Thursday, June 18, 2015

आचार्यो का संक्षिप्त विवरण


मध्ययुग में तांत्रिक साधना एवं साहित्यरचना में जितने विद्वानों का प्रवेश हुआ था। उनमें से कुछ विशिष्ट यहाँ दिया जा रहा हैं।

प्राचीन समय के दुर्वासा, अगस्त्य, विश्वामित्र, परशुराम, बृहस्पति, वसिष्ठ, नंदिकेश्वर, दत्तात्रेय प्रभृति ऋषियों का विवरण देना यहाँ अनावश्यक हैं।
ऐतिहासिक युग में श्रीमच्छङ्कराचार्य के परम गुरु गौडपादाचार्य का नाम उल्लेखयोय है। उनके द्वारा रचित ‘ सुभगोदय स्तुति’ एवं ‘श्रीविद्यारत्नसूत्र’ प्रसिद्ध हैं। इस विषय में पहले उल्लेख किया जा चुका है।
लक्ष्मणदेशिक: ये शादातिलक , ताराप्रदीप आदि ग्रथों के रचयिता थे। इनके विषय में यह परिचय मिलता है कि ये उत्पल के शिष्य थे।
शंकराचार्य: वेदांगमार्ग के संस्थापक सुप्रसिद्ध भगवान् शंकराचार्य वैदिक संप्रदाय के अनुरूप तांत्रिक संप्रदाय के भी उपदेशक थे। ऐतिहासिक दृष्टि से पंडितों ने तांत्रिक शंकर के विषय में नाना प्रकार की आलोंचनाएँ की हैं। कोई दोनों को अभिन्न मानते हैं और कोई नहीं मानते है। उसकी आलोचना यहाँ अनावश्यक है। परंपरा से प्रसिद्ध तांत्रिक शंकराचार्य के रचित ग्रंथ इस प्रकार हैं-
1-प्रपंचसार, 2-परमगुरु गौडपाद की सुभगोदय स्तुति की टीका, 3-ललितात्रिशतीभाष्य, 4- आनंदलहरी अथवा सौंदर्यलहरी नामक स्तोत्र 5- क्रमस्तुति । किसी-किसी के मत में ‘कालीकर्पूरस्तव’ की टीका भी शंकराचार्य ने बनाई थी।
पृथिवीधराचार्य अथवा पृथ्वीधराचार्य : यह शंकर के शिष्कोटि में थे। इन्होंने भुवनेश्वरी स्तोत्र तथा भुवनेश्वरी रहस्य की रचना की थी। भुवनेश्वरी स्तोत्र राजस्थान से प्रकाशित है। वेबर ने अपने कैलाग में इसका उल्लेख किया है। भुवनेश्वरी रहस्य वाराणसी में भी उपलब्ध है और उसका प्रकाशन भी हुआ है। भुवनेश्वरी-अर्चन-पद्धति नाम से एक तीसरा ग्रंथ भी पृथ्वीधराचार्य का प्रसिद्ध है।
चरणस्वामी: वेदांत के इतिहास में एक प्रसिद्ध आचार्य हुए हैं। तंत्र में इन्होंने ‘श्रीविद्यार्थदीपिका’ की रचना की है। ‘श्रीविद्यारत्न-सूत्र-दीपिका’ नामक इनका ग्रंथ मद्रास लाइब्रेरी में उपलब्ध है। इनका ‘प्रपंच-सार-संग्रह’ भी अति प्रसिद्ध ग्रंथ है।
सरस्वती तीर्थ: परमहंस परिब्राजकाचार्य वेदांतिक थे। यह संन्यासी थे। इन्होंने भी ‘प्रपंचसार’ की विशिष्ट टीका की रचना की।
राधव भट्ट: ‘शादातिलक’ की ‘पदार्थ आदर्श’ नाम्नी टीका बनाकर प्रसिद्ध हुए थे। इस टीका का रचनाकाल सं0 1550 है। यह ग्रंथ प्रकाशित है। राधव ने ‘कालीतत्व’ नाम से एक और ग्रंथ लिखा था। परंतु उसका अभी प्रकाशन नहीं हुआ।
पुण्यानंद: हादी विद्या के उपासक आचार्य पुण्यानंद ने ‘कामकला विलास’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थी। उसकी टीका ‘चिद्वल्ली’ नाम से नटनानंद ने बनाई। पुण्यानंद का दूसरा ग्रंथ ‘तत्वविमर्शिनी’ है। यह अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है।
अमृतानंदनाथ: अमृतानदनाथ ने ‘योगिनीह्रदय’ के ऊपर दीपिका नाम से टीकारचना की थी। इनका दूसरा ग्रंथ ‘सौभाग्य सुभगोदय’ विख्यात है। यह अमृतानंद पूर्ववर्णित पुणयानंद के शिष्य थे।
त्रिपुरानंद नाथ: इस नाम से एक तांत्रिक आचार्य हुए थे जो ब्रह्मानंद परमहंस के गुरु थे। त्रिपुरानंद की व्यक्तिगत रचना का पता नहीं चलता। परंतु ब्रह्मानंद तथा उनके शिष्य पूर्णानंद के ग्रंथ प्रसिद्ध हैं।
सुंदराचार्य या सच्चिदानंद: इस नाम से एक महापुरुष का आविर्भाव हुआ था। यह जालंधर में रहते थे। इनके शिष्य थे विद्यानंदनाथ। सुंदराचार्य अर्थात् सचिच्दानंदनाथ की ‘ललितार्चन चंद्रिका’ एवं ‘लधुचंद्रिका पद्धति’ प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।
विद्यानंदनाथ का पूर्वनाम श्रीनिवास भट्ट गोस्वामी था। यह कांची (दक्षिण भारत) के निवासी थे। इनके पूर्वपुरुष समरपुंगव दीक्षित अत्यंत विख्यात महापुरुष थे। श्रीनिवास तीर्थयात्रा के निमित जालंधर गए थे और उन्होंने सच्चिदानंदनाथ से दीक्षा ग्रहण कर विद्यानंद का नाम धारण किया। गुरु के आदेश से काशी आकर रहने लगे। उन्होंने बहुत से ग्रंथों की रचना की जिनमें से कुछ के नाम इस प्रकार हैं- ‘शिवार्चन चंद्रिका’ , ‘क्रमरत्नावली’ , ‘ भैरवार्चापारिजात’ , ‘द्वितीयार्चन कल्पवल्ली’ , ‘काली-सपर्या-क्रम-कल्पवल्ली’, ‘पंचमेय क्रमकल्पलता’ , ‘सौभाग्य रत्नाकर’ (36 तरंग में), ‘सौभग्य सुभगोदय’ , ‘ज्ञानदीपिका’ और ‘चतु:शती टीका अर्थरत्नावली’ । सौभाग्यरत्नाकर, ज्ञानदीपिका और अर्थरत्नावली सम्पूर्णानन्दविश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रकाशित हैं ।
नित्यानंदनाथ: इनका पूर्वनाम नाराणय भट्ट है। उन्होंने दुर्वासा के ‘देवीमहिम्र स्तोत्र’ की टीका की थी। यह तन्त्रसङ्ग्रह में प्रकाशित है । तन्त्रसङ्ग्रह सम्पूर्णानन्दविश्वविद्यालय से प्रकाशित है ।उनका ‘ताराकल्पलता पद्धति’ नामक ग्रंथ भी मिलता है।
सर्वानंदनाथ: इनका नाम उल्लेखनीय है। यह ‘सर्वोल्लासतंत्र’ के रचयिता थे। इनका जन्मस्थान मेहर प्रदेश (पूर्व पाकिस्तान) था। ये सर्वविद्या (दस महाविद्याओं) के एक ही समय में साक्षात् करने वाले थे। इनका जीवनचरित् इनके पुत्र के लिखे ‘सर्वानंद तरंगिणी’ में मिलता है। जीवन के अंतिम काल में ये काशी आकर रहने लगे थे। प्रसित्र है कि यह बंगाली टोला के गणेश मोहल्ला के राजगुरु मठ में रहे। यह असाधरण सिद्धिसंपन्न महात्मा थे।
निजानंद प्रकाशानंद मल्लिकार्जुन योगीभद्र: इस नाम से एक महान् सिद्ध पुरुष का पता चलता है। यह श्रीक्रमोत्तम नामक एक चार उल्लास से पूर्ण प्रसिद्ध ग्रंथ के रचयिता थे। श्रीक्रमोत्तम श्रीविद्या की प्रासादपरा पद्धति है।
ब्रह्मानंद: इनका नाम पहले आ चुका है। प्रसिद्ध है कि यह पूर्णनंद परमहंस के पालक पिता थे। शिक्ष एवं दीक्षागुरु भी थे। ‘शाक्तानंद तरंगिणी’ और’तारा रहस्य’ इनकी कतियाँ हैं।
पूर्णानंद : ‘श्रीतत्त्वचिंतामणि’ प्रभृति कई ग्रंथों के रचयिता थे। श्रीतत्वचिन्तामणि का रचनाकाल 1577 ई0 है। ‘श्यामा अथवा कालिका रहस्य’ शाक्त क्रम ‘तत्वानंद तरंगिणी’, ‘षटकर्मील्लास’ प्रभृति इनकी रचनाएँ हैं। प्रसिद्ध ‘षट्चक्र निरूपण’ ‘श्रीतत्वचितामणि’ का षष्ठ अध्याय है।
देवनाथ ठाकुर तर्कपंचानन : ये 16वीं शताब्दी के प्रसिद्ध ग्रंथकार थे। इन्होंने ‘कौमुदी’ नाम से सात ग्रंथों की रचना की थी। ये पहले नैयायिक थे और इन्होंने ‘तत्वचिंतामणि’ की टीका आलोक पर परिशिष्ट लिखा था। यह कूचविहार के राजा मल्लदेव नारायण के सभापंडित थे। इनके रचित ‘सप्तकौमुदी’ में ‘मंत्रकौमुदी’ एवं ‘तंत्र कौमुदी’ तंत्रशास्त्र के ग्रंथ हैं। इन्होंने ‘भुवनेश्वरी कल्पलता’ नामक ग्रंथ की भी रचना की थी।
गोरक्ष: प्रसिद्ध विद्वान् एवं सिद्ध महापुरुष थे। ‘महार्थमंजरी’ नामक ग्रंथरचना से इनकी ख्याति बढ़ गई थी। इनके ग्रंथों के नाम इस प्रकार हैं- “महार्थमंजरी’ और उसकी टीका ‘परिमल’ , ‘संविदुल्लास’ , ‘परास्तोत्र’ , ‘पादुकोदय’ , ‘महार्थोदय’ इत्यादि।
‘संवित्स्तोत्र’ के नाम से गोरक्ष के गुरु का भी एक ग्रंथ था। गोरक्ष के गुरु ने ‘ऋजु विमर्शिनी’ और ‘क्रमवासना’ नामक ग्रंथों की भी रचना की थी।
सुभगानंद नाथ ओर प्रकाशानंद नाथ: सुभगांनंद केरलीय थे। इनका पूर्वनाम श्रीकंठेश था। यह कश्मीर में जाकर वहाँ के राजगुरु बन गए थे। तीर्थ करने के लिये इन्होंने सेतुबंध की यात्रा भी की जहाँ कुछ समय नृसिंह राज्य के निकट तंत्र का अध्ययन किया। उसके बाद कादी मत का ‘षोडशनित्या’ अर्थात् तंत्रराज की मनोरमा टीका की रचना इन्होंने गुरु के आदेश से की। बाईस पटल तक रचना हो चुकी थी, बाकी चौदह पटल की टीका उनके शिष्य प्रकाशानंद नाथ ने पूरी की। यह सुभगानंद काशी में गंगातट पर वेद तथा तंत्र का अध्यापन करते थे। प्रकाशानंद का पहला ग्रंथ ‘विद्योपास्तिमहानिधि’ था। इसका रचनाकाल 1705 ई0 है। इनका द्वितीय ग्रंथ गुरु कृत मनोरमा टीका की पूर्ति है। उसका काल 1730 ई0 है। प्रकाशानंद का पूर्वनाम शिवराम था। उनका गोत्र ‘कौशिक’ था। पिता का नाम भट्टगोपाल था। ये त्र्यंबकेश्वर महादेव के मंदिर में प्राय: जाया करते थे। इन्होंने सुभगानंद से दीक्षा लेकर प्रकाशानंद नाम ग्रहण किया था।
