Thursday, June 18, 2015

शिव – शिवाऔरतंत्र



शिव – शिवाऔरतंत्र

अपारकरुणामूर्तिजगज्जननीभगवतीशिवाऔरशिवहीसमस्तसृष्टिकेस्रष्टाहैं।इनकीकृपासेब्रह्मादिदेवआविर्भूतहोकरआदेशानुसारसृष्टि , स्थितिऔरसंह्यतिमेंप्रवृत्तहोतेहैं।अखिलब्रह्मांडनायिकाभगवतीएवंअखिलब्रह्मांडनायकभगवान्एकरुपहोतेहुए

भीलोकानुग्रहकेलिएद्विधारुपग्रहणकरतेहैंऔरदिव्यदम्पत्तिकेरुपमेंशब्दर्थमयीसृष्टिकोभीविकसितकरतेहैं।येहीब्रह्मस्वरुपहैं।

इन्हींकेसंवादरुपमेंतंत्रसामनेआया।

वस्तुतःब्रह्मा , विष्णुतथाशिवमेंकोईभेदनहींहैं।लोक – कल्याणकीउदारभावनासेपरस्परसंवादरुपमें , प्रश्नोत्तररुपमेंकर्तव्यकर्मोंकाचिंतनप्रस्तुतकरतेरहेहैं।यहआवश्यकभीहै , क्योंकिमाता – पिताहीयदिबालकोंकीशिक्षा – व्यवस्थानकरेंतोऔरकौनकरे ? जबस्वयंब्रह्मादिदेवभीप्रादुर्भूतहोनेकेपश्चात्अबोधकीभांतिकोऽहं , कुतःआयातः , कोमेजननी , कोमेतातः ? इत्यादिनहींजानपाएतोउन्हेंभीइन्हींनेकृपापूर्वकज्ञानदियाथा।

कैलासवासीश्रीशिव

कैलासेशिखरेरम्येनानारत्नोपशोभिते।

नानाद्रुमलताकोर्णेनानापक्षिरवैर्युतः॥

विविधप्रकारकेरत्नोंसेशोभायमान , विविधप्रकारकेवृक्षोंएवंलताओंसेयुक्त , विविधप्रकारकेपक्षियोंकेस्वरोंसेगुंजारितकैलासपर्वतकाअत्यन्तरमणीयशिखरहै।

सर्वर्तुःकुसुमामोदंमोदितेसुमनोहरं।

शैत्य – सौगन्ध्य – मन्दाढ्यैर्मरुदभिरुपवीजिते॥

जहांसमस्तऋतुएंसुन्दरपुष्पोंसेयुक्तहैंतथाजहांशीतल – सुगान्धितएवंमनमोहकवायुमन्द – मन्दगतिसेप्रवाहितहोरहीहै।

अप्सरोगणसंगीतकलध्वनिनिनादिते।

स्थिरच्छायद्रुमच्छायाच्छादितेस्निग्धमंजुले॥

जहांअप्सराओंकीसुन्दरध्वनियांगूंजरहीहैं , जहांवृक्षोंकीअनन्तछायाव्याप्तहैं।

मत्तकोकिलसंदोहसंघुष्टविपिनान्तरे।

सर्वदास्वर्गणःसार्धऋतुराजनिषेविते॥

जिस ( पर्वत ) कावनमध्यप्रदेशप्रमत्तकोकिलाकेमधुरकूकोंसेमनमोहरहाहै , कूजितहोरहाहै , जहांऋतुराजबसन्तसदैवअपनेसाथियोंकेसाथजिनकीसेवामेंतत्पररहताहै।

