Saturday, June 20, 2015

तंत्र साधनाओं में गोपनीयता

तंत्र साधनाओं में गोपनीयता
तंत्रशास्त्र की दृष्टि से अधिकार शब्द का मूल्य साधनात्मक है। साधना में प्रवेश पाने के लिए जिस योग्यता, क्षमता की प्राप्ति आवश्यक होती है, उसे अधिकार कहते हैं। इनसे तत्वज्ञान आदि मोक्ष का अधिकार मिलता है।
सार्वजनिक और सार्वदेशिक शास्त्र तंत्र विभिन्न साधनक्रमों, अंतर्यांग, बहिर्यांग, षट्कर्म, ध्यानयोग आदि के अधिकारों का विधान मानव कल्याण के लिए ही करते हैं। तांत्रिक साधक पशु, वीर, दिव्य भावों के द्वारा महाशक्ति की अर्चना करता हुआ सकल ब्रह्म के शक्तिस्वरूप को अनादि चेतन और आनंदरूप समझकर आत्मविवेक की उपलब्धि करता है। वामकेश्वरतंत्र के अनुसार जन्म से 16 वर्ष तक पशुभाव, 50 वर्ष तक वीरभाव और आगे का समय दिव्य भाव का होता है। अधिकारार्थ दीक्षाग्रहण, अभिषेक आदि संस्कार शिष्य के लिए अपरिहार्य हैं। लोकधर्मी और शिवधर्मी, बुभुक्षु और मुमुक्षु, शैक्ष और अशैक्ष (बौद्ध) आदि के अधिकारवैचित्र्य एवं शक्तिपात की तीव्रता के अनुसार दीक्षा के भी विभिन्न भेद होते हैं। अधिकार के 21 संस्कारों के उपरांत शाकाभिषेक, पूर्णाभिषेक, महासाम्राज्याभिषेक आदि की विधि संपन्न होती है। अंत में सर्वांगीण अधिकार के लिए आचार्याभिषेक होता है जिसके बिना दीक्षा देने का अधिकार नहीं मिलता। विवृति के लिए स्वच्छंदतंत्र देखा जा सकता है। अधिकार और साधकभेद से पंचमकारों में भी अर्थभेद मिलता है। बौद्ध तंत्रों में भी इस अधिकारभेद का विस्तार मिलता है। अधिकार निर्णय में शैथिल्य के कारण तांत्रिक साधनाओं को कालांतर में आपाततः निंदित होना पड़ता है।
तंत्र एक उत्तेजनात्मक उग्र प्रणाली है । उससे आंधी तूफान की तरह भयंकर कार्य कर डालने की शक्ति पैदा होती है । बड़े आकर्षक प्रलोभन सामने आते हैं परन्तु यह ध्यान रखने की बात है कि साधना में थोड़ी सी भूल हो जाने पर भयंकर खतरा भी है । तंत्र भ्रष्ट साधक बीमारी, पागलपन, अंग-आंग या किसी प्राणघातक संकट में फंस सकता है । यदि सिद्धि मिली भी तो तंत्र की तमोगुणी प्रधान शक्तियाँ आत्मा को कलुषित करके अधःपतन की ओर ही ले जाती हैं ।
हमें इस दिशा में बड़े कटु अनुभव है । कई बार मृत्यु मुख में से वापिस लौटकर नया जीवन पाया है । ऐसे जोखिम भरे मार्ग में हम दूसरों को डालने की जिम्मेवारी अपने ऊपर नहीं लेते । इसलिए वाममार्गी तांत्रिका सिद्धियाँ प्राप्त करने के इच्छुकों को सदा हमारी यही सलाह रहती है कि वे आकर्षण, प्रलोभन, चमत्कार, आतंक जमाने की क्षमता, प्रशंसा एवं लोगों में पूजने के लोभ को त्याग कर तंत्र से विमुख ही रहें । यह मार्ग कुछ विशेष व्यक्तियों के लिए ही उपयुक्त हो सकता है । पर सर्व साधारण के लिए तो सर्वथा अनुपयुक्त ही है ।