कृष्णानंद आगमबागीश : यह बंग देश के सुप्रसिद्ध तंत्र के विद्वान् थे जिनका प्रसिद्ध ग्रंथ ‘तंत्रसार’ है। किसी किसी के मतानुसार ये पूर्णनंद के शिष्य थे परंतु यह सर्वथा उचित नहीं प्रतीत होता। ये पश्वाश्रयी तांत्रिक थे। कृष्णानंद का तंत्रसार आचार एवं उपासना की दृष्टि से तंत्र का श्रेष्ठ ग्रंथ है।
महीधर: काशी में वेदभाष्यकार महीधर तंत्रशास्त्र के प्रख्यात पंडित हुए हैं। उनके ग्रंथ ‘मन्त्रमहोदधि’ और उसकी टीका अतिप्रसिद्ध हैं (रचनाकाल 1588 ई0)।
नीलकंठ: महाभारत के टीकाकार रूप से महाराष्ट्र के सिद्ध ब्रह्मण ग्रंथकार। ये तांत्रिक भी थे। इनकी बनाई ‘शिवतत्वामृत’ टीका प्रसिद्ध हैं। इसका रचनाकाल 1680 ई0 है।
आगमाचार्य गौड़ीय शंकर: आगमाचार्य गौड़ीय शंकर का नाम भी इस प्रसंग में उल्लेखनीय है। इनके पिता का नाम कमलाकर और पितामह का लंबोदर था। इनके प्रसिद्ध ग्रंथ तारा-रहस्य-वृत्ति और शिवार्च(र्ध)न माहात्म्य (सात अध्याय में) हैं। इसके अतिरिक्त इनके द्वारा रचित और भी दो तीन ग्रंथों का पता चलता है जिनकी प्रसिद्धि कम है। भास्कर राय : 18वीं शती में भास्कर राय एक सिद्ध पुरुष काशी में हो गए हैं जो सर्वतंत्र स्वतंत्र थे। इनकी अलौकिक शक्तियाँ थी। इनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं- सौभाग्य भास्कर’ (यह ललिता सहस्र-नाम की टीका है, रचनाकाल 1729 ई0) ‘सौभाग्य चंद्रोदय’ (यह सौभाग्यरत्नाकर की टीका है।) ‘बरिबास्य रहस्य’ , ‘बरिबास्यप्रकाश’ ; ‘शांभवानंद कल्पलता'(भास्कर शाम्भवानन्दकल्पलता के अणुयायी थे – ऐसा भी मत है), ‘सेतुबंध टीका’ (यह नित्याषोडशिकार्णव पर टीका है, रचनाकाल 1733 ई0); ‘गुप्तवती टीका’ (यह दुर्गा सप्तशती पर व्याख्यान है, रचनाकाल 1740 ई0); ‘रत्नालोक’ (यह परशुराम ‘कल्पसूत्र’ पर टीका है); ‘भावनोपनिषद्’ पर भाष्य प्रसिद्व है कि ‘तंत्रराज’ पर भी टीका लिखी थी। इसी प्रकार ‘त्रिपुर उपनिषद्’ पर भी उनकी टीका थी । भास्कर राय ने विभिन्न शास्त्रों पर अनेक ग्रंथ लिखे थे।
प्रेमनिधि पंथ : इनका निवास कूर्माचल (कूमायूँ) था। यह घर छोड़कर काशी में बस गए थे। ये कार्तवीर्य के उपासक थे। थोड़ी अवस्था में उनकी स्त्री का देहांत हुआ। काशी आकर उन्होंने बराबर विधासाधना की। उनकी ‘शिवतांडव तंत्र’ की टीका काशी में समाप्त हुई। इस ग्रंथ से उन्हें बहुत अर्थलाभ हुआ। उन्होने तीन विवाह किए थे। तीसरी पत्नी प्राणमंजरी थीं। प्रसिद्व है कि प्राणमंजरी ने ‘सुदर्शना’ नाम से अपने पुत्र सुदर्शन के देहांत के स्मरणरूप से तंत्रग्रंथ लिखा था। यह तंत्रराज की टीका है।प्रेमनिधि ने ‘शिवतांडव’ टीका ‘ मल्लादर्श’, ‘पृथ्वीचंद्रोदय’ और ‘शारदातिलक’ की टीकाएँ लिखी थीं। उनके नाम से ‘भक्तितरंगिणी’ , ‘दीक्षाप्रकाश’ (सटीक) प्रसिद्ध है। कार्तवीर्य उपासना के विशय में उन्होंने ‘दीपप्रकाश नामक’ ग्रथ लिखा था। उनके ‘पृथ्वीचंद्रादय’ का रचनाकाल 1736 ई0 है। कार्तवीर्य पर ‘प्रयोग रत्नाकर’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ है।
‘श्रीविद्या-नित्य-कर्मपद्धति-कमला’ तंद्त्रराज से संबंध रखता है। वस्तुत: यह ग्रंथ भी प्राणमंजरी रचित है।
उमानंद नाथ: यह भासकर राय के शिष्य थे और चोलदेश के महाराष्ट्र राजा के सभापंडित थे। इनके दो ग्रंथ प्रसिद्ध हैं- 1. हृदयामृत (रचनाकाल 1742 ई0), 2- नित्योत्सवनिबंध (रचनाकाल 1745ई0)।
रामेश्वर: तांत्रिक ग्रंथकार। इन्होंने ‘परशुराम-कल्पसूत्र-वृति’ की रचना की थी जिसका नाम ‘सौभागयोदय’ है। यह नवीन ग्रंथ है जिसका रचनाकाल 1831 ई0 है।
शंकरानंद नाथ: ‘सुंदरीमहोदय’ के रचयिता थे। यह प्रसिद्ध मीमांसक थे। सुप्रसिद्ध पंडित भट्ठ दीपिकादिकर्ता खंडदेव के शिष्य थे। इनका नाम पहले कविमंडन था। इनके मीमांसाशास्त्र का ग्रंथ भी प्रसिद्ध हैं। इन्होंने धर्मशास्त्र में भी अच्छी गति प्राप्त की थी। यह त्रिपुरा के उपासक थे। शाक्त दीक्षा लेने के अनंतर यह शंकरानंद नाथ नाम से प्रसिद्ध हुए।
अप्पय दीक्षित: शैव मत में अप्पय दीक्षित के बहुत से ग्रंथ हैं। समष्टि में शताधिक ग्रंथों की दन्होंने विभिन्न विषयों से संबंधित रचनाएँ की थी। ‘शिवाद्वैत निर्णय’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ इन्हीं का है।
माधवानंद नाथ: इस नाम से एक तंत्राचार्य लगभग 100 वर्ष पूर्व काशी में प्रकट हुए थे इनके गुरू यादवानंद नाथ थे। इन्होंने ‘सौभागय कल्पद्रुम’ की रचना की थी जो ‘परमानंद तंत्र’ के अनुकूल ग्रंथ है। यह ग्रंथ काशी में लिखा गया था।
क्षेमानंद: इन्होंने पूर्वोक्त ‘सौभाग्य कल्पद्रुम’ के ऊपर ‘कल्पलतिका’ नाम की टीका लिखी थी। इनका ‘कल्पद्रुम सौरभ’ टीका रूप से प्रसिद्ध है।
गीर्वाणेन्द्र सरसवती और शिवानंद योगींद्र: ये दोनों संन्यासौ ‘प्रपंचसार’ के टीकाकार के रूप में प्रसिसद्ध हुए हैं। यह प्रकाशित है। गीर्वाणेन्द्र के ग्रंथ का नाम ‘प्रपंचसार संग्रह’ और शिवानंद के ग्रंथ का नाम ‘प्रपंच उद्योतारूण’ है।
रघुनाथ तर्कवाशीग: वंग देश में इस नाम के तंत्र के एक प्रसिद्ध आचार्य थे। ये पूर्व बंगाल में नपादी स्थान के थे। इनका ग्रंथ है ‘आगम-तर्क-विलास’ जो पाँच अध्यायों में विभक्त है। इसका रचनाकाल 1609 शकाब्द (1687) है।
महादेव विद्यावागीश: प्रसिद्ध वगीय आचायर्य जिन्होंने ‘आनंदलहरी’ पर ‘तत्वबोधिनी’ शीर्षक टीका की रचना की। (रचनाकाल 1605 ई0)।
यदुनाथ चक्रवर्ती: बंगीय विद्वान् यदुनाथ चक्रवर्ती के ‘पंचरत्नाकर’ और ‘ आगम कल्पलता’ किसी समय पूर्व भारत में अति प्रसिद्ध ग्रंथ माने जाते थे।
नरसिंह ठाकुर: मिथिला के नरसिंह ठाकुर ‘तारामुक्ति सुधार्णाव’ लिखकर जगद्विख्यात हुए यह प्राय: तीन सौ वर्ष पूर्व मिथिला में तंत्रविद्या की साधना करते थे।
गोविद न्यायवागीश: यह ‘मंत्रार्थ दीपिका’ नामक ग्रंथ के लिये प्रसिद्ध हैं।
काशीनाथ तर्कालंकार: इनका ‘श्यामा सपर्याविधि’ प्रसिद्ध ग्रंथ है। यह काशी में रहे और एक महाराष्ट्रीय तांत्रिक ब्राह्मण विद्वान् थे। उनका दीक्षांत नाम शिवानंद नाथ है। ये दक्षिणाचारावलंबी थे और वामाचार का उन्होंने घोर विशेध किया। अनके ग्रंथों में ‘ज्ञानार्णाव’ की टीका (23 पटल में) गूढार्थ आदर्श हौर दक्षिणाचार की ‘तंत्रराज टीका’ प्रसिद्ध हैं। इनका ‘चक्रसंकेत चंद्रिका’ ‘योगिनीहृदय दीपिका’ का संक्षिप्त विवरण है। इन्होंने छोटे बड़े बहुसंख्यक ग्रंथ लिखे थे जिनमें से ‘तंत्रसिद्धांत कौमुदी’ , ‘मंत्रसिद्धांत मंजरी’, ‘तंत्रभूषा’, ‘त्रिपुरसुंदरी अर्चाक्रम’ , ‘कर्पूंरंस्तवदीपिका’, ‘श्रीविद्यामंत्रदीपिका’ , ‘वामाचारमत-खंडनफ़’ मंत्रचंद्रिकाफ (11उल्लास में), ‘संभवाचार्य कौमुदी’ (पाँच प्रकाश में), ‘शिवभक्ति रसायन’, ‘शिवाद्वैत प्रकाशिका’ (तीन उल्लास में), ‘शिवपूजा तरंगिणी’, ‘कौलगजमर्दन’, ‘मंत्रराज समुच्चय’ , इत्यादि प्रसिद्ध है।
काशीनाथ ने अपने ‘वैदिक अधिकार निर्णय’ के विषय में कहा है कि तंत्रोपासना के चार भेदों के अनुसार चार प्रकार के तांत्रिक उल्लेखयोग्य हैं-
1. शुद्ध वैदिक (यह तंत्र की गंध भी सहन नहीं कर सकते),
2. तांत्रिक वैदिक,
3. शुद्ध तांत्रिक (यह तंत्र में अधिक विशिष्टता रखते हैं और वेद की गंध सहन नही कर सकते; यथा पाशुपत मतावलंबी),
4. वैदिक तांत्रिक (यह वेदांग के पोषक और तंत्र को उसका फ़ अंगीफ़ मानते हैं)।
तंत्रसाहित्य और उसके साधकों का यह अत्यंत संक्षिप्त विवरण है। इसमें बहुत से ग्रंथों के नाम दूटे हुए हैं, परंतु मुख्य एवं विशिष्ट नाम दे दिए गए हैं।

