ) स्पर्श करें।


अब प्रत्येक दिशा में चुटकी बजाते हुए निम्न मन्त्रों के साथ दिशान्यास करें:


५. दिशान्यास:

ॐ ऐं प्राच्यै नमः

ॐ ऐं आग्नेय्यै नमः

ॐ ह्रीं दक्षिणायै नमः

ॐ ह्रीं नैऋत्यै नमः

ॐ क्लीं प्रतीच्यै नमः

ॐ क्लीं वायव्यै नमः

ॐ चामुण्डायै उदीच्यै नमः

ॐ चामुण्डायै ऐशान्यै नमः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे उर्ध्वायै नमः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नमः


अन्य न्यास :- यदि साधक चाहे तो इतने ही न्यास करके नवार्ण मन्त्र का जप आरम्भ करे किन्तु यदि उसे और भी न्यास करने हों तो वह भी करके ही मूल मन्त्र जप आरम्भ करे।

यथा :-

६. सारस्वतन्यास :


**इस न्यास को करने से साधक की जड़ता समाप्त हो जाती है**


ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः अनामिकाभ्यां नमः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः मध्यमाभ्यां नमः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः तर्जनीभ्यां नमः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः अंगुष्ठाभ्यां नमः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः हृदयाय नमः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिरसे स्वाहा

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिखायै वषट्

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः कवचाय हुम्

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः नेत्रत्रयाय वौषट्

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः अस्त्राय फट


७. मातृकागणन्यास :


**इस न्यास को करने से साधक त्रैलोक्य विजयी होता है**


ह्रीं ब्राम्ही पूर्वतः माँ पातु

ह्रीं माहेश्वरी आग्नेयां माँ पातु

ह्रीं कौमारी दक्षिणे माँ पातु

ह्रीं वैष्णवी नैऋत्ये माँ पातु

ह्रीं वाराही पश्चिमे माँ पातु

ह्रीं इन्द्राणी वायव्ये माँ पातु

ह्रीं चामुण्डे उत्तरे माँ पातु

ह्रीं महालक्ष्म्यै ऐशान्यै माँ पातु

ह्रीं व्योमेश्वरी उर्ध्व माँ पातु

ह्रीं सप्तद्वीपेश्वरी भूमौ माँ पातु

ह्रीं कामेश्वरी पतालौ माँ पातु



८. षड्देविन्यास


**इस न्यास को करने से वृद्धावस्था एवं मृत्यु भय से मुक्ति मिलती है**


कमलाकुशमण्डिता नंदजा पूर्वांग मे पातु

खडगपात्रकरा रक्तदन्तिका दक्षिणाङ्ग मे पातु

पुष्पपल्लवसंयुता शाकम्भरी प्रष्ठांग मे पातु

धनुर्वाणकरा दुर्गा वामांग मे पातु

शिरःपात्रकराभीमा मस्तकादि चरणान्तं मे पातु

चित्रकान्तिभूत भ्रामरी पादादि मस्तकान्तम् मे पातु


९. ब्रह्मादिन्यास


**इस न्यास को करने से साधक के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं**


ॐ सनातनः ब्रह्मा पाददीनाभिपर्यन्त मा पातु

ॐ जनार्दनः नाभिर्विशुद्धिपर्यन्तं मा पातु

ॐ रुद्रस्त्रिलोचनः विशुद्धेर्ब्रह्मरन्ध्रांतं मा पातु

ॐ हंसः पदद्वयं मा पातु

ॐ वैनतेयः करद्वयं मा पातु

ॐ वृषभः चक्षुषी मा पातु

ॐ गजाननः सर्वाङ्गानि मा पातु

ॐ आनंदमयो हरिः परापरौ देहभागौ मा पातु


१०. महालक्ष्मयादिन्यास


**इस न्यास को करने से धन-धान्य के साथ-साथ सद्गति की प्राप्ति होती है **


ॐ अष्टादशभुजान्विता महालक्ष्मी मध्यं मे पातु

ॐ अष्टभुजोर्विता सरस्वती उर्ध्वे मे पातु

ॐ दशभुजसमन्विता महाकाली अधः मे पातु

ॐ सिंहो हस्त द्वयं मे पातु

ॐ परंहंसो अक्षियुग्मं मे पातु

ॐ दिव्यं महिषमारूढो यमः पादयुग्मं मे पातु

ॐ चण्डिकायुक्तो महेशः  सर्वाङ्गानी मे पातु


११. बीजमन्त्रन्यास :


ॐ ऐं हृदयाय नमः (दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों से ह्रदय का स्पर्श )

ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा (शिर का स्पर्श )

ॐ क्लीं शिखायै वषट् (शिखा का स्पर्श)

ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम् ( दाहिने हाथ की अँगुलियों से बाएं कंधे एवं बाएं हाथ की अँगुलियों से दायें कंधे का स्पर्श)

ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट् ( दाहिने हाथ की उँगलियों के अग्रभाग से दोनों नेत्रों और मस्तक में भौंहों के मध्यभाग का स्पर्श)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट ( यह मन्त्र पढ़कर दाहिने हाथ को  सिर के ऊपर से बायीं  ओर से पीछे ले जाकर दाहिनी ओर से आगे लाकर तर्जनी और मध्यमा अँगुलियों से बाएं हाथ की हथेली पर ताली बजाएं।


१२. विलोमबीजन्यास :



**इस न्यास को समस्त दुःखहर्ता के नाम से भी जाना जाता है**


ॐ च्चें नमः गुह्ये

ॐ विं नमः मुखे

ॐ यैं नमः वामनासापुटे

ॐ डां नमः दक्षिणनासापुटे

ॐ मुं नमः वामकर्णे

ॐ चां नमः दक्षिणकर्णे

ॐ क्लीं नमः वामनेत्रे

ॐ ह्रीं नमः दक्षिणनेत्रे

ॐ ऐं नमः शिखायाम्



१३. मन्त्रव्याप्तिन्यास:


**इस न्यास को करने से देवत्व की प्राप्ति होती है**


ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे मस्तकाचरणान्तं पूर्वाङ्गे (आठ बार )

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे पादाच्छिरोंतम दक्षिणाङ्गे (आठ बार)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे पृष्ठे (आठ बार)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे वामांगे (आठ बार)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे मस्तकाच्चरणात्नं (आठ बार)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे चरणात्मस्तकावधि (आठ बार)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे


इसके पश्चात मूल मन्त्र के १०८/१००८ अथवा अधिक अपनी सुविधानुसार जप संपन्न करें।




माता महाकाली शरणम्

By ,Rk Singh,

Sunday, October 11, 2015

श्रीमहादेव-प्रोक्तं-मृत-सञ्जीवनी-कवचम् (महा-गोपनीय कवच)

।श्रीमहादेव-प्रोक्तं-मृत-सञ्जीवनी-कवचम् (महा-गोपनीय कवच)

सरद नवरात्री मैं ५१ हजार जाप और उस का ११ माला हवन करने से ये कवच मंत्र सिद्ध हो जाता है |
।। पूर्व-पीठिका ।।
एवमाराध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयमहेश्वरं ।
मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा ॥१॥
सारात् सार-तरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं ।
महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ॥ २॥
समाहित-मना भूत्वा श्रृणुष्व कवचं शुभं ।
श्रृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ॥३॥

विनियोगः- ॐ अस्य श्रीमृतसञ्जीवनीकवचस्य श्री महादेव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमृत्युञ्जयरुद्रो देवता ॐ बीजं, जूं शक्तिः, सः कीलकम् मम (अमुकस्य) रक्षार्थं कवचपाठे विनियोगः।

ऋष्यादि-न्यासः- श्री महादेव ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीमृत्युञ्जयरुद्रो देवतायै नमः हृदि, ॐ बीजाय नमः गुह्ये, जूं शक्तये नमः पादयो, सः कीलकाय नमः नाभौ, मम (अमुकस्य) रक्षार्थं कवचपाठे विनियोगाय नमः सर्वांगे।

कर-न्यासः- ॐ जूं सः अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ जूं सः तर्जनीभ्यां स्वाहा। ॐ जूं सः मध्माभ्यां वषट्। ॐ जूं सः अनामिकाभ्यां हुँ। ॐ जूं सः कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। ॐ जूं सः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट्।

हृदयादि-न्यासः- ॐ जूं सः हृदयाय नमः, ॐ जूं सः शिरसे स्वाहा, ॐ जूं सः शिरसे वषट्, ॐ जूं सः-कवचाय हुम्। ॐ जूं सः-त्रयाय वौषट्, ॐ जूं सः अस्त्राय फट्।

ध्यान-
चन्द्रार्काग्नि-विलोचनं स्मित-मुखं पद्म-द्वयान्तः-स्थितम्।
मुद्रा-पाश-मृगाक्ष-सूत्र-विलसत्पाणिं हिमांशु-प्रभम् |
कोटीन्दु-प्रगलत्सुधाऽऽप्लुत-तनुं हारादि-भूषोज्ज्वलं
कान्तं विश्व-विमोहनं पशुपतिं मृत्युञ्जयं भावयेत् ||