तंत्र में जहाँ सभी वर्ण को साधना का अधिकार है तथा जाति-भेद और स्त्री-पुरुष का कोई प्रतिबंध नहीं है, वहाँ साधन-विधियाँ भी गुप्त रखी गयी हैं और अधिकारी गुरु से ही प्राप्त की जा सकती है । गुरु भी अधिकारी की परीक्षा करके रहस्यमयी विद्या की दीक्षा देता है। गोपनीयता का कारण साधना विधियों को उनके दुरुपयोग से बचाना है, क्योंकि तंत्र, शक्ति-विकास का विज्ञान है ।
इससे अपना व समाज का हित भी किया जा सकता है और अहित भी । ऐसे भी विधान हैं, जिनसे आतंक और भय का वातावरण उत्पन्न किया जा सकता है । ऐसी स्थिति न आने पाए, इसलिए साधना-विधान हर किसी का नहीं बताया जाता, उसे गुप्त रखा जाता है ।
उपनिषदों की परविद्या को 'गुह्रा' घोषित किया गया है और उस रहस्यमयी का दूसरों को न बताने को आदेश दिया गया है । गीताकार 'राजयोग' के भी 'गुह्रा' की संज्ञा देते हैं । तंत्रों में अपनी साधना को 'योनि' की तरह गुप्त रखने की बात कही गई है । जिस तरह स्त्री अपने गुह्रा अंगों को पति के अतिरिक्त सबसे छिपाती है, उसी तरह अपने पति-भगवान के अतिरिक्त इसे सबसे छिपाना चाहिए ।
गीता भी गोपनीयता की नीति का समर्थन करती है ।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
च नाशुश्रूषवे वाच्यं न मां योऽभ्यसूयति॥ -गीता
''तपस्या-विहीन, अभक्त या जिसको अभी तक इन बातों के सुनने की तीव्र इच्छा न हुई और जो गुरु-सेवा परायण न हो या जो मुझसे (ईश्वर) से असूया रखता हो, ऐसे व्यक्ति से बातें न कहनी चाहिए ।''
तंत्र-शास्त्रों में तो इस आशय के स्पष्ट आदेश दिए गए हैः
स्वमंत्रा नोपदेष्टव्यो वक्तव्यश्च न संसदि ।
गोपनीयं तथा शास्त्रं रक्षणीयं शरीरवत्॥ -नारद पञ्चरात्र
''अपने मंत्र का किसी को न उपदेश, न सभा में उसे कहे । पूजा-विधि को गुप्त रखे और तद्विषयक शास्त्र की शरीर की तरह रक्षा करे ।''
इति मे सम्यगाख्याताः शांति शुध्यादि कल्पना ।
रहस्याति रहस्याश्च गोपनीयास्त्वया सदा॥
अर्थात्-नारद जी! यह हमने आपसे शांति-शुद्धादि कल्पना रहस्य कहा है । यह रहस्य का भी रहस्य है । यह आपको सर्वदा गुप्त रखने योग्य है ।
गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
त्वयाति गोपितव्यं हि न देयं यस्य कस्यचित्॥
''इन साधना-विधियों को यत्नपूर्वक गुह्रा रखो-गुप्त रखो । इनको अपने तक ही सीमित रखो, किसी ऐसे-वैसे को मत बताओ ।''
न देयं पर शिष्येभ्याह्राकेभ्यो विशेषतः ।
शेष्येभ्यो भक्ति युक्तेभ्याह्रान्ययामृत्युमाप्नुयात्॥
''दूसरे के शिष्य के लिए विशेषकर भक्तिरहित के लिए यह मंत्र कभी नहीं देना चाहिए । इसकी दीक्षा भक्तियुक्त शिष्य को ही देनी चाहिए अन्यथा मृत्यु की प्राप्ति होती है ।''
कथितं सारभूत ते खेलत्खञ्जनलोचने ।
ब्रह्मज्ञानं मया देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥
नातः परतरं किञ्चिद्विद्यते मम मानसे ।
गोपनीयं सदा भद्रे पशुपापर सन्निघौ॥ -योगिनी तंत्र
अर्थात्-''हे देवदेवेशि! यह अत्यन्त सारभूत ब्रह्मज्ञान मैंने तुम्हारे प्रति कहा है, अब अधिक क्या सुनने की इच्छा रखती हो? इससे बढ़कर अन्य कुछ मेरे अन्तर में नहीं है । इस ज्ञान को पशु और पामर व्यक्ति से सदा गुप्त रखना चाहिए । ''