2….तंत्रशास्त्र की दृष्टि से अधिकार शब्द का मूल्य साधनात्मक है। साधना में प्रवेश पाने के लिए जिस योग्यता, क्षमता की प्राप्ति आवश्यक होती है, उसे अधिकार कहते हैं। इनसे तत्वज्ञान आदि मोक्ष का अधिकार मिलता है।

सार्वजनिक और सार्वदेशिक शास्त्र तंत्र विभिन्न साधनक्रमों, अंतर्यांग, बहिर्यांग, षट्कर्म, ध्यानयोग आदि के अधिकारों का विधान मानव कल्याण के लिए ही करते हैं। तांत्रिक साधक पशु, वीर, दिव्य भावों के द्वारा महाशक्ति की अर्चना करता हुआ सकल ब्रह्म के शक्तिस्वरूप को अनादि चेतन और आनंदरूप समझकर आत्मविवेक की उपलब्धि करता है। वामकेश्वरतंत्र के अनुसार जन्म से 16 वर्ष तक पशुभाव, 50 वर्ष तक वीरभाव और आगे का समय दिव्य भाव का होता है। अधिकारार्थ दीक्षाग्रहण, अभिषेक आदि संस्कार शिष्य के लिए अपरिहार्य हैं। लोकधर्मी और शिवधर्मी, बुभुक्षु और मुमुक्षु, शैक्ष और अशैक्ष (बौद्ध) आदि के अधिकारवैचित्र्य एवं शक्तिपात की तीव्रता के अनुसार दीक्षा के भी विभिन्न भेद होते हैं। अधिकार के 21 संस्कारों के उपरांत शाकाभिषेक, पूर्णाभिषेक, महासाम्राज्याभिषेक आदि की विधि संपन्न होती है। अंत में सर्वांगीण अधिकार के लिए आचार्याभिषेक होता है जिसके बिना दीक्षा देने का अधिकार नहीं मिलता। विवृति के लिए स्वच्छंदतंत्र देखा जा सकता है। अधिकार और साधकभेद से पंचमकारों में भी अर्थभेद मिलता है। बौद्ध तंत्रों में भी इस अधिकारभेद का विस्तार मिलता है। अधिकार निर्णय में शैथिल्य के कारण तांत्रिक साधनाओं को कालांतर में आपाततः निंदित होना पड़ता है।

तंत्र एक उत्तेजनात्मक उग्र प्रणाली है । उससे आंधी तूफान की तरह भयंकर कार्य कर डालने की शक्ति पैदा होती है । बड़े आकर्षक प्रलोभन सामने आते हैं परन्तु यह ध्यान रखने की बात है कि साधना में थोड़ी सी भूल हो जाने पर भयंकर खतरा भी है । तंत्र भ्रष्ट साधक बीमारी, पागलपन, अंग-आंग या किसी प्राणघातक संकट में फंस सकता है । यदि सिद्धि मिली भी तो तंत्र की तमोगुणी प्रधान शक्तियाँ आत्मा को कलुषित करके अधःपतन की ओर ही ले जाती हैं ।

हमें इस दिशा में बड़े कटु अनुभव है । कई बार मृत्यु मुख में से वापिस लौटकर नया जीवन पाया है । ऐसे जोखिम भरे मार्ग में हम दूसरों को डालने की जिम्मेवारी अपने ऊपर नहीं लेते । इसलिए वाममार्गी तांत्रिका सिद्धियाँ प्राप्त करने के इच्छुकों को सदा हमारी यही सलाह रहती है कि वे आकर्षण, प्रलोभन, चमत्कार, आतंक जमाने की क्षमता, प्रशंसा एवं लोगों में पूजने के लोभ को त्याग कर तंत्र से विमुख ही रहें । यह मार्ग कुछ विशेष व्यक्तियों के लिए ही उपयुक्त हो सकता है । पर सर्व साधारण के लिए तो सर्वथा अनुपयुक्त ही है ।

तंत्र में जहाँ सभी वर्ण को साधना का अधिकार है तथा जाति-भेद और स्त्री-पुरुष का कोई प्रतिबंध नहीं है, वहाँ साधन-विधियाँ भी गुप्त रखी गयी हैं और अधिकारी गुरु से ही प्राप्त की जा सकती है । गुरु भी अधिकारी की परीक्षा करके रहस्यमयी विद्या की दीक्षा देता है। गोपनीयता का कारण साधना विधियों को उनके दुरुपयोग से बचाना है, क्योंकि तंत्र, शक्ति-विकास का विज्ञान है ।

इससे अपना व समाज का हित भी किया जा सकता है और अहित भी । ऐसे भी विधान हैं, जिनसे आतंक और भय का वातावरण उत्पन्न किया जा सकता है । ऐसी स्थिति न आने पाए, इसलिए साधना-विधान हर किसी का नहीं बताया जाता, उसे गुप्त रखा जाता है ।

उपनिषदों की परविद्या को ‘गुह्रा’ घोषित किया गया है और उस रहस्यमयी का दूसरों को न बताने को आदेश दिया गया है । गीताकार ‘राजयोग’ के भी ‘गुह्रा’ की संज्ञा देते हैं । तंत्रों में अपनी साधना को ‘योनि’ की तरह गुप्त रखने की बात कही गई है । जिस तरह स्त्री अपने गुह्रा अंगों को पति के अतिरिक्त सबसे छिपाती है, उसी तरह अपने पति-भगवान के अतिरिक्त इसे सबसे छिपाना चाहिए ।

गीता भी गोपनीयता की नीति का समर्थन करती है ।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
च नाशुश्रूषवे वाच्यं न मां योऽभ्यसूयति॥ -गीता
”तपस्या-विहीन, अभक्त या जिसको अभी तक इन बातों के सुनने की तीव्र इच्छा न हुई और जो गुरु-सेवा परायण न हो या जो मुझसे (ईश्वर) से असूया रखता हो, ऐसे व्यक्ति से बातें न कहनी चाहिए ।”

तंत्र-शास्त्रों में तो इस आशय के स्पष्ट आदेश दिए गए हैः
स्वमंत्रा नोपदेष्टव्यो वक्तव्यश्च न संसदि ।
गोपनीयं तथा शास्त्रं रक्षणीयं शरीरवत्॥ -नारद पञ्चरात्र
”अपने मंत्र का किसी को न उपदेश, न सभा में उसे कहे । पूजा-विधि को गुप्त रखे और तद्विषयक शास्त्र की शरीर की तरह रक्षा करे ।”

इति मे सम्यगाख्याताः शांति शुध्यादि कल्पना ।
रहस्याति रहस्याश्च गोपनीयास्त्वया सदा॥
अर्थात्-नारद जी! यह हमने आपसे शांति-शुद्धादि कल्पना रहस्य कहा है । यह रहस्य का भी रहस्य है । यह आपको सर्वदा गुप्त रखने योग्य है ।

गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
त्वयाति गोपितव्यं हि न देयं यस्य कस्यचित्॥
”इन साधना-विधियों को यत्नपूर्वक गुह्रा रखो-गुप्त रखो । इनको अपने तक ही सीमित रखो, किसी ऐसे-वैसे को मत बताओ ।”

न देयं पर शिष्येभ्याह्राकेभ्यो विशेषतः ।
शेष्येभ्यो भक्ति युक्तेभ्याह्रान्ययामृत्युमाप्नुयात्॥
”दूसरे के शिष्य के लिए विशेषकर भक्तिरहित के लिए यह मंत्र कभी नहीं देना चाहिए । इसकी दीक्षा भक्तियुक्त शिष्य को ही देनी चाहिए अन्यथा मृत्यु की प्राप्ति होती है ।”

कथितं सारभूत ते खेलत्खञ्जनलोचने ।
ब्रह्मज्ञानं मया देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥
नातः परतरं किञ्चिद्विद्यते मम मानसे ।
गोपनीयं सदा भद्रे पशुपापर सन्निघौ॥ -योगिनी तंत्र
अर्थात्-”हे देवदेवेशि! यह अत्यन्त सारभूत ब्रह्मज्ञान मैंने तुम्हारे प्रति कहा है, अब अधिक क्या सुनने की इच्छा रखती हो? इससे बढ़कर अन्य कुछ मेरे अन्तर में नहीं है । इस ज्ञान को पशु और पामर व्यक्ति से सदा गुप्त रखना चाहिए । ”

अति गुह्रामिदं पृष्टं त्वया ब्रह्मतनूद्भव ।
न कस्यापि वक्तव्यं दुष्टाय पिशुनाय च॥ -गायत्री तंत्र
”यह सुनकर श्री नारायण ने कहा कि हे नारद! आपने अत्यन्त गुप्त बात पूछी है, परन्तु यह किसी दुष्ट या पिशुन (छलिया) से नहीं कहनी चाहिए ।”

रहस्याति रहस्यानां रहस्योऽयं महेश्वरि ।
ऊर्ध्द्धाम्नायः समाख्यातः समासेन च विस्तरात्॥
कुलार्णवमिदं शास्त्रं योगिनीनां ह्रहि स्थितम् ।
प्रकाशितं मया चाद्य गोपनीयं प्रयत्नतः॥
अर्थात्-हे महेश्वरी! यह जो परम गूढ़ एंव अत्यन्त ही रहस्य है, उसका भी यह सबसे प्रबल रहस्य है जो कि ऊर्ध्वाम्नाय मैंने तुम्हारे सामने बतला दिया है । इसका विशेष विशद् वर्णन नहीं किया है, यह कुलार्णव शास्त्र है, जो योगिनियों के हृदय में स्थित रहा करता है । यह कभी किसी के सामने प्रकाशित नहीं किया जाता है । तुम्हारे अत्यन्त प्रेमानुरोध होने के कारण मैंने आज प्रकाशित कर दिया है । किन्तु मेरा आदेश है कि इसको प्रयत्नपूर्वक अन्यन्त गुप्त रखना ।

