Friday, July 10, 2015

नवरात्र के 3 दिन , जानिए खुशहाल करने वाले देवी पूजा के 3 खास उपाय

नवरात्र के 3 दिन , जानिए खुशहाल करने वाले देवी पूजा के 3 खास उपाय

नवदुर्गा इच्छाओं को पूरा करने साथ-साथ बुरे विचार, आचरण और दुर्जनों का नाश करने वाली भी मानी जाती है। हिन्दू धर्म पंचांग के 4 माह (माघ, आषाढ़, चैत्र व आश्विन) के शुक्ल पक्ष के पहले 9 दिन नवरात्रि के रूप में विशेष तौर पर देवी भक्ति को ही समर्पित है, इसलिए इन माहों की हर तिथि व दिनों में नवदुर्गा के 9 रूपों के स्मरण के लिए शास्त्रों में विशेष मंत्र ध्यान व पूजा उपाय बहुत ही खुशहाल करने वाले बताए गए हैं। आप भी अगर सुख की चाह के साथ शोक, भय और चिंता से मुक्त जीवन की कामना करते हैं, तो वर्तमान में चल रही आषाढ़ माह की गुप्त नवरात्र (26 जुलाई तक) में यहां बताए जा रहे 3 खास उपायों से देवी पूजा न चूकें-
देवी कवच के अद्भुत मंत्रों से गुप्त नवरात्रि की रातों में नवदुर्गा का स्मरण वह उपाय है, जिसका शुभ प्रभाव बुरा वक्त टाल खुशहाल कर देता है।
जानिए इसके ध्यान का आसान उपाय- - इस देवी कवच के स्मरण से पूर्व मातृशक्ति की सामान्य पूजा में लाल गंध, लाल फूल और लाल वस्त्र चढ़ाएं। - धूप और दीप प्रज्जवलित कर इस आसान देवी कवच का उच्चारण करें- प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टकम् ।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः।।
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि।।
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते।। - अंत में माता से जीवन की भय, बाधा से रक्षा कर सुख से भरने की प्रार्थना करें।
हिन्दू पौराणिक मान्यताओं में देवी दुर्गा ही जगत की सृजन, पालन और संहार शक्तियों की अधिष्ठात्री मानी गई है। इसी वजह से आस्था है कि देवी उपासना सभी सांसारिक और भौतिक सुखों की कामनाओं को पूरा करती है। शास्त्रों में देवी दुर्गा को उनकी दिव्य शक्तियों व स्वरूप के कारण कई नामों से स्मरण किया गया है। इन नामों में विशेष रूप दुर्गा के 32  नाम मंत्र अपार सुख और शांति देने वाले माने गए हैं। हिन्दू पंचांग के वर्तमान में जारी आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की गुप्त नवरात्रि के अलावा साल भर हर दिन भी अगर कोई इंसान यहां बताए जा रहे 32 नाम मंत्र स्तुति का ध्यान करता है, तो वह कष्ट और संताप से मुक्त होकर सुखी संपन्न व निर्भय हो जाता है।
जानिए किस अद्भुत देवी मंत्र स्तुति से सारी देवी शक्तियों का स्मरण करें– इन 32 नाम मंत्रों को देवी की गंध, अक्षत, फूल और धूप-दीप जलाकर पूजा करने के बाद लाल आसन पर बैठकर घर या देवी मंदिर में करें- ॐ दुर्गा दुर्गतिशमनी दुर्गाद्विनिवारिणी
दुर्ग मच्छेदनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी
दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा
दुर्गमज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला
दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी
दुर्गमार्गप्रदा दुर्गम विद्या दुर्गमाश्रिता
दुर्गमज्ञान संस्थाना दुर्गमध्यान भासिनी
दुर्गमोहा दुर्गभगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी
दुर्गमासुर संहंत्रि दुर्गमायुध धारिणी
दुर्गमांगी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी
दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गमो दुर्गदारिणी
नामावलिमिमां यस्तु दुर्गाया मम मानव:
पठेत् सर्वभयान्मुक्तो भविष्यति न संशय:।
शास्त्रों में देव भक्ति से मिलने वाली दिव्य शक्तियों से ज़िंदगी में कई मुसीबतों से बचने के लिए दुर्गा चालीसा पाठ का महत्व बताया गया है। यह चालीसा देवी की अद्भुत शक्तियों और स्वरूप का ही स्मरण है, जिसका हर रोज पाठ तो ऊर्जावान रखता ही है, किंतु नवरात्रि के दिन यह पाठ शक्ति उपासना से संकटमोचन के नजरिए से बहुत ही असरदार माना गया है।
जानिए यह संकटमोचक देवी स्मरण उपाय-
- देवी की सामान्य पूजा गंध, फूल, अक्षत, धूप, दीप से कर इस दुर्गा चालीसा का पाठ पूरी आस्था से करें- नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥
निराकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूं लोक फैली उजियारी॥
शशि ललाट मुख महा विशाला। नेत्र लाल भृकुटी विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥
तुम संसार शक्ति लय कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिव शंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रहृ विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥
रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्घि ऋषि मुनिन उबारा॥
धरा रुप नरसिंह को अम्बा। प्रगट भई फाड़कर खम्बा॥
रक्षा कर प्रहलाद बचायो। हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रुप धरो जग माही। श्री नारायण अंग समाही॥
क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥
मातंगी धूमावति माता। भुवनेश्वरि बगला सुखदाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिणि। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥
केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खड्ग विराजे। जाको देख काल डर भाजे॥
सोहे अस्त्र और तिरशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगर कोटि में तुम्ही विराजत। तिहूं लोक में डंका बाजत॥
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥
अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर नारी॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावै। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवे॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताको छुटि जाई॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहू काल नहिं सुमिरो तुमको॥
शक्ति रुप को मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछतायो॥
शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतवे। मोह मदादिक सब विनशावै॥
शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरों इकचित तुम्हें भवानी॥
करौ कृपा हे मातु दयाला। ऋद्घि सिद्घि दे करहु निहाला॥
जब लगि जियौं दया फल पाऊं। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥
दुर्गा चालीसा जो नित गावै। सब सुख भोग परम पद पावै॥
देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

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