अति गुह्रामिदं पृष्टं त्वया ब्रह्मतनूद्भव ।
न कस्यापि वक्तव्यं दुष्टाय पिशुनाय च॥ -गायत्री तंत्र
''यह सुनकर श्री नारायण ने कहा कि हे नारद! आपने अत्यन्त गुप्त बात पूछी है, परन्तु यह किसी दुष्ट या पिशुन (छलिया) से नहीं कहनी चाहिए ।''
रहस्याति रहस्यानां रहस्योऽयं महेश्वरि ।
ऊर्ध्द्धाम्नायः समाख्यातः समासेन च विस्तरात्॥
कुलार्णवमिदं शास्त्रं योगिनीनां ह्रहि स्थितम् ।
प्रकाशितं मया चाद्य गोपनीयं प्रयत्नतः॥
अर्थात्-हे महेश्वरी! यह जो परम गूढ़ एंव अत्यन्त ही रहस्य है, उसका भी यह सबसे प्रबल रहस्य है जो कि ऊर्ध्वाम्नाय मैंने तुम्हारे सामने बतला दिया है । इसका विशेष विशद् वर्णन नहीं किया है, यह कुलार्णव शास्त्र है, जो योगिनियों के हृदय में स्थित रहा करता है । यह कभी किसी के सामने प्रकाशित नहीं किया जाता है । तुम्हारे अत्यन्त प्रेमानुरोध होने के कारण मैंने आज प्रकाशित कर दिया है । किन्तु मेरा आदेश है कि इसको प्रयत्नपूर्वक अन्यन्त गुप्त रखना ।
कुलार्णव तंत्र में ही एक और स्थान पर है कि अपना धन, स्त्री और प्राण तक अर्पण कर दे परन्तु गुह्रा शास्त्र को अनिधिकारी व्यक्ति को न बताए ।
उपरोक्त प्रमाणों में यह बताया गया है कि तंत्र एक गुप्त विज्ञान है । उसकी सब बाते सब लोगों के सामने प्रकट करने योग्य नहीं होती । कारण यह है कि तांत्रिक साधनाएँ बड़ी क्लिस्ट होती हैं । वे उतनी ही कठिन हैं जितना कि समुद्र की तली में घुसकर मोती निकालना ।
चन्दन के वृक्षों के निकट सर्पों का निवास रहता है, गुलाब के फूलों में काँटे होते हैं, शहद प्राप्त करने के लिए मक्खियों के डंकों का सामना करना पड़ता है, सर्प-मणि पाने के लिए भयंकर सर्प से और गजमुक्ता पाने के लिए मदोन्मत्त हाथी से जूझना पड़ता है । तांत्रिक पुरुषार्थ ऐसे ही विकट पुरुषार्थ हैं, जिनके पीछे खतरों की श्रृंखला जुड़ी रहती है । यदि ऐसा न होता, तो उन लाभों को हर कोई आसानी से प्राप्त कर लिया करता ।
तलवार की धार पर चलने के समान तंत्र-विद्या के कठिन साधन हैं । उसके लिए साधक में पुरुषार्थ, साहस, दृढ़ता, निर्भयता और धैर्य पर्याप्त होना चाहिए । ऐसे व्यक्ति सुयोग्य अनुभवों गुरु की अध्यक्षता में यदि स्थिर चित्त से श्रद्धापूर्वक साधना करें तो वे अभिष्ट साधन में सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं । परन्तु यदि निर्बल मनोभूमि के-डरपोक, संदेही स्वभाव वाले, अश्रद्धालु, अस्थिर मति किसी साधन को करें और थोड़ा-सा संकट उपस्थित होते ही उसे छोड़ भागें, तो वैसा ही परिणाम होता है जैसा कि किसी सिंह या सर्प को पहले तो छेड़ा जाय पर जब वह कुद्ध होकर अपनी ओर लपके तो लाठी-डण्डा फेंककर बेतहाशा भागा जाय ।