कुलार्णव तंत्र में ही एक और स्थान पर है कि अपना धन, स्त्री और प्राण तक अर्पण कर दे परन्तु गुह्रा शास्त्र को अनिधिकारी व्यक्ति को न बताए ।

उपरोक्त प्रमाणों में यह बताया गया है कि तंत्र एक गुप्त विज्ञान है । उसकी सब बाते सब लोगों के सामने प्रकट करने योग्य नहीं होती । कारण यह है कि तांत्रिक साधनाएँ बड़ी क्लिस्ट होती हैं । वे उतनी ही कठिन हैं जितना कि समुद्र की तली में घुसकर मोती निकालना ।

चन्दन के वृक्षों के निकट सर्पों का निवास रहता है, गुलाब के फूलों में काँटे होते हैं, शहद प्राप्त करने के लिए मक्खियों के डंकों का सामना करना पड़ता है, सर्प-मणि पाने के लिए भयंकर सर्प से और गजमुक्ता पाने के लिए मदोन्मत्त हाथी से जूझना पड़ता है । तांत्रिक पुरुषार्थ ऐसे ही विकट पुरुषार्थ हैं, जिनके पीछे खतरों की श्रृंखला जुड़ी रहती है । यदि ऐसा न होता, तो उन लाभों को हर कोई आसानी से प्राप्त कर लिया करता ।

तलवार की धार पर चलने के समान तंत्र-विद्या के कठिन साधन हैं । उसके लिए साधक में पुरुषार्थ, साहस, दृढ़ता, निर्भयता और धैर्य पर्याप्त होना चाहिए । ऐसे व्यक्ति सुयोग्य अनुभवों गुरु की अध्यक्षता में यदि स्थिर चित्त से श्रद्धापूर्वक साधना करें तो वे अभिष्ट साधन में सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं । परन्तु यदि निर्बल मनोभूमि के-डरपोक, संदेही स्वभाव वाले, अश्रद्धालु, अस्थिर मति किसी साधन को करें और थोड़ा-सा संकट उपस्थित होते ही उसे छोड़ भागें, तो वैसा ही परिणाम होता है जैसा कि किसी सिंह या सर्प को पहले तो छेड़ा जाय पर जब वह कुद्ध होकर अपनी ओर लपके तो लाठी-डण्डा फेंककर बेतहाशा भागा जाय ।

तंत्र एक उत्तेजनात्मक उग्र प्रणाली है । इस प्रक्रिया के अनुसार जो साधना की जाती है, उससे प्रकृति के अन्तराल में बड़े प्रबल कम्पन उत्पन्न होते हैं, जिनके कारण ताप और विक्षोप की मात्रा बढ़ती है । गर्मी के दिनों में सूर्य की प्रचण्ड किरणों के कारण जब वायुमण्डल का तापमान बढ़ जाता है तो हवा बहुत तेज चलने लगती है । लू, आँधी और तूफान के दौर बढ़ते हैं । उस उग्र उत्तेजना में खतरे बढ़ जाते हैं, किसी को लू सता जाती है, किसी की आँखों में धूलि भर जाती है, अनेकों के शरीर फोड़े-फन्सियों से भर जाते हैं । कई बार छप्पर उड़ जाते हैं, पेड़ उखड़ जाते हैं । कई बार हवा के भँवर पड़ जाते हैं, जो एक छोटे दायरे में बड़ी तेजी से नाचते हुए डरावनी शक्ल में दिखाई पड़ते हैं ।

तंत्र की साधनाओं से ग्रीष्मकाल का-सा उत्पात पैदा होता है और मनुष्य के बाह्म एवं आन्तरिक वातावरण में एक प्रकार की सूक्ष्म लू एवं आँधी चलने लगती है, जिसकी प्रचण्डता के भयंकर झकझोरे लगते हैं । यह झकझोरे मस्तिष्क के कल्पना-तन्तुओं से जब संघर्ष करते हैं, तो अनेकों प्रकार की प्रतिमूर्तियाँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं ।

ऐसे अवसर पर डरावने, भूत, प्रेत, पिशाच, देव, दानव जैसी आकृतियाँ दिख सकती हैं, दृष्टि-दोष उत्पन्न होने के कारण कुछ का कुछ दिखाई दे सकता है । अनेकों प्रकार के शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श का अनुभव हो सकता है । यदि साधक निर्भयतापूर्वक इन स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं को देखकर मुस्कराता न रहे, तो उसका साहस नष्ट हो सकता है और उन भयंकरताओं से यदि वह भयभीत हो जाय तो वह भय उसके लिए संकट बन सकता है ।

इस प्रकार की कठिनाई का हर कोई मुकाबला नहीं कर सकता, इसके लिए एक विशेष प्रकार की साहसपूर्ण मनोभूमि होनी चाहिए । मनुष्य दूसरों के विषय मे तो परीक्षा-बुद्धि रखता है पर अपनी स्थिति का ठीक परीक्षण कोई विरले ही कर सकते हैं ।

”मैं तंत्र साधनायें कर सकता हूँ या नहीं” इसका निर्णय अपने लिए कोई मनुष्य स्वयं नही कर सकता । इसके लिए उसके किसी दूसरे अनुभवी व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ती है । जैसे रोगी अपनी चिकित्सा स्वयं नहीं कर सकता, विद्यार्थी अपने आप अपनी शिक्षा नहीं कर सकता, वैसे ही तांत्रिक साधनाएँ भी अपने आप नहीं की जा सकती, इसके लिए विज्ञ पुरुष को गुरु नियुक्त करना होता है । वह गुरु सबसे पहले अपने शिष्य की मनोभूमि का परीक्षण करता है और तब उस परीक्षण के आधार पर यह निश्चित करता है कि इस व्यक्ति के लिए कौन-सी साधना उपयोगी होगी और उसकी विधि में अन्यों की अपेक्षा क्या हेर-फेर करना ठीक होगा ।

साधना-काल में जो विक्षेप आते हैं, उनका तात्कालिक उपचार और भविष्य के लिए सुरक्षा-व्यवस्था बताना भी गुरु के द्वारा ही सम्भव है । इसीलिए तंत्र साधनाएँ गुरु-परम्परा से चलती है । सिद्धि के लोभ से अधिकारी साधक स्वयं, अपने आप, उन्हें ऊटपटाँग ढंग से न करने लग जाए, इसलिए उन्हें गुप्त रखा जाता है । रोगी के निकट मिठाइयाँ नहीं रखी जातीं, क्योंकि पचाने की शक्ति न रखते हुए भी यदि लोभवश उसने उन्हें खाना शुरु कर दिया तो अनन्तः उसी का अहित होगा ।

तंत्र की साधनाएँ सिद्ध कर लेने के बाद जो शक्ति आती है, उसका यदि दुरुपयोग होने लगे तो उससे संसार में बड़ी अव्यवस्था फैल सकती है, दूसरों का अहित हो सकता है, अनधिकारी लोगों को अनावश्यक रीति से लाभ या हानि पहुँचाने से उनका अनिष्ट ही होता है बिना परिश्रम के लाभ प्राप्त होता है । वह अनेक प्रकार के दुर्गुण पैदा करता है । जिसने जुआ खेलकर दस हजार रुपया कमाया है वह उन रुपयों का सदुपयोग नहीं कर सकता और न उनके द्वारा वास्तविक सुख प्राप्त कर सकता है ।

इसी प्रकार ईश्वरीय या राजकीय विधि से मिलने वाले स्वाभाविक दण्ड-विधान को छोड़कर किसी को मंत्र-बल से हानि पहुँचाई जाती है, वह गर्भपात के समान अहितकर ही होती है । तंत्र में सफल हुआ व्यक्ति ऐसी गड़बड़ी पैदा कर सकता है । इसलिए हर किसी को उसकी साधना करने का अधिकार नहीं दिया गया है ।

वह तो एक विशेष मनोभूमि के व्यक्तियों के लिए सीमित क्षेत्र में उपयोग होने वाली वस्तु है, इसलिए उसका सार्वजनिक प्रकाशन नहीं किया जाता । हमारे घर केवल उन्हीं व्यक्तियों के प्रयोग के लिए होते हैं, जो उनमें अधिकारपूर्वक रहते हैं । निजी घरों का उपयोग धर्मशाला की तरह नहीं हो सकता और न हर कोई मनुष्य किसी के घर में प्रवेश कर सकता है ।

तंत्र भी अधिकार-सम्पन्न मनोभूमि वाले विशेष व्यक्तियों का घर है, उसमें हर व्यक्ति का प्रवेश नहीं है । इसलिए उसे नियत सीमा तक रखने के लिए गुप्त रखा है ।

हम देखते हैं तंत्र-गंथों मे जो साधना-विधियाँ लिखी गई है वे बड़ी अधूरी हैं । उनमें दो ही बाते मिलती हैं-एक साधन का फल, दूसरे साधन-विधि का कोई छोटा-सा अंग । परन्तु इस शैली से वर्णन करने में तंत्रकारों का मन्तव्य यह है कि साधना-विधि का संकेत कायम रहे, जिससे इस विद्या का लोप न हो, वह विस्तृत न हो जाय, यह सूत्र-प्रणाली है ।

व्याकरण आदि के सूत्र बहुत छोटे-छोटे होते हैं, उनमें अक्षर दस-दस या पाँच-पाँच ही होते हैं, पर अर्थ के एक लघु संकेतमात्र होते हैं, जिससे याद कम करना पड़े और समय पड़ने पर पूरी बात याद हो आवे ।

संकेत रूप में कहा इसलिए गया है कि कालान्तर में उस तथ्य का विस्मरण न हो जाय, आधार मालूम रहने से आगे की बात का स्मरण हो आना सुगम है । तंत्र-ग्रंथों में साधना-विधियों को गुप्त रखने पर बार-बार जोर दिया गया है, साथ ही कहीं-कहीं ऐसी विधियाँ भी बताई गई हैं जो देखने बड़ी सुगम मालूम पड़ती हैं, पर उनका फल बड़ा भारी कहा गया है ।

इस दिशा के अनजान लोगों के लिए यह गोरखधंधा बड़ा उलझन-भरा है । वे कभी उसे अत्यन्त सरल समझते हैं और कभी उसे असत्य मानते हैं । पर वस्तुस्थिति दूसरी ही है । संकेत-सूत्रों की विधि से उन साधनाओं का थोड़ा-सा वर्णन करके तंत्रकारों ने अपनी रहस्यवादी मनोवृत्ति का परिचय दिया है ।

तंत्र का विषय गोपनीय है, इसलिए तंत्र-ग्रंथों में ऐसी अनेक साधनाएँ प्राप्त होती हैं, जिनमें धन, संतान, स्त्री, यश, आरोग्य, पद-प्राति, रोग-निवारण, शत्रु-नाश, पाप-नाश, वशीकरण आदि लाभों का वर्णन है और संकेत-रूप से उन साधनाओं का एक अंश बताया गया है । परन्तु यह भली प्रकार स्मरण रखना चाहिए कि इन संक्षिप्त संकेतों के पीछे एक भारी कर्मकाण्ड एवं विधि-विधान है । वह पुस्तकों में नहीं, वरन् अनुभवी, साधना-सम्पन्न् व्यक्तियों से प्राप्त होता है ।

