Friday, June 26, 2015

आत्म रक्षा मंत्र एवं प्रयोग


आत्म रक्षा मंत्र एवं प्रयोग
मंत्र : तीन पैर तेरे राई  मसान  भूम धरती आई धरती में से जगे जीव सांप बिच्छू गोहेरा सर्व विद्विषो भस्म करता आवे माता पारवती की आन है गुरु गोरखनाथ जी की आन है सबको भस्म करता आवे माम् रक्षा कुरु कुरुमाम  रक्ष रक्ष  ॐ हुम  जोम सः  रीम हूँ फट !!

विधि : गोबर और कलि मिटटी से चोका बना कर उस पर हिंगुल सिन्दूर से कालि यन्त्र बना कर सभी गुरु जन गणेश एवं शिव जी आदि मुख्या देवताओ के ज्ञात मंत्र 5-5 पढ़े और उस पर आम की लकड़ी बिछा दे और एक लोहे का छोटा चाकू भी रख दे …
पूर्वाभिमुख होकर अग्नि जलाये , उस अग्नि में 108 बार घी से गुरुमंत्र की आहुति दे , फिर इस मंत्र से 108 आहुति घी ,गूग्गुल और लाल कनेर के फूल से दे ..
हवन के बाद अग्नि के चारो और चन्दन और उत्तम इत्र मिले जल से चारू करे …
अग्नि शांत होने पर उसमे से चाकू निकल ले और भस्म और निर्माल्य को बहते पानी में बहा दे। थोड़ी सी भस्म को अपने पास रख ले / आसन कम्बल का और तिलक चन्दन से करे …
उतने से पूर्व आसन की धुल सर पर लगा ले,धुल न हो तो थोड़ी पहले ही रख ले …
प्रयोग : जाप आदि से पहले जहा आवश्यक हो और अन्य कभी भी जहा भय हो तब इस चाकू से कार कर ले …
भस्म से भय भूत आदि से ग्रस्त रोगी को खिला दे ,पानी में मिला के छिड़क दे या तिलक कर दे।।।
सभी दोष दूर होते है।।
जाप में रक्षा होती है।।।
ये अमोघ काल भैरव रक्षा विधान नागार्जुन नाथ शाबर विद्या से उद्धरित एवं अनुभूत है

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