तंत्र एक उत्तेजनात्मक उग्र प्रणाली है । इस प्रक्रिया के अनुसार जो साधना की जाती है, उससे प्रकृति के अन्तराल में बड़े प्रबल कम्पन उत्पन्न होते हैं, जिनके कारण ताप और विक्षोप की मात्रा बढ़ती है । गर्मी के दिनों में सूर्य की प्रचण्ड किरणों के कारण जब वायुमण्डल का तापमान बढ़ जाता है तो हवा बहुत तेज चलने लगती है । लू, आँधी और तूफान के दौर बढ़ते हैं । उस उग्र उत्तेजना में खतरे बढ़ जाते हैं, किसी को लू सता जाती है, किसी की आँखों में धूलि भर जाती है, अनेकों के शरीर फोड़े-फन्सियों से भर जाते हैं । कई बार छप्पर उड़ जाते हैं, पेड़ उखड़ जाते हैं । कई बार हवा के भँवर पड़ जाते हैं, जो एक छोटे दायरे में बड़ी तेजी से नाचते हुए डरावनी शक्ल में दिखाई पड़ते हैं ।
तंत्र की साधनाओं से ग्रीष्मकाल का-सा उत्पात पैदा होता है और मनुष्य के बाह्म एवं आन्तरिक वातावरण में एक प्रकार की सूक्ष्म लू एवं आँधी चलने लगती है, जिसकी प्रचण्डता के भयंकर झकझोरे लगते हैं । यह झकझोरे मस्तिष्क के कल्पना-तन्तुओं से जब संघर्ष करते हैं, तो अनेकों प्रकार की प्रतिमूर्तियाँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं ।
ऐसे अवसर पर डरावने, भूत, प्रेत, पिशाच, देव, दानव जैसी आकृतियाँ दिख सकती हैं, दृष्टि-दोष उत्पन्न होने के कारण कुछ का कुछ दिखाई दे सकता है । अनेकों प्रकार के शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श का अनुभव हो सकता है । यदि साधक निर्भयतापूर्वक इन स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं को देखकर मुस्कराता न रहे, तो उसका साहस नष्ट हो सकता है और उन भयंकरताओं से यदि वह भयभीत हो जाय तो वह भय उसके लिए संकट बन सकता है ।
इस प्रकार की कठिनाई का हर कोई मुकाबला नहीं कर सकता, इसके लिए एक विशेष प्रकार की साहसपूर्ण मनोभूमि होनी चाहिए । मनुष्य दूसरों के विषय मे तो परीक्षा-बुद्धि रखता है पर अपनी स्थिति का ठीक परीक्षण कोई विरले ही कर सकते हैं ।
''मैं तंत्र साधनायें कर सकता हूँ या नहीं'' इसका निर्णय अपने लिए कोई मनुष्य स्वयं नही कर सकता । इसके लिए उसके किसी दूसरे अनुभवी व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ती है । जैसे रोगी अपनी चिकित्सा स्वयं नहीं कर सकता, विद्यार्थी अपने आप अपनी शिक्षा नहीं कर सकता, वैसे ही तांत्रिक साधनाएँ भी अपने आप नहीं की जा सकती, इसके लिए विज्ञ पुरुष को गुरु नियुक्त करना होता है । वह गुरु सबसे पहले अपने शिष्य की मनोभूमि का परीक्षण करता है और तब उस परीक्षण के आधार पर यह निश्चित करता है कि इस व्यक्ति के लिए कौन-सी साधना उपयोगी होगी और उसकी विधि में अन्यों की अपेक्षा क्या हेर-फेर करना ठीक होगा ।
साधना-काल में जो विक्षेप आते हैं, उनका तात्कालिक उपचार और भविष्य के लिए सुरक्षा-व्यवस्था बताना भी गुरु के द्वारा ही सम्भव है । इसीलिए तंत्र साधनाएँ गुरु-परम्परा से चलती है । सिद्धि के लोभ से अधिकारी साधक स्वयं, अपने आप, उन्हें ऊटपटाँग ढंग से न करने लग जाए, इसलिए उन्हें गुप्त रखा जाता है । रोगी के निकट मिठाइयाँ नहीं रखी जातीं, क्योंकि पचाने की शक्ति न रखते हुए भी यदि लोभवश उसने उन्हें खाना शुरु कर दिया तो अनन्तः उसी का अहित होगा ।