अपनी साधना को गुप्त रखने का एक आध्यात्मिक कारण भी है । साधना की प्रसिद्धी जब दूसरों में फैलती है, तो साधक का यश फैलना स्वाभाविक है । इस सम्मान से साधक मे मनःक्षेत्र में अहंकार की प्रवृत्ति प्रविष्ट होती है, जो साधक के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध होती है । यदि साधक इस स्तर पर पहुँच चुका हो, कि वह अपने तप की पूँजी से दूसरों को भी लाभाविन्त कर सकें, तो उसकी आत्मिक गिरावट के सभी चिन्ह दृष्टिगोचर होने लगते हैं ।

कारण स्पष्ट है-उसकी प्रसिद्घ सुनकर जनजागरण उसके पास अपनी इच्छाओं और कामनाओं को पूरा करने के लिए पहुँचने लगते हैं । यदि किसी को किसी प्रकार लगा हुआ है, तब तो वह सिद्ध पुरुष घोषित कर दिए जाते हैं और जनता भेड़-चाल से उसे घेर लेती है । साधक को भी अपनी सफलता प्रसन्नता होती है । अब वे उलझन में फँस जाते हैं । यदि किसी को निराश लौटना पड़ा, हो उनके सम्मान को धक्का लगेगा । सबकी आशाओं की पूर्ति करने लगें तो अपनी आत्मिक सम्पत्ति हो जाएगी, जिसे पूरा करने के लिए काफी तपस्या करनी होगी ।

साधना-काल में दूसरों के अन्न पर शरीर का पालन-पोषण होने लगा तो साधना भ्रष्ट होने की सम्भावना रहेगी, क्योंकि जो अन्त ग्रहण कर रहे हैं, न जाने वह कैसा है? मानसिक निर्माण उस अन्न पर निर्भर करता है । इसीलिए कुलार्णव तंत्र में स्पष्ट है-

यस्यान्नेन तु पुष्टांगों पर होमं समाचारेत् ।
अन्नदातु फलस्यार्ध चार्धं कर्तुर्न संशयः॥ -कुलार्णव तंत्र
”दूसरे व्यक्ति के अन्न से अंग पुष्ट करके तप, हवन करने वाले साधक को उसका आधा फल ही मिल पाता है, उसका आधा तो अन्न देने वाले को मिलता है ।”

साधना को प्रकट करने में हानि ही हानि परिलक्षित होती है, क्योंकि उससे अहंकार का पोषक होता है । इसे आध्यात्मिक मार्जन का महान शत्रु माना जाता है । जब तक अहंकार मन में निवास करता है, तब तक साधना में प्रगति रुकी रहती है । निरंकारी साधक ही साधना में सफलता प्राप्त कर सकता है । अतः यह पुष्ट न होने पाए, इसके लिए तंत्र-शास्त्रों में कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं, उनमें प्रमुख है-
अपनी साधना का किसी पर प्रकट न करना ।

तंत्रों की आज्ञा है कि ”जब जनसाधारण को यह पता चल जाता है कि यह व्यक्ति तांत्रिक साधक है, तो उसी दिन उस साधक की मृत्यु मान लेनी चाहिए ।” इसलिए साधक की भलाई इसी में है कि वह अपनी साधना का ढोल न पीटे, वरन उसे छिपाकर रखे तभी वह अन्त तक उसके निर्विध्न संचालन में सफल हो पाएगा । प्रसिद्ध का लोभ उसक लिए सदैव फिसलने के अवसर उपस्थित करता रहेगा, यह निश्चित है ।

3…योनि मुद्रा
यौगिक दृष्टि से अपने अंदर कई प्रकार के रहस्य छिपाए रखनेवाली मुद्रा का वास्तविक नाम ‘योनि मुद्रा’ है| तत योग के अनुसार केवल हाथों की उंगलियों से महाशक्ति भगवती की प्रसन्नता के लिए योनि मुद्रा प्रदर्शित करने की आज्ञा है| प्रत्यक्ष रूप से इसका प्रभाव लंबी योग साधना के अंतर्गत तंत्र-मंत्र-यंत्र साधना से भी दृष्टिगोचर होता है| इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से साधक की प्राण-अपान वायु को मिला देनेवाली मूलबंध क्रिया को भी साथ करने से जो स्थिति बनती है, उसे ही योनि मुद्रा की संज्ञा दी है| यह बड़ी चमत्कारी मुद्रा है|

पद्मासन की स्थिति में बैठकर, दोनों हाथों की उंगलियों से योनि मुद्रा बनाकर और पूर्व मूलबंध की स्थिति में सम्यक् भाव से स्थित होकर प्राण-अपान को मिलाने की प्रबल भावना के साथ मूलाधार स्थान पर यौगिक संयम करने से कई प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं|

ऋषियों का मत है कि जिस योगी को उपरोक्त स्थिति में योनि मुद्रा का लगातार अभ्यास करते-करते सिद्धि प्राप्त हो गई है, उसका शरीर साधनावस्था में भूमि से आसन सहित ऊपर अधर में स्थित हो जाता है| संभवतः इसी कारण आदि शंकराचार्यजी ने अपने योग रत्नावली नामक विशेष ग्रंथ में मूलबंध का उल्लेख विशेष रूप से किया है|

मूलबंध योग की एक अद्भुत क्रिया है| इसको करने से योग की अनेक कठिनतम क्रियाएं स्वतः ही सिद्ध हो जाती हैं, जिनमें अश्‍विनी और बज्रौली मुद्राएं प्रमुख हैं| इन मुद्राओं के सिद्ध हो जाने से योगी में कई प्रकार की शक्तियों का उदय हो जाता है|

अश्‍विनी मुद्रा
इस मुद्रा से साधक में घोड़ों जैसी शक्ति आ जाती है, जिसे ‘हॉर्स पॉवर’ कहते हैं| इस मुद्रा में गुदा-द्वार का बार-बार संकोचन और प्रसार किया जाता है| इसी से मुद्रा की सिद्धि हो जाती है| इसके द्वारा कुण्डलिनी जागरण में सुगमता रहती है और अनेक रोग नष्ट होकर शारीरिक बल की वृद्धि होती है| अश्‍विनी मुद्रा सिद्ध होने से साधक की अकालमृत्यु कभी नहीं होती| गुदा और उदर से संबंधित रोगों का इसके द्वारा शमन होता है तथा दीर्घजीवन की उपलब्धि होती है| बिना मूलबंध के अश्‍विनी मुद्रा नहीं हो सकती|

बज्रौली मुद्रा
बज्रौली मुद्रा भी मूलबंध का अच्छा अभ्यास किए बिना किसी प्रकार संभव नहीं है| यह मुद्रा केवल योगी के लिए ही नहीं, भोगी के लिए भी अत्यंत लाभकारी है| इस मुद्रा में पहले दोनों पांवों को भूमि पर दृढ़तापूर्वक टिकाकर, दोनों पांवों को धीरे-धीरे दृढ़तापूर्वक ऊपर आकाश में उठा दें| इससे बिंदु-सिद्धि होती है|

शुक्र को धीरे-धीरे ऊपर की आकुंचन करें अर्थात् इंद्रिय के आंकुचन के द्वारा वीर्य को ऊपर की ओर खींचने का अभ्यास करें तो यह मुद्रा सिद्ध होती है| विद्वानों का मत है कि इस मुद्रा के अभ्यास में स्त्री का होना आवश्यक है, क्योंकि भग में पतित होता हुआ शुक्र ऊपर की ओर खींच लें तो रज और वीर्य दोनों ही चढ़ जाते हैं| यह क्रिया अभ्यास से ही सिद्ध होती है| कुछ योगाचार्य इस प्रकार का अभ्यास शुक्र के स्थान पर दुग्ध से करना बताते हैं| जब दुग्ध खींचने का अभ्यास सिद्ध हो जाए, तब शुक्र को खींचने का अभ्यास करना चाहिए| वीर्य को ऊपर खींचनेवाला योगी ही ऊर्ध्वरेता कहलाता है|

इस मुद्रा से शरीर हृष्ट-पुष्ट, तेजस्वी, सुंदर, सुडौल और जरा-मृत्यु रहित होता है| शरीर के सभी अवयव दृढ़ होकर मन में निश्‍चलता की प्राप्ति होती है| इसका अभ्यास अधिक कठिन नहीं है| यदि गृहस्थ भी इसके करें, तो बलवर्द्धन और सौंदर्यवर्द्धन का पूरा लाभ प्राप्त कर सकते हैं|

4…..किसी वृक्ष के तांत्रिक प्रयोग हेतु। उसकी जड़,छाल,टहनी कलम,पत्ते,बांदा,कील आदि को न्योत के लाने हेतु तांत्रिक विधी।
सामग्री-दीपक,अगरबत्ती,सुपारी,पान,एक लोटा जल,मोली,पीले चावल,एक सिक्का,राई सरसो,उडद या ज्वार के दाने भोग हेतु मीठा या गुड।
विधी जब भी आप को किसी तांत्रिक औषधी की आवश्यक्ता हो।तब नियत समय से एक दिन पूर्व ही। ये सामग्री ले कर उस वृक्ष के पास जाँऐँ।
वृक्ष को नमस्कार करेँ
मंत्र-
ओम् नमस्तेअमृत सम्पभूते बल वीर्य विवर्ध्दिनी,
बलमायुश्च मे देहि पाप्नमे दूरत:॥
थोडी सी राई सरसो ज्वार या उडद के दाने लेकर ये मंत्र पढतेँ हुए। वृक्ष के चारो ओर डाल देँ।
ओम् वेतालाश्य पिशाचाश्य राक्षसाश्य सरीसृपां,
अपसर्पन्तु ते सर्वे वृक्षादिस्माच्छिवाज्ञर्या॥
भावार्थ-समस्त वेताल भूत प्रेत पिशाच राक्षस सरीसृप जो इस वृक्ष मे निवासरत हो वे वृक्ष से दूर चलेँ जावेँ ये शिव की आज्ञा है।
अब वृक्ष के समीप बैठ कर सर्वप्रथम दीपक जलावेँ अब सिंदुर कुंकुं आदि वृक्ष पर लगा दे,धूप दिखाऐँ। वृक्ष पर जहाँ संभव हो। मौली बांध देँ। अब हांथ मे पीले चावल ले कर प्रार्थना करेँ
‘हे वृक्षराज मैँ अमुक आप को निमंत्रित करने आया हूँ। मुझे अमुक कार्यवश आपकी अमुक (जड छाल कलम बाँदां आदि की आवश्यक्ता है।) अतः मै कल ब्रम्ह महूर्त मे आपको लेने आउंगा।आप मेरे कार्य मे सिद्धी प्रदान करेँ।
एसा कह कर चावल वृक्ष के मूल मे छोड देँ पान मे सुपारी सिक्का व गुड रख कर। अर्पित करेँ। लोटे के जल को वृक्ष पर चढा देँ।
. अगले दिन ब्रम्ह महूर्त मे जाकर व्रक्ष को प्रणाम करेँ
ओम् नमस्तेअमृत सम्पभूते बल वीर्य विवर्ध्दिनी,
बल मायुश्च मे देहि पाप्नमे त्राहि दूरत:॥
भावार्थ-हे अमृत से उत्पन्न हुए बल वीर्य को बढाने वाले वृक्ष राज मै आप को नमस्कार करता हूँ। आप मुझे बल देँ आयु देँ तथा पापोँ को मुझसे अलग करे।
अब खुरपी आदि द्वारा खोदना प्रारंभ करने से पूर्व कहेँ
येन त्वां खनेत ब्रह्मा,येन त्वां खनेत भृगुः।
येन हीन्दोऽय वरुणो,येन त्वामपचक्रमेँ।
तेनाहं खनिष्यामि, मंत्रपूतेन पाणिना।
मा पातेमानि पतित, जोन्यथा माते भवेत।
अत्रेव तिष्ठ कल्याणि मम कार्यकारी भव।
मम कार्ये सिद्धे ततङ स्वर्ग गमिष्यसि।
भावार्थ- हे वृक्षराज! जिस कारण तुम्हे ब्रह्मा ने खनित किया। जिस कारण तुम्हे भृगु ने खनित किया। जिस कारण वरुण और इन्द्रादि देवताओ ने खनित किया। उसी कारण मैँ आप को खनित कर रहा हूँ।
कहीँ आप का तेज व्यर्थ न हो जाए हे कल्याणकारी वनस्पति आप यहीँ रह कर मेरे काम पूर्ण करेँ। मेरी मनोकामना पूर्ति के पश्च्यात् आपका स्वर्ग गमन होगा।
जब सामग्री प्राप्त हो जाए तो तब
“ॐ ह्रीँ चण्डे हूँ फट् स्वाहा” जप कर उठावेँ।
बाँदा ग्रहण कर रहेँ हैँ तो मंत्र वही रहेगा। केवल बांदा उखाडते हुए।
ॐ वनदण्डे महादण्डाय स्वाहा,
ॐ शूद्री कपालमालिनी स्वाहा जपे।
घर आते हुए
ॐ नमो भैरवाय महासिद्धप्रदाय आपुद्धारणाय हूँ फट् का जप करते हुऐ घर आ जाऐँ।