सिद्धचारणगन्धर्वैगाणपत्यगणैर्वृते।

तत्रमौनधरंदेवंचराचरजगदगुरुम्॥

जोसिद्धचारणगन्धर्वगणपतिअपनेगणोंवषडाननकेसाथनिवासकरतेथे।ऐसेसुन्दरकैलासके

शिखरपरजगत्केगुरुश्रीशिवजीमौनधारणकिएवासकरतेहैं।

सदाशिवंसदानन्दंकरुणाऽमृतसागरम्।

कर्पूरकुन्दधवलंशुद्धंसत्वगुणमयंविभुम्॥

शिवजीकल्याणकरनेवालेहैं , करुणानिधानहैं , आनन्दितकरनेवालेहैं , अमृतकेअथाहसागरहैं , कपूरएवंकुन्दकीभांतिधवलसतोगुणीप्रभुपवित्रएवंगुणोंसेयुक्तहैं।

दीगम्बरंदीनानाथंयोगीन्द्रंयोगिवल्लभम्।

गंगाशीकरसंसिक्तंजटामण्डलमण्डितम्॥

दसदिशामयवस्त्रधारणकिएहुएदीनानाथ , योगीराज , योगियोंकेप्रिय , जिनकीजटाएंगंगाकेजलसेसदाभीगीरहतीहैं।

विभूतिभूषितंशान्तंव्यालमालंकपालिनम्।

त्रिलोचनंत्रिलोकेशंत्रिशूलवरधारिणम्॥

जिनकेसमस्तअंगोंमेंभस्मविभूषितहोरहीहैं।अत्यन्तशान्तस्वरुपहैं , येत्रिलोकीनाथ ( गलेमें ) मुण्डतथासर्पोंकीमालाधारणकिएहैंतथाहाथमेंत्रिशूलऔरवरमुद्रापकड़ेहुएहैं।

आशुतोषंज्ञानमयंकैवल्यफलदायकम्।

निरातंकंनिर्विकल्पंनिर्विशेषंनिरंजनम्॥

अतिशीघ्रप्रसन्नहोनेवालेज्ञानस्वरुपभगवानआशुतोषमोक्षदाता , निर्विशेषएवंसाक्षात्स्वरुपहैं।

सर्वेषांहितकारंदेवदेवंनिरामयम्।

अर्द्धचन्द्रोज्ज्वलदभालंपञ्चवक्त्रंसुभूषितम्॥

सबप्राणिमात्रकाकल्याणकरनेवाल्व , हितैषी , निरामय , देवोंकेदेवमहादेव , अर्द्धचन्द्रमाकी ‘ चन्द्रिका ‘ जिनकेमस्तकपरसुशोभितरहतीहै , सुन्दरआभूषणोंसेसंपन्नपंचानन ( पांचमुखवाले ) हैं।

प्रसन्नवदनंवीक्ष्यलोकानांहितकाम्यया।

विनयेनसमायुक्तोरावणःशिवमब्रवतीत्॥

उनसदाशिवभगवानकोअत्यन्तप्रसन्नमुखदेखकरलोगोंकेहितकीअभिलाषासेविनम्रहोकरलंकाधिपतिरावण

भगवानशंकरसेपूछताहै।

2…रावण – शिव संवाद

रावण – शिवसंवाद

नमस्तेदेवदेवेशसदाशिवजगदगुरो।

तन्त्रविद्यांक्षणंसिद्धिंकथयस्वममप्रभो॥

हेसदाशिव , देवोंकेदेवजगदगुरुप्रभु ! आपकोमेराप्रणामहै।क्षणभरमेंसिद्धिप्रदानकरनेवालीतन्त्रविद्याकाकथनमुझसेकीजिए।

साधुपृष्टंत्वावत्सलोकानांहितकाम्यया।

उड्डीशाख्यामिदंतन्त्रकथयामितवाग्रतः॥

महादेवजीनेकहा – हेपुत्र ! लोगोंकेहितकीइच्छाकेविचारसेतुमनेयहअच्छापूछाहै।अतःमैंतुमसे ‘ उड्डीश ‘ नामकइसतंत्रकोकहताहूं।