तंत्र की साधनाएँ सिद्ध कर लेने के बाद जो शक्ति आती है, उसका यदि दुरुपयोग होने लगे तो उससे संसार में बड़ी अव्यवस्था फैल सकती है, दूसरों का अहित हो सकता है, अनधिकारी लोगों को अनावश्यक रीति से लाभ या हानि पहुँचाने से उनका अनिष्ट ही होता है बिना परिश्रम के लाभ प्राप्त होता है । वह अनेक प्रकार के दुर्गुण पैदा करता है । जिसने जुआ खेलकर दस हजार रुपया कमाया है वह उन रुपयों का सदुपयोग नहीं कर सकता और न उनके द्वारा वास्तविक सुख प्राप्त कर सकता है ।
इसी प्रकार ईश्वरीय या राजकीय विधि से मिलने वाले स्वाभाविक दण्ड-विधान को छोड़कर किसी को मंत्र-बल से हानि पहुँचाई जाती है, वह गर्भपात के समान अहितकर ही होती है । तंत्र में सफल हुआ व्यक्ति ऐसी गड़बड़ी पैदा कर सकता है । इसलिए हर किसी को उसकी साधना करने का अधिकार नहीं दिया गया है ।
वह तो एक विशेष मनोभूमि के व्यक्तियों के लिए सीमित क्षेत्र में उपयोग होने वाली वस्तु है, इसलिए उसका सार्वजनिक प्रकाशन नहीं किया जाता । हमारे घर केवल उन्हीं व्यक्तियों के प्रयोग के लिए होते हैं, जो उनमें अधिकारपूर्वक रहते हैं । निजी घरों का उपयोग धर्मशाला की तरह नहीं हो सकता और न हर कोई मनुष्य किसी के घर में प्रवेश कर सकता है ।
तंत्र भी अधिकार-सम्पन्न मनोभूमि वाले विशेष व्यक्तियों का घर है, उसमें हर व्यक्ति का प्रवेश नहीं है । इसलिए उसे नियत सीमा तक रखने के लिए गुप्त रखा है ।
हम देखते हैं तंत्र-गंथों मे जो साधना-विधियाँ लिखी गई है वे बड़ी अधूरी हैं । उनमें दो ही बाते मिलती हैं-एक साधन का फल, दूसरे साधन-विधि का कोई छोटा-सा अंग । परन्तु इस शैली से वर्णन करने में तंत्रकारों का मन्तव्य यह है कि साधना-विधि का संकेत कायम रहे, जिससे इस विद्या का लोप न हो, वह विस्तृत न हो जाय, यह सूत्र-प्रणाली है ।
व्याकरण आदि के सूत्र बहुत छोटे-छोटे होते हैं, उनमें अक्षर दस-दस या पाँच-पाँच ही होते हैं, पर अर्थ के एक लघु संकेतमात्र होते हैं, जिससे याद कम करना पड़े और समय पड़ने पर पूरी बात याद हो आवे ।
संकेत रूप में कहा इसलिए गया है कि कालान्तर में उस तथ्य का विस्मरण न हो जाय, आधार मालूम रहने से आगे की बात का स्मरण हो आना सुगम है । तंत्र-ग्रंथों में साधना-विधियों को गुप्त रखने पर बार-बार जोर दिया गया है, साथ ही कहीं-कहीं ऐसी विधियाँ भी बताई गई हैं जो देखने बड़ी सुगम मालूम पड़ती हैं, पर उनका फल बड़ा भारी कहा गया है ।
इस दिशा के अनजान लोगों के लिए यह गोरखधंधा बड़ा उलझन-भरा है । वे कभी उसे अत्यन्त सरल समझते हैं और कभी उसे असत्य मानते हैं । पर वस्तुस्थिति दूसरी ही है । संकेत-सूत्रों की विधि से उन साधनाओं का थोड़ा-सा वर्णन करके तंत्रकारों ने अपनी रहस्यवादी मनोवृत्ति का परिचय दिया है ।