5….शिव – शिवाऔरतंत्र
अपार करुणा मूर्ति जगज्जननीभगवती शिवा और शिवही समस्त सृष्टि के स्रष्टा हैं। इनकी कृपा से ब्रह्मादिदेव आविर्भूतहोकर आदेशानुसार सृष्टि, स्थिति और संह्यति में प्रवृत्त होतेहैं। अखिलब्रह्मांडनायिका भगवती एवं अखिल ब्रह्मांडनायक भगवान् एक रुप होते हुए भी लोकानुग्रह के लिए द्विधारुप ग्रहण करते हैं और दिव्यदम्पत्ति के रुप में शब्दर्थमयी सृष्टि को भी विकसित करते हैं।ये ही ब्रह्मस्वरुप हैं।
इन्हीं के संवाद रुप में “उड्डिशतंत्र” सामने आया।
वस्तुतः ब्रह्मा , विष्णु तथा शिव में कोई भेद नहीं हैं।
लोक – कल्याण की उदार भावना से परस्पर संवाद रुप में ,प्रश्नोत्तर रुप में कर्तव्य कर्मों काचिंत न प्रस्तुत करते रहे हैं।यह आवश्यक भी है , क्यों कि माता – पिता ही यदि बालकों की शिक्षा –व्यवस्था न करें तो और कौन करे ?
जब स्वयं ब्रह्मादिदेव भी प्रादुर्भूत होने के पश्चात् अबोध की भांति कोऽहं , कुतःआयातः , कोमेजननी ,कोमेतातः ?
इत्यादि नहीं जान पाए तो उन्हें भी इन्हीं ने कृपा पूर्वकज्ञान दिया था।

कैलासवासीश्रीशिवकैलासेशिखरेरम्येनानारत्नोपशोभिते।
नानाद्रुमलताकोर्णेनानापक्षिरवैर्युतः॥

भावार्थ:- कैलाश पर्वत पे निवास करने वाले भगवान शिव के निवास स्थान ! एक ऎसा रमणिय स्थान जो विविध प्रकार के रत्नों से सुशोभीत होता रहता है! इस स्थान की विविध प्रकार के वृक्षों एवं लताये शोभा बडाती रहती है! जो विविध प्रकार के पक्षियों के स्वरों से हमेशा गुंजारित होता रहता है!

सर्वर्तुःकुसुमामोदंमोदितेसुमनोहरं।
शैत्य – सौगन्ध्य – मन्दाढ्यैर्मरुदभिरुपवीजिते॥

भावार्थ:- इस स्थान पर समस्त ऋतुएं सुन्दर पुष्पों एवं फलों सें युक्त हैं तथा इस स्थल पर शीतल – सुगान्धित एवं मन को भाने वाली वायु मन्द – मन्द गति से प्रवाहित होती रहीहै ।

अप्सरोगणसंगीतकलध्वनिनिनादिते।
स्थिरच्छायद्रुमच्छायाच्छादितेस्निग्धमंजुले॥

भावार्थ:- इस स्थान के वृ्क्षों की शितल छाँव के निचें अपसरागण संगीत की सुन्दर ,समधुर स्वर लहरियों के साथ मगन होकर गायन एवं नर्तन करते रहते है!

मत्तकोकिलसंदोहसंघुष्टविपिनान्तरे।
सर्वदास्वर्गणःसार्धऋतुराजनिषेविते॥

भावार्थ:- इस स्थान पर कोयल मद मस्त होकर कुई कुई शब्द का उच्चारण करती रहती है इस स्थान पर जहां ऋतुराज बसन्त सदैव अपने गणों के साथ जिनकी सेवा में तत्पर रहता है।

सिद्धचारणगन्धर्वैगाणपत्यगणैर्वृते।
तत्रमौनधरंदेवंचराचरजगदगुरुम्॥

भावार्थ:- इस स्थान पर सिद्धचारण गन्धर्व एवं गणपति अपने गणों व षडानन के साथ निवास करते है।ऐसे सुन्दर एवं दिव्य कैलाश के
शिखर पर जगत के गुरु श्री शिवजी मौन धारण कर एकांतवास करते रहते है !

सदाशिवंसदानन्दंकरुणाऽमृतसागरम्।
कर्पूरकुन्दधवलंशुद्धंसत्वगुणमयंविभुम्॥

भावार्थ:- सदाशिव ,सदा आनंद मे रहने वाले,करुणा के अमृ्त के सागर वे स्दा कल्याण करने वाले हैं कर्पुर एवं कुन्द पुष्प की भांति श्वेत काया वाले भगवान शिव सत्व गुणो से युक्त है !

दीगम्बरंदीनानाथंयोगीन्द्रंयोगिवल्लभम्।
गंगाशीकरसंसिक्तंजटामण्डलमण्डितम्॥

भावार्थ:- जो दिगंबर है जिनकी दसों दिशाये ही वस्त्र है,जो दिनो और दुखियो के नाथ है जो योगियों मे ईन्द्र के समान है!जो योगीयो के सदा प्रिय है !जिनका जटामंडल सदा गंगा जी के पवित्र जल से सदा भिगा रहता है!!

विभूतिभूषितंशान्तंव्यालमालंकपालिनम्।
त्रिलोचनंत्रिलोकेशंत्रिशूलवरधारिणम्॥

भावार्थ:- जो सदा विभुति को आभुषण के समान धारण करते है जो शांत प्रवृ्त्ति के है जिनहोने मुण्डों एवं सर्पो की माला धारण की है जिनकी तिन आँखे है जो तिनो लोको के स्वामी है जो एक हाथ मे त्रिशुल एव दुसरे हाथ मे वर मुद्रा धारण किये हुये है !!

आशुतोषंज्ञानमयंकैवल्यफलदायकम्।
निरातंकंनिर्विकल्पंनिर्विशेषंनिरंजनम्॥

भावार्थ:- जो शिघ्र अतिशिघ्र प्रसन्न होने वाले है जो ग्यान मय है जिनका कभी अंत नही होता,जिनका कोई विकल्प नही है जिनका कोई अंत नही है जो निरंजन है!!

सर्वेषांहितकारंदेवदेवंनिरामयम्।
अर्द्धचन्द्रोज्ज्वलदभालंपञ्चवक्त्रंसुभूषितम्॥

भावार्थ:- जो सभी प्राणियों का हित करने वाले है जो देवताओं के भी देव महादेव है जिनके माथे पे अर्धचंद्र सुशोभित होता है जो पन्चमुख है एवं आभुषणो से सुशोभीत है !
प्रसन्नवदनंवीक्ष्यलोकानांहितकाम्यया।
विनयेनसमायुक्तोरावणःशिवमब्रवतीत्॥
ऎसे सदा प्रसन्न रहने वाले स्दा शिव के प्रसन्न मुख को देख कर लोक हित की अभिलाषा से विनम्र होकर लंकाधिपति रावण महाराज भगवान शिव से पुछते है ??

2…रावण – शिव संवाद

रावण – शिवसंवाद
नमस्तेदेवदेवेशसदाशिवजगदगुरो।
तन्त्रविद्यांक्षणंसिद्धिंकथयस्वममप्रभो॥
नमस्ते देवोके देव महादेव जगत गुरु !

भावार्थ:- हेसदाशिव।क्षण भर में सिद्धि प्रदान करने वाली तन्त्र विद्या का कथन मुझसे बताईये।

साधुपृष्टंत्वावत्सलोकानांहितकाम्यया।
उड्डीशाख्यामिदंतन्त्रकथयामितवाग्रतः॥

भावार्थ:- महादेवजीनेकहा – हेपुत्र ! तुमने लोगों के हित की इच्छा के विचार से जो प्रशन पूछा है ।अतः मैंतुमसे ‘ उड्डीश ‘ नामक इस तंत्र को कहता हूं।

पुस्तकेलिखिताविद्यानैवसिद्धिप्रदानृणाम।
गुरुंविनाहिशास्त्रेऽस्मिन्नाधिकारःकथञ्चन॥

भावार्थ:- पुस्तकों में लिखी विद्या कभी सिद्धी प्रदान करने वाली नहीं होती। गुरु के बिना तन्त्र शास्त्र पर किसी का अधिकार नहीं होता।ऎसा शास्त्रों मे लिखा है!
आगे रावण से श्री शिव कहते हैं –

अथाभिध्यास्येशास्त्रेऽस्मिन्सम्यक्षटकर्मलक्षणम्।
तन्मन्त्रानुसारेणप्रयोगफलसिद्धिदेम्॥

भावार्थ:- अब मैं इस शास्त्र में सम्यक्त तथा उन षट कर्मों के लक्षणों को तुमसे कहताहूं ,जिनके तन्त्रानुसार एवं मन्त्रानुसार विधिवत्प्रयोग करने पर सिद्धि की प्राप्ति होती है।

!!षट्कर्म!!