पुस्तकेलिखिताविद्यानैवसिद्धिप्रदानृणाम।

गुरुंविनाहिशास्त्रेऽस्मिन्नाधिकारःकथञ्चन॥

पुस्तकोंमेंलिखीविद्याकभीसिद्धीप्रदानकरनेवालीनहींहोती।गुरुकेबिनातन्त्रशास्त्रपरकिसीकाअधिकारनहींहोता।

आगेरावणसेश्रीशिवकहतेहैं –

अथाभिध्यास्येशास्त्रेऽस्मिन्सम्यक्षटकर्मलक्षणम्।

तन्मन्त्रानुसारेणप्रयोगफलसिद्धिदेम्॥

अबमैंइसशास्त्रमेंसम्यक्तथाउनषटकर्मोंकेलक्षणोंकोतुमसेकहताहूं , जिनकेतन्त्रानुसारएवंमन्त्रानुसारविधिवत्प्रयोगकरनेपरसिद्धिकीप्राप्तिहोतीहै।

 

षटकर्म

शान्तिवश्यस्तम्भनानिविद्वेषोच्चाटनंतथा।

मारणंतानिशंसन्तिषट्कर्मणिमनीषिणः॥

शान्ति , वशीकरण , स्तम्भन , विद्वेषण , उच्चाटन , मारण – इनकोहीप्राचीनमहर्षियोंनेषटकर्मकहाहै।

 

षटकर्मकेलक्षण

रोगकृत्यागृहादीनांनिराशःशान्तिरीरीता।

वश्यंजनानांसर्वेषांविधेयत्वमुदीरितम्॥

जिसप्रयोगकेद्वारारोगोंकीशान्तितथाग्रहोंकीशान्तिकीजाएऔरनिराशाइत्यादिकानाशकियाजाए , उसप्रयोगको ‘ शान्तिकर्म ‘ कहतेहै।सभीमनुष्योंकोअपनेमनोनुकूलकरलेना ‘ वशीकरण ‘ कहलाताहै।

प्रवृत्तिरोधःसर्वेषांस्तम्भनंसमुदाह्नतम्।

स्निग्धानांद्वेषभावंमिथोविद्वेषणंमतम्॥

सभीकीप्रवृत्तिकोरोकनाएवंशत्रुकीगति – मतिकोरोकदेना , अपनेअधिकारमेंकरना ‘ स्तम्भनकर्म ‘ कहलाताहै।दो – प्रेमी , पति – पत्नीयादोपुरुषोमेंद्वेषकरवादेना ‘ विद्वेषणकर्म ‘ कहलाताहै।

उच्चाटनंस्वदेशादेर्भ्रंशनंपरिकीर्तितम्।

प्राणिनांप्राणहरणंमारणंसमुदाहतम्॥

जिसकर्मकेद्वाराकिसीप्राणीकोउसकेनिवासस्थानसेअलगकरदियाजाए , उसकानाम ‘ उच्चाटन ‘ हैऔरकिसीभीप्राणीकोअपनेतन्त्रोबलप्रयोगद्वारामारदियाजाए , उसकेप्राणोमकाहरणकरलियाजाएतोवहप्रयोग ‘ मारण ‘ कहलाताहै।

3…अध्यायों का वर्णन

अध्यायोंकावर्णन

हेराक्षसराज ! भगवानशिवनेकहा –

ग्रन्थेऽस्मिन्कर्षणंचादौद्वितीयोन्मादनंतथा।

विद्वेषणंतृतीयेचचतुर्थोच्चाटनंतथा॥

इसउड्डीशतन्त्रमेंप्रथममेंआकर्षण , द्वितीयमेंउन्माद , तृतीयमेंविद्वेषणएवंचतुर्थमेंउच्चाटनहै।