तंत्र का विषय गोपनीय है, इसलिए तंत्र-ग्रंथों में ऐसी अनेक साधनाएँ प्राप्त होती हैं, जिनमें धन, संतान, स्त्री, यश, आरोग्य, पद-प्राति, रोग-निवारण, शत्रु-नाश, पाप-नाश, वशीकरण आदि लाभों का वर्णन है और संकेत-रूप से उन साधनाओं का एक अंश बताया गया है । परन्तु यह भली प्रकार स्मरण रखना चाहिए कि इन संक्षिप्त संकेतों के पीछे एक भारी कर्मकाण्ड एवं विधि-विधान है । वह पुस्तकों में नहीं, वरन् अनुभवी, साधना-सम्पन्न् व्यक्तियों से प्राप्त होता है ।
अपनी साधना को गुप्त रखने का एक आध्यात्मिक कारण भी है । साधना की प्रसिद्धी जब दूसरों में फैलती है, तो साधक का यश फैलना स्वाभाविक है । इस सम्मान से साधक मे मनःक्षेत्र में अहंकार की प्रवृत्ति प्रविष्ट होती है, जो साधक के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध होती है । यदि साधक इस स्तर पर पहुँच चुका हो, कि वह अपने तप की पूँजी से दूसरों को भी लाभाविन्त कर सकें, तो उसकी आत्मिक गिरावट के सभी चिन्ह दृष्टिगोचर होने लगते हैं ।
कारण स्पष्ट है-उसकी प्रसिद्घ सुनकर जनजागरण उसके पास अपनी इच्छाओं और कामनाओं को पूरा करने के लिए पहुँचने लगते हैं । यदि किसी को किसी प्रकार लगा हुआ है, तब तो वह सिद्ध पुरुष घोषित कर दिए जाते हैं और जनता भेड़-चाल से उसे घेर लेती है । साधक को भी अपनी सफलता प्रसन्नता होती है । अब वे उलझन में फँस जाते हैं । यदि किसी को निराश लौटना पड़ा, हो उनके सम्मान को धक्का लगेगा । सबकी आशाओं की पूर्ति करने लगें तो अपनी आत्मिक सम्पत्ति हो जाएगी, जिसे पूरा करने के लिए काफी तपस्या करनी होगी ।
साधना-काल में दूसरों के अन्न पर शरीर का पालन-पोषण होने लगा तो साधना भ्रष्ट होने की सम्भावना रहेगी, क्योंकि जो अन्त ग्रहण कर रहे हैं, न जाने वह कैसा है? मानसिक निर्माण उस अन्न पर निर्भर करता है । इसीलिए कुलार्णव तंत्र में स्पष्ट है-
यस्यान्नेन तु पुष्टांगों पर होमं समाचारेत् ।
अन्नदातु फलस्यार्ध चार्धं कर्तुर्न संशयः॥ -कुलार्णव तंत्र
''दूसरे व्यक्ति के अन्न से अंग पुष्ट करके तप, हवन करने वाले साधक को उसका आधा फल ही मिल पाता है, उसका आधा तो अन्न देने वाले को मिलता है ।''
साधना को प्रकट करने में हानि ही हानि परिलक्षित होती है, क्योंकि उससे अहंकार का पोषक होता है । इसे आध्यात्मिक मार्जन का महान शत्रु माना जाता है । जब तक अहंकार मन में निवास करता है, तब तक साधना में प्रगति रुकी रहती है । निरंकारी साधक ही साधना में सफलता प्राप्त कर सकता है । अतः यह पुष्ट न होने पाए, इसके लिए तंत्र-शास्त्रों में कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं, उनमें प्रमुख है-
अपनी साधना का किसी पर प्रकट न करना ।
तंत्रों की आज्ञा है कि ''जब जनसाधारण को यह पता चल जाता है कि यह व्यक्ति तांत्रिक साधक है, तो उसी दिन उस साधक की मृत्यु मान लेनी चाहिए ।'' इसलिए साधक की भलाई इसी में है कि वह अपनी साधना का ढोल न पीटे, वरन उसे छिपाकर रखे तभी वह अन्त तक उसके निर्विध्न संचालन में सफल हो पाएगा । प्रसिद्ध का लोभ उसक लिए सदैव फिसलने के अवसर उपस्थित करता रहेगा, यह निश्चित है ।

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