शान्तिवश्यस्तम्भनानिविद्वेषोच्चाटनंतथा।
मारणंतानिशंसन्तिषट्कर्मणिमनीषिणः॥

भावार्थ:- शान्ति , वशीकरण , स्तम्भन , विद्वेषण , उच्चाटन , मारण – इन को ही प्राचीन महर्षियों ने षटकर्म कहा है।

!!षटकर्मकेलक्षण!!

रोगकृत्यागृहादीनांनिराशःशान्तिरीरीता।
वश्यंजनानांसर्वेषांविधेयत्वमुदीरितम्॥
भावार्थ:- जिस प्रयोग के द्वारा रोगों की शान्ति तथा ग्रहों( मन की वृ्त्तियाँ) की शान्ति की जाए और निराशा इत्यादि का नाश किया जाए , उस प्रयोग को ‘ शान्तिकर्म ‘ कहतेहै।सभी मनुष्यों( मन की वृ्त्तियाँ) को अपने मनोनुकूल कर लेना ‘ वशीकरण ‘ कहलाता है।

प्रवृत्तिरोधःसर्वेषांस्तम्भनंसमुदाह्नतम्।
स्निग्धानांद्वेषभावंमिथोविद्वेषणंमतम्॥

भावार्थ:- सभी की प्रवृत्ति को रोकना एवं शत्रु( मन की वृ्त्तियाँ) की गति – मति को रोक देना , अपने अधिकार में करना ‘ स्तम्भनकर्म ‘ कहलाताहै। सभी वृ्त्तियों ( मन की वृ्त्तियाँ) से पुरुषो का द्वेष करवा देना ‘ विद्वेषणकर्म ‘ कहलाता है।

उच्चाटनंस्वदेशादेर्भ्रंशनंपरिकीर्तितम्।
प्राणिनांप्राणहरणंमारणंसमुदाहतम्॥

भावार्थ:- जिस कर्म के द्वारा किसी प्राणी ( मन की वृ्त्तियाँ) को उसके निवास स्थान से अलगकर दिया जाए , उसका नाम ‘ उच्चाटन ‘है और किसी भी प्राणी( मन की वृ्त्तियाँ) को अपने तन्त्रो बल प्रयोग द्वारा मार दिया जाए , उसके प्राणो मका हरण कर लिया जाए तो वह प्रयोग ‘ मारण ‘ कहलाताहै।

3…अध्यायों का वर्णन

अध्यायोंकावर्णन
हेराक्षसराज ! भगवानशिवनेकहा –

ग्रन्थेऽस्मिन्कर्षणंचादौद्वितीयोन्मादनंतथा।
विद्वेषणंतृतीयेचचतुर्थोच्चाटनंतथा॥

भावार्थ:- इस उड्डीश तन्त्र में प्रथम में आकर्षण , द्वितीय में उन्माद , तृतीय में विद्वेषण एवं चतुर्थ में उच्चाटन प्रस्तुत करुंगा।

ग्रामकस्योच्चाटनं पंचजलस्तम्भश्चषष्ठकम्।
स्तम्भनंसप्तकंचैववाजीकरणमष्टमम्॥

भावार्थ:- पंचम में गांव( मन की वृ्त्तियाँ) का उच्चाटन , षष्ठ में स्तम्भन , सप्तम में सर्वस्तम्भन , अष्टम में वाजी करण है।

अन्यानपिप्रयोगांश्चबहून्श्रृण्वसुराधिप।
अन्धीभावोमूकभावोगात्रसंकोचनंतथा॥
भावार्थ:- इसप्रकारऔरभीविविधप्रयोगहैं , जैसे — अन्धा , बहरा , गूंगाआदिकरना , अंगों का संकोचन करने की कला का कथन भी मैं तुम से करता हूं।

!!प्रयोगात्मकविवरण!!

बधिरोमूकरणेभूतज्वरकरंतथा।
मेघानांस्तम्भनंचैवदध्यादिकविनाशम्॥

भावार्थ:- इस ग्रन्थ में बहरा करना , मूर्ख बनादेना , भूत आदि लगाना , ज्वरचढ़ादेना , बुद्धि का स्तम्भन ( निरोध ) करना एवं दही को नष्ट कर देनाहै।

मत्तोन्मत्तकरंचैवगजवाजिकोपनम्।
आकर्षणंभुजंगानांमानवानांतथैवच॥

भावार्थ:- पागल बनाना , हाथी – घोड़ों को अत्याधिक कुपित कर देना , सर्प तथा मनुष्यों का आकर्षण कर देना।

सस्यादिनाशनंचैवपरग्रामप्रवेशनम्।
बेतालादिकसिद्धञ्जपादुकाञ्जनसिद्धयः॥

भावार्थ:- दूसरे गांव में प्रवेश करना , भूत , बैताल की सिद्धि करना , पादुका सिद्धि और अंजना सिद्धि का इस में विशेष वर्णन है।

कौतुकंचेन्द्रजालंचयक्षिणी – मन्त्र – साधनम्।
गुटिकाखेचरत्वंचमृतसंजीवनादिकम्॥
अन्यान्बइंस्तथारोद्रान्विद्यामन्त्रांस्थतापरम्।
औषधंचतथागुप्तंकार्यवक्ष्यामियत्नतः॥
उड्डीशयोनजानातिसरुष्टःकिंकरिष्यति।
मेरुंचालयतेस्थानात्सागरेप्लावयेन्महीम्॥

भावार्थ:- इन्द्रजाल के कौतुक , यक्षिणी मन्त्र का साधन , आसमान में उड़ने की गुटिका ,मृत संजीवनी विद्या आदि के अतिरिक्त अन्यघातक विद्याओं का प्रयोगमन्त्र , औषधि , गुप्त कार्यों का यत्नपूर्वक वर्णम मैं तुमसे कहताहूं।जोउड्डीश तन्त्र को नहीं जानता है , वह किसी से क्रोधित होकर भला क्या कर सकता है ? यह तन्त्र सुमेरुपर्वत को चलायमान करनेवाला ,पृथ्वी को समुद्र में डुबो देने वाला है।

अकुलीनोऽधमोऽबुद्धिर्भक्तिहीनःक्षुधान्वितः।
मोहितःशंकितश्चापिनिन्दकश्चविशेषतः॥
जो व्यक्ति सत्कुल में न हो , जिसकी बुद्धिभ्रष्ट हो ,भक्तिरहिततथाक्षुधायुक्तहो।
मोहित , संदेहशीलयानिन्दितहो।अभक्तायनदातव्यंतन्त्रशास्त्रमनुत्तमम्।
तथैतेसहसंयोगेकार्यनोड्डीशकीध्रुवम्॥

भावार्थ:- जो व्यक्ति तन्त्र में श्रद्धा न रखते हों ,ऐसे व्यक्तियों को इस उत्तम तन्त्र शास्त्र को नहीं देना चाहिए और नही इन सब के साथ उड्डीश तन्त्रमर्मज्ञ को संबंध बनाए रखना चाहिए।

यदिरक्षेत्सिद्धिमेतामात्मानंतुतथैवच।
देवतागुरुभक्तायवातव्यंसज्जनायच॥

भावार्थ:- यदि इस तंत्र विद्या की सिद्धि प्राप्त करना एवं अपनी आत्मा को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो इस तंत्र को सदैव किसी गुरुभक्त या देवस्वरुप ( मनुष्य )कोहीप्रदानकरें।

तपस्वीबालवृद्धानांतथाचैवोपकारिणाम्।
निश्चितंसुमतिंप्राप्ययथोक्तंभाषितानिच॥

भावार्थ:- कोई तपस्वी बाल कहो , कोई वृद्ध पुरुष या परोपकार करने वाला हो , तंत्र में जो श्रद्धा और विश्वास रखता हो तथा जो सत्यव्रत धारी हो ,उसी को यह तंत्रविद्यादेनी चाहिए।

नतिथिर्नचनक्षत्रंनियमोनास्तिवासरः।
नव्रतंनियमोहोमःकालवेलाविवर्जितम्॥

भावार्थ:- इस तंत्र में कथन किए गए प्रयोग को करने में न किसी विधिका नियम हैं , न नक्षत्र का और नही किसी व्रतयाह वन का ; नही समय आदिका नियम हैं।

केवलंतंत्रमात्रेणह्योषधिसिद्धिरुपिणी।
यस्यसाधनमात्रेणक्षणात्सिद्धिश्चजायते॥

भावार्थ:- केवल तंत्र मात्र से इसमें सब औषधियां सिद्धि स्वरुपहैं। इनके साधन करने से क्षणभर में ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है।

शशिहीनायथारात्रोरविहीनंयथादिनम्।
नृपहीनंयथाराज्यंगुरुहीनंचमंत्रकन्॥

भावार्थ:- चंद्रमा के बिना जिस प्रकार रात्रि , सूर्य के बिना दिन और राजा के बिना राज्य संभव नहीं हैं , उसी प्रकार गुरु के बिना सिद्धि संभव नहीं होती।

इन्द्रस्यचयथावज्रपाशश्चवरुणस्यच।
यमस्यचयथादण्डोवह्नेशक्तिर्यथादहेत्॥

भावार्थ:- जिस प्रकार इन्द्र का वज्र , वरुण का पाश , यमराज का दण्डऔरअग्नि की शक्ति जला देती है।
तथैतेमहायोगाःप्रयोज्यःक्षेमकर्मणि।
सूर्यम्प्रपातद्भूमौनेदंमिथ्याभविष्यति॥

इन महाप्रयोगों का ऐसे ही अच्छे कर्मों में प्रयोग करना चाहिए ।इनके प्रभाव से सूर्य को भी भूमि पर लाया जा सकता है।यह बात मिथ्या नहीं हैं।

6….श्री कार्तवीर्यार्जुन मन्त्र-प्रयोग
आज के धन-प्रधान युग में यदि किसी का परिश्रम से कमाया हुआ धन किसी जगह फँस जाए तथा उसकी पुनः प्राप्ति की सम्भावना भी दिखाई न पड़े, तो श्रीकार्तवीर्यार्जुन का प्रयोग अचूक तथा सद्यः फल-दायी होता है ।
श्रीकार्तवीर्यार्जुन का प्रयोग ‘तन्त्र’-शास्त्र की दृष्टि से बड़े गुप्त बताए जाते हैं । इस प्रयोग से साधक गत-नष्ट धन को तो प्राप्त कर ही सकता है, साथ ही षट्-कर्म-साधन यहाँ तक कि प्रत्येक अभिलषित-प्राप्ति में भी सफल हो सकता है ।
पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार भगवान् विष्णु के अमित तेजस्वी ‘सुदर्शन चक्र’ के अवतार – हैहय-वंशी राजा कार्तवीर्यार्जुन को हजार भुजाएँ होने के कारण ‘सहस्रार्जुन’ भी कहा जाता था ।