ग्रामकस्योच्चाटनंपंचजलस्तम्भश्चषष्ठकम्।

स्तम्भनंसप्तकंचैववाजीकरणमष्टमम्॥

पंचममेंगांवकाउच्चाटन , षष्ठमेंस्तम्भन , सप्तममेंसर्वस्तम्भन , अष्टममेंवाजीकरणहै।

अन्यानपिप्रयोगांश्चबहून्श्रृण्वसुराधिप।

अन्धीभावोमूकभावोगात्रसंकोचनंतथा॥

इसप्रकारऔरभीविविधप्रयोगहैं , जैसे — अन्धा , बहरा , गूंगाआदिकरना , अंगोंकासंकोचनकरनेकीकलाकाकथनभीमैंतुमसेकरताहूं।

प्रयोगात्मकविवरण

बधिरोमूकरणेभूतज्वरकरंतथा।

मेघानांस्तम्भनंचैवदध्यादिकविनाशम्॥

इसग्रन्थमेंबहराकरना , मूर्खबनादेना , भूतआदिलगाना , ज्वरचढ़ादेना , बुद्धिकास्तम्भन ( निरोध ) करनाएवंदहीकोनष्टकरदेनाहै।

मत्तोन्मत्तकरंचैवगजवाजिकोपनम्।

आकर्षणंभुजंगानांमानवानांतथैवच॥

पागलबनाना , हाथी – घोड़ोंकोअत्याधिककुपितकरदेना , सर्पतथामनुष्योंकाआकर्षणकरदेना।

सस्यादिनाशनंचैवपरग्रामप्रवेशनम्।

बेतालादिकसिद्धञ्जपादुकाञ्जनसिद्धयः॥

दूसरेगांवमेंप्रवेशकरना , भूत , बैतालकीसिद्धिकरना , पादुकासिद्धिऔरअंजनासिद्धिकाइसमेंविशेषवर्णनहै।

कौतुकंचेन्द्रजालंचयक्षिणी – मन्त्र – साधनम्।

गुटिकाखेचरत्वंचमृतसंजीवनादिकम्॥

अन्यान्बइंस्तथारोद्रान्विद्यामन्त्रांस्थतापरम्।

औषधंचतथागुप्तंकार्यवक्ष्यामियत्नतः॥

उड्डीशयोनजानातिसरुष्टःकिंकरिष्यति।

मेरुंचालयतेस्थानात्सागरेप्लावयेन्महीम्॥

इन्द्रजालकेकौतुक , यक्षिणीमन्त्रकासाधन , आसमानमेंउड़नेकीगुटिका , मृतसंजीवनीविद्याआदिकेअतिरिक्तअन्यघातकविद्याओंकाप्रयोगमन्त्र , औषधि , गुप्तकार्योंकायत्नपूर्वकवर्णममैंतुमसेकहताहूं।जोउड्डीशतन्त्रकोनहींजानताहै , वहकिसीसेक्रोधितहोकरभलाक्याकरसकताहै ? यहतन्त्रसुमेरुपर्वतकोचलायमानकरनेवाला , पृथ्वीकोसमुद्रमेंडुबोदेनेवालाहै।

अकुलीनोऽधमोऽबुद्धिर्भक्तिहीनःक्षुधान्वितः।

मोहितःशंकितश्चापिनिन्दकश्चविशेषतः॥

जोव्यक्तिसत्कुलमेंनहो , जिसकीबुद्धिभ्रष्टहो , भक्तिरहिततथाक्षुधायुक्तहो।मोहित , संदेहशीलयानिन्दितहो।

अभक्तायनदातव्यंतन्त्रशास्त्रमनुत्तमम्।

तथैतेसहसंयोगेकार्यनोड्डीशकीध्रुवम्॥

जोव्यक्तितन्त्रमेंश्रद्धानरखतेहों , ऐसेव्यक्तियोंकोइसउत्तमतन्त्रशास्त्रकोनहींदेनाचाहिएऔरनहीइनसबकेसाथउड्डीशतन्त्रमर्मज्ञकोसंबंधबनाएरखनाचाहिए।