॥ मूल कवच पाठ ॥
वराभयकरो यज्वा सर्व-देव-निषेवितः ।
मृत्युञ्जयो महादेवः प्राच्यां मां पातु सर्वदा ॥४॥
दधानः शक्तिमभयां त्रिमुखः षड्भुजः प्रभुः ।
सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ॥५॥
अष्टादशभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभुः।
यमरुपी महादेवो दक्षिस्यां सदाऽवतु ॥६॥
खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवितः।
रक्षोरुपी महेशो मां नैऋत्यां सर्वदाऽवतु ॥७॥
पाशाभयभुजः सर्वरत्नाकर-निषेवितः।
वरुणात्मा महादेवः पश्चिमे मां सदाऽवतु ॥८॥
गदाभयकरः प्राणनाशकः सर्वदा गतिः।
वायव्यां मारुतात्मा मां शंकर पातु सर्वदा ॥९॥
खड्गाभयकरस्थो मां नायकः परमेश्वरः।
सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शंकरः प्रभुः ॥१०॥
शूलाभयकरः सर्वविद्यानामधिनायकः।
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वरः ॥११॥
ऊर्ध्वभागे ब्रह्मारुपी विश्वात्माऽधः सदाऽवतु।
शिरो मे शंकरः पातु ललाटं चन्द्रशेखरः ॥१२॥
भ्रूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिनेत्रो लोचनेऽवतु।
भ्रूमध्यं गिरिशः पातु कर्णी पातु महेश्वरः ॥१३॥
नासिकां मे महादेवः ओष्ठौ पातु वृषध्वजः।
जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान् मे गिरिशोऽवतु ॥१४॥
मृत्युञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषणः।
पिनाकी मत्करौ पातु त्रिशूलो हृदयं मम ॥१५॥
पञ्चवक्त्रः स्तनौ पातु जठरं जगदीश्वरः।
नाभिं पातु विरुपाक्षः पार्श्वो मे पार्वतीपतिः ॥१६॥
कटिद्वयं गिरिशो मे पृष्ठं मे प्रमथाधिपः।
गुह्यं महेश्वरः पातु ममोरु पातु भैरवः ॥१७॥
जानुनी मे जगद्धर्ता जंघे मे जगदम्बिका।
पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्यः सदाशिवः ॥१८॥
गिरिशः पातु मे भार्या भवः पातु सुतान् मम।
मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायकः। ॥१९॥
सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकालः सदाशिवः ।
एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ॥२०॥

।। फलश्रुति ।।
मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् ।
सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ॥२१॥
महादेवजी ने मृत-सञ्जीवन नामक इस कवच को कहा है । इस कवच की सहस्त्र आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है ॥२१॥
यः पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहितः ।
सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ॥२२॥
जो अपने मन को एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथवा दूसरों को सुनाता है, वह अकाल मृत्युको जीतकर पूर्ण आयु का उपयोग करता है ॥ २२॥
हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ ।
आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ॥२३॥
जो व्यक्ति अपने हाथ से मरणासन्न व्यक्ति के शरीर का स्पर्श करते हुए इस मृतसञ्जीवन कवच का पाठ करता है, उस आसन्न-मृत्यु प्राणी के भीतर चेतनता आ जाती है । फिर उसे कभी आधि-व्याधि नहीं होतीं ॥२३॥
कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा ।
अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तमः ॥२४॥
यह मृतसञ्जीवन कवच काल के गाल में गये हुए व्यक्ति को भी जीवन प्रदान कर ‍देता है और वह मानवोत्तम अणिमा आदि गुणोंसे युक्त ऐश्वर्यको प्राप्त करता है ॥२४॥
युद्दारम्भे पठित्वेदमष्टाविशतिवारकं ।
युद्दमध्ये स्थितः शत्रुः सद्यः सर्वैर्न दृश्यते ॥२५॥
युद्ध आरम्भ होने के पूर्व जो इस मृतसञ्जीवन कवच का २८ बार पाठ करके रणभूमि में उपस्थित होता है, वह उस समय सभी शत्रुऔंसे अदृश्य रहता है ॥२५॥
न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै ।
विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा ॥२६॥
यदि देवताओं के भी साथ युद्ध छिड जाय तो उसमें उसका विनाश ब्रह्मास्त्र भी नही कर सकते, वह विजय प्राप्त करता है ॥२६॥
प्रातरूत्थाय सततं यः पठेत्कवचं शुभं ।
अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च ॥२७॥
जो प्रात:काल उठकर इस कल्याण-कारी कवच सदा पाठ करता है, उसे इस लोक तथा परलोक में भी अक्षय सुख प्राप्त होता है ॥२७॥
सर्वव्याधिविनिर्मृक्तः सर्वरोगविवर्जितः ।
अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिकः ॥२८॥
वह सम्पूर्ण व्याधियोंसे मुक्त हो जाता है, सब प्रकार के रोग उसके शरीर से भाग जाते हैं । वह अजर-अमर होकर सदा के लिये सोलह वर्ष वाला व्यक्ति बन जाता है ॥२८॥
विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् ।
तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम् ॥२९॥
इस लोक में दुर्लभ भोगों को प्राप्त कर सम्पूर्ण लोकों में विचरण करता रहता है । इसलिये इस महा-गोपनीय कवच को मृतसञ्जीवन नाम से कहा है ॥२९॥
मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम् ॥३०॥
यह देवतओंके लिय भी दुर्लभ है ॥३०॥

॥ वसिष्ठ कृत मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ॥

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