Monday, June 22, 2015

श्री यंत्र साधना का विधान

श्री यंत्र साधना का विधान
शक्ति साधना क्रम में दस महाविद्याओं की उपासना की प्रधानता है। ये महाविद्याएँ ज्ञान और शक्ति का प्रतीक हैं। इन दस महाविद्याओं के स्थूल स्वरूपों के नाम निम्न हैं :-
1. काली 2. तारा 3. त्रिपुरसुंदरी 4. भुवनेश्वरी 5. त्रिपुर भैरवी 6. धूमावती 7. छिन्नमस्ता 8. बगला 9. मातंगी 10. कमला
इन दस महाविद्याओं का अर्चन-विधान पंच शुद्धियों पर आधारित है :-
1. स्थान शुद्धि 2. देह शुद्धि 3. द्रव्य शुद्धि 4. देव शुद्धि 5. मंत्र शुद्धि
जो व्यक्ति शाक्त-साधना की धारा के अंतर्गत दीक्षा ग्रहण करता है, उसे गुरुदेव इसी अर्चन-विधान के अंतर्गत यजन-पूजन की विधि का सम्पूर्ण दिशा-निर्देशन देकर उसमें वांछित सावधानी व तकनीकी जानकारी का बोध कराकर सतत शिष्य के कल्याणार्थ शंका-कुशंका, जिज्ञासाओं का समाधान करते रहते हैं। शक्ति साधना में शास्त्र वर्णित, गुरु निर्दिष्ट अर्चनक्रम में किसी प्रकार का परिवर्तन या मनोनुकूल सुधार की कोई गुंजाइश नहीं रहती है।
साधक स्वयं को श्रीगुरु के चरणों में समर्पित कर अनवरत शक्ति-साधन हेतु यजन-पूजन धारा में बह चले तो फिर कुछ भी असंभव नहीं रहता है।
श्री यंत्र साधना अर्चन विधान में गुरु-देव साधक को उपनीत कर उसे देव-कक्ष में स्थापित होने का सनमार्ग प्रदर्शित करते हैं। गुरुदेव से उपदिष्ट होकर साधक स्वयं को देव-भाव में भरकर साधना क्रम में अग्रसर होता है। इस क्रम में वह :-
1. स्वयं की देह को शोधन योग्य बनाने हेतु : गुरु निर्दिष्ट प्रणाली से स्नान करता है।
2. पूजन स्थान का शोधन करने हेतु : गुरु निर्दिष्ट प्रणाली से पूजन कक्ष का शोधन करता है।
3. देह का शोधन करने हेतु : गुरु निर्दिष्ट प्रणाली से आसन पर आसीन होकर प्राणायाम तथा भूत शुद्धि की क्रिया से अपने शरीर का शोधन करता है।
4. ईष्ट देवता की प्रतिष्ठा : गुरु निर्दिष्ट प्रणाली से अपने विशुद्ध शरीर से वह ईष्ट देवता की प्रतिष्ठा कर नाना प्रकार के न्यास इत्यादि कर अपने शरीर को देव-भाव से अभिभूत कर अपने ईष्ट देवता का अन्तर्यजन करता है। यही कहलाता है :
'देवम्‌ भूत्वा देवम्‌ यजेत' अर्थात्‌ देवता बनकर ही देवता का पूजन करें।
5. ईष्ट देवता बहिर्याग पूजन : अपने शरीर को देव-भाव से अभिभूत कर ईष्ट देवता को बाहर लाकर उसका पूजन करने के लिए पूजन द्रव्यों का मंत्रों से शोधन कर, एक विशेष क्रिया द्वारा अपने सम्मुख स्थापित यंत्र राज देवता :
'श्रीयंत्र' में देवता-आह्वान कर मंत्र द्वारा संस्कार कर उसका विशोधन करता है।
इसके पश्चात वह षोडषोपचार अथवा चौसठ उपचारों* द्वारा श्री यंत्र में स्थित देवताओं का पूजन कर, उसमें स्थापित देवता की ही अनुमति प्राप्त कर यथाविधि पूजन तर्पण करके, वेदी बनाकर देवता का अग्नि रूप में पूजन कर विभिन्न प्रकार के बल्कि द्रव्यों को भेंट कर उसे पूर्ण रूप से संतुष्ट करता है। इसके पश्चात देवता की आरती (निराजन) कर पुष्पांजलि प्रदान करता है।
इसके पश्चात ईष्ट मंत्र का शोधन कर कवच-सहस्रनामं स्त्रोत्र आदि का पाठ करके स्वयं को देवता के चरणों में आत्मसमर्पित करता है। पश्चात देवता के विसर्जन की भावना कर देवता को स्वयं के हृदयकमल में प्रतिष्ठित कर लेता है।
इस प्रकार स्वयं को देवभाव में भरकर अंतर्याग-बहिर्याग द्वारा पूजन कर स्वयं को देवमय स्थिति में साधक ले आता है। यह सब गुरु कृपा तथा गुरु निर्दिष्ट प्रणाली से संभव है। इसका ज्वलंत प्रमाण है गुरु गौडपाद द्वारा श्रीशंकराचार्य की दीक्षा और पश्चात श्री शंकराचार्य का स्वरूप हमारे समक्ष ही है।
श्री यंत्र साधना से संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता है।
* प्रस्तुत श्री यंत्र खंड में हमने आदि श्री शंकराचार्य द्वारा विरचित देवी राजोपचार पूजन विस्तार से दे दिया है।

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