यदिरक्षेत्सिद्धिमेतामात्मानंतुतथैवच।

देवतागुरुभक्तायवातव्यंसज्जनायच॥

यदिइसतंत्रविद्याकीसिद्धिप्राप्तकरनाएवंअपनीआत्माकोसुरक्षितरखनाचाहतेहैंतोइसतंत्रकोसदैवकिसीगुरुभक्तयादेवस्वरुप ( मनुष्य ) कोहीप्रदानकरें।

तपस्वीबालवृद्धानांतथाचैवोपकारिणाम्।

निश्चितंसुमतिंप्राप्ययथोक्तंभाषितानिच॥

कोईतपस्वीबालकहो , कोईवृद्धपुरुषयापरोपकारकरनेवालाहो , तंत्रमेंजोश्रद्धाऔरविश्वासरखताहोतथाजोसत्यव्रतधारीहो , उसीकोयहतंत्रविद्यादेनीचाहिए।

नतिथिर्नचनक्षत्रंनियमोनास्तिवासरः।

नव्रतंनियमोहोमःकालवेलाविवर्जितम्॥

इसतंत्रमेंकथनकिएगएप्रयोगकोकरनेमेंनकिसीविधिकानियमहैं , ननक्षत्रकाऔरनहीकिसीव्रतयाहवनका ; नहीसमयआदिकानियमहैं।

केवलंतंत्रमात्रेणह्योषधिसिद्धिरुपिणी।

यस्यसाधनमात्रेणक्षणात्सिद्धिश्चजायते॥

केवलतंत्रमात्रसेइसमेंसबऔषधियांसिद्धिस्वरुपहैं।इनकेसाधनकरनेसेक्षणभरमेंहीसिद्धिप्राप्तहोजातीहै।

शशिहीनायथारात्रोरविहीनंयथादिनम्।

नृपहीनंयथाराज्यंगुरुहीनंचमंत्रकन्॥

चंद्रमाकेबिनाजिसप्रकाररात्रि , सूर्यकेबिनादिनऔरराजाकेबिनाराज्यसंभवनहींहैं , उसीप्रकारगुरुकेबिनासिद्धिसंभवनहींहोती।

इन्द्रस्यचयथावज्रपाशश्चवरुणस्यच।

यमस्यचयथादण्डोवह्नेशक्तिर्यथादहेत्॥

जिसप्रकारइन्द्रकावज्र , वरुणकापाश , यमराजकादण्डऔरअग्निकीशक्तिजलादेतीहै।

तथैतेमहायोगाःप्रयोज्यःक्षेमकर्मणि।

सूर्यम्प्रपातद्भूमौनेदंमिथ्याभविष्यति॥

इनमहाप्रयोगोंकाऐसेहीअच्छेकर्मोंमेंप्रयोगकरनाचाहिए।इनकेप्रभावसेसूर्यकोभीभूमिपरलायाजासकताहै।यहबातमिथ्यानहींहैं।

No comments:

Post a Comment

#तंत्र #मंत्र #यंत्र #tantra #mantra #Yantra
यदि आपको वेब्सायट या ब्लॉग बनवानी हो तो हमें WhatsApp 9829026579 करे, आपको हमारी पोस्ट पसंद आई उसके लिए ओर ब्लाँग पर विजिट के लिए धन्यवाद, जय माँ जय बाबा महाकाल जय श्री राधे कृष्णा अलख आदेश 🙏🏻🌹

जानये किस किस राशि पर रहेगा ग्रहण का प्रभाव ।

दो चंद्रग्रहण एवं एक सूर्य ग्रहण का योग बन रहा है 5 जून सन 2020 जेस्ट शुक्ला पूर्णिमा शुक्रवार को चंद्र ग्रहण होगा इस ग्रहण का प्रभाव विद...

DMCA.com Protection Status