प्रयोग हेतु आवश्यक निर्देश
१॰ प्रयोग की सफलता एवं निर्विघ्नता हेतु सर्व-प्रथम भू-शुद्धि, आसन-शुद्धि, भूत-शुद्धि, भूतोपसंहार, स्व-प्राण-प्रतिष्ठा आदि आवश्यक कर्म कर ‘श्रीविघ्न-विनाशक’ गणेश का पूजन एवं ‘कलश-स्थापन’ करें । स्वयं न कर सकें, तो विद्वान ब्राह्मण का सहयोग प्राप्त करें ।
२॰ फिर वैष्णव अष्ट-गन्ध (चन्दन, अगर, कर्पूर, चोर, कुंकुम, रोचना, जटामांसी तथा मुर) से कार्तवीर्य-यन्त्र की रचना करें ।
३॰ यन्त्र में प्राण-प्रतिष्ठा कर आवरण पूजा करें ।
४॰ कामना-भेद के अनुसार निश्चित संख्या में जप करें । जप पूरा होने पर दशांश ‘हवन‘, तद्दशांश ‘तर्पण, मार्जन व ब्राह्मण-भोज करावें ।
५॰ प्रयोग की सफलता के लिए दस सहस्र ‘गायत्री-जप’ परमावश्यक है ।
६॰ जप की पूर्ण-संख्या को इस प्रकार बाँटें कि वह सम-संख्या के आधार पर प्रतिदिन किया जा सके । किसी दिन कम और किसी दिन अधिक ‘जप’ नहीं किया जाना चाहिए ।
७॰ प्रतिदिन जितनी देर जप चले, उतने समय तक अखण्ड-दीपक अवश्य ही प्रज्जवलित रहना आवश्यक है ।
८॰ जब तक प्रयोग चले, तब तक शास्त्रोक्त नियमों का पालन करें ।
९॰ प्रयोग करने से पूर्व मन्त्र को पुरश्चरण द्वारा सिद्ध कर लेना चाहिए ।

साधना-क्रम
१॰ शुद्ध होकर, संकल्प करें – देश-कालौ सङ्कीर्त्य अमुक-कामना सिद्धयर्थं मम श्रीकार्तवीर्यार्जुन-देवता-प्रीति-पुरस्सरं क्षिप्रममुक-जनस्य बुद्धि-हरण-पूर्वकं स्व-धन-प्राप्तये मनोऽभिलषित-कार्य-सिद्धये वा दीप-दान-पूर्वकं अमुकामुक-संख्यात्मकं जप-रुप-प्रयोगमहं करिष्यामि । – इस प्रकार सङ्कल्प करने के बाद श्रीगणेशादि-पूजन करें ।
२॰ गोबर से लेपन कर शुद्ध स्थान (पक्का फर्श हो, तो धोकर पञ्च-गव्य से प्रोक्षण करें) पर ताँबे का बर्तन रखें तथा उसमें लाल चन्दन अथवा रोली से षट्-कोण बनाकर, उसके बीच में “ॐ फ्रों” लिखें । फिर उसमें एक ताँबे का दीप-पात्र (सरसों के तेल, मौली या लाल रंग से रँगी रुई की बत्ती सहित) निम्न मन्त्र पढ़ते हुए स्थापित करें –
शुद्ध तैल-दीपमयं, स्थापयामि जगत्पते !
कार्तवीर्य, महा-वीर्य ! कार्यं सिद्धयतु मे हि तत् ।।
३॰ दीप-पात्र के दाहिने भाग में (अर्थात् साधक के बाँई ओर) एक नई छुरी – निम्न मन्त्र पढ़कर स्थापित करें । छुरी की धार ‘दक्षिण’- दिशा की ओर रहे और उसकी नोक (अग्र-भाग) साधक की ओर रहे – “ॐ नमः सुदर्शनास्त्राय फट् ।”
४॰ ‘दीपक’ का मुख पश्चिम की ओर या साधक की ओर रखें । निम्न मन्त्र से उसे प्रज्जवलित करें –
“ॐ कार्तवीर्य नृपाधीश ! योग-ज्वलित-विग्रह !
भव सन्निहितो देव ! ज्वाला-रुपेण दीपके ।।”
५॰ मन्त्रोच्चार-पूर्वक ‘दीपक’ की ज्योति में प्राण-प्रतिष्ठा करें । यथा – पहले प्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्र का विनियोग पढ़ें –
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीप्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्रस्य अजेश-पद्मजाः ऋषयः, ऋग्-यजुः-सामानि छन्दांसि, प्राण-शक्तिर्देवता, आं बीजं, ह्रीं शक्तिः, क्रों कीलकं, श्रीकार्तवीर्यार्जुन-देव-दीपे प्राण-प्रतिष्ठापने विनियोगः ।
‘श्रीकार्तवीर्यार्जुन-दीप-देवतायै नमः’ से लाल चन्दन एवं पुष्पादि से दीपक की पूजा करें । पूजा करने के बाद निम्न मन्त्र पढ़कर ‘दीप-समर्पण’ करें –
कार्तवीर्य महावीर्य ! भक्तानामभयं-कर !
दीपं गृहाण मद्-दत्तं, कल्याणं कुरु सर्वदा ।।
अनेन दीप-दानेन, ममाभीष्टं प्रयच्छ च ।
फिर ‘दीपक’ की सन्निधि में निम्न-लिखित मन्त्र ‘प्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्र’ का जप करें –
मन्त्रः- “ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हं ॐ क्षं सं हंसः ह्रीं ॐ हंसः ।”

फिर श्रीकार्तवीर्यार्जुन-मन्त्र का विनियोगादि कर जप करें –
श्रीकार्तवीर्यार्जुन-मन्त्र का विनियोगः- ॐ अस्य श्रीकार्तवीर्यार्जुन (स्तोत्रस्य) मन्त्रस्य दत्तात्रेय ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्रीकार्तवीर्यार्जुनो देवता, फ्रों बीजं, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं ममाभीष्ट-सिद्धये जपे विनियोगः ।
ऋष्यादि-न्यासः- दत्तात्रेय ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे, श्रीकार्तवीर्यार्जुनो देवतायै नमः हृदि, फ्रों बीजाय नमः गुह्ये, ह्रीं शक्तये नमः पादयो, क्लीं कीलकाय नमः नाभौ ममाभीष्ट-सिद्धये जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।
कर-न्यासः- ॐ आं फ्रों ब्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः, ॐ ईं क्लीं भ्रूं तर्जनीभ्यां नमः, ॐ हुं आं ह्रीं मध्यमाभ्यां नमः, ॐ क्रैं क्रौं श्रीं अनामिकाभ्यां नमः, ॐ हुं फट् कनिष्ठिकाभ्यां नमः, ॐ कार्तवीर्यार्जुनाय कर-तल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः ।
हृदयादि-न्यासः- ॐ आं फ्रों ब्रीं हृदयाय नमः, ॐ ईं क्लीं भ्रूं शिरसे स्वाहा, ॐ हुं आं ह्रीं शिखायै वषट्, ॐ क्रैं क्रौं श्रीं कवचाय हुम्, ॐ हुं फट् अस्त्राय फट्, ॐ कार्तवीर्यार्जुनाय नमः सर्वाङ्गे ।
टिप्पणी – नेत्रों का ‘न्यास’ नहीं होगा अर्थात् षडङ्ग के स्थान पर ‘पञ्चाङ्ग-न्यास’ का ही विधान है ।
मन्त्र-न्यासः- ॐ फ्रों ॐ हृदये । ॐ ब्रीं ॐ जठरे । ॐ क्लीं ॐ नाभौ । ॐ भ्रूं ॐ जठरे । ॐ आं ॐ गुह्ये । ॐ ह्रीं ॐ दक्ष-चरणे । ॐ क्रों ॐ वाम-चरणे । ॐ श्रीं ॐ ऊर्वोः । ॐ हुं ॐ जानुनो । ॐ फट् ॐ जङ्घयोः । ॐ कां मस्तके । ॐ तं ललाटे । ॐ वीं भ्रुवोः । ॐ यां कर्णयो । ॐ जुं नेत्रयोः । ॐ नां नासिकायां । ॐ यं मुखे । ॐ नं गले । ॐ मः स्कन्धयोः ।
व्यापक-न्यासः- मूल-मन्त्र से सर्वाङ्ग-न्यास करें ।
ध्यानः-
उद्यत्-सूर्य-सहस्र्कान्तिरखिल-क्षोणी-धवैर्वन्दितः ।
हस्तानां शत-पञ्चकेन च दधच्चापानिषूंस्तावता ।।
कण्ठे हाटक-मालया परिवृतश्चक्रावतारो हरेः ।
पायात् स्यन्दनगोऽरुणाभ-वसनाः श्रीकार्तवीर्यो नृपः ।।

मूल-मन्त्रः-
“ॐ फ्रों ब्रीं क्लीं भ्रुं आं ह्रीं क्रों श्रीं हुं फट् कार्तवीर्यार्जुनाय नमः ।”
जप-संख्या एवं हवनादि – एक लाख । तद्दशांश हवन, तर्पण, मार्जन या अभिषेक, ब्राह्मण-भोजन ।
हवन-सामग्री- चावल, खीर तथा तिल-मिश्रित घृत ।
कामना-भेद से हवन-सामग्री – सरसों-रीठा-लहसुन-कपास –मारण । धतूरा या गोरोचन-गोबर –स्तम्भन । नीम-पत्र –विद्वेषण । कमल या कमल-बीज –आकर्षण । हल्दी या चम्पा-चमेली –वशीकरण । बहेड़ा व खैर-समिधा –उच्चाटन । कस्तूरी-गोरोचन –घर से भागे व्यक्ति की वापसी । कमल-मक्खन-कस्तूरी –गत धन की प्राप्ति । यव (जौ) –लक्ष्मी-प्राप्ति । तिल-घी –पाप-नाश । तिल-चावल-साँवक-लाजा –राज-वशीकरण । अपामार्ग-आक-दूर्वा –पाप-नाश व लक्ष्मी-प्राप्ति । गुग्गुल –प्रेत-शान्ति । पीपल-गूलर-पाकड़-बड़-बेल-समिधा –क्रमशः सन्तान, आयु, धन, सुख, शान्ति । साँप की केँचुली-धतूरा-पीली सरसों-नमक –चोर-नाश । धान –भूमि-प्राप्ति ।
टिप्पणी – सामान्य रुप से किसी भी काम्य कर्म की सफलता के लिए, जितनी संख्या ‘जप’ की होगी, उसका दशांश ‘हवन’ होगा, परन्तु जब कार्य-समस्या जटिल हो या सद्यः फल-प्राप्ति की इच्छा हो, तो हवन-संख्या एक सहस्र से दस सहस्र तक ।
कामना-भेद से जप-संख्याः- बन्दी-मोक्ष- १२०००, वाद-विवाद (मुकदमे में) जय- १५०००, दबे या नष्ट-धन की पुनः प्राप्ति- १३०००, वाणी-स्तम्भन-मुख-मुद्रण- १००००, राज-वशीकरण- १००००, शत्रु-पराजय- १००००, नपुंसकता-नाश/पुनः पुरुषत्व-प्राप्ति- १७०००, भूत-प्रेत-बाधा-नाश- ३७०००, सर्व-सिद्धि- ५१०००, सम्पूर्ण साफल्य हेतु- १२५००० ।
प्रत्येक प्रयोग में “दीप-दान” परमावश्यक है ।
हवन के पश्चात् ‘तर्पण’ करना होता है । वैसे तो तर्पण हवन का दशांश होता है, किन्तु कार्य की आवश्यकतानुसार हवन के अनुसार ही तर्पण भी एक हजार से दस हजार तक किया जा सकता है । कामना-भेद से तर्पणीय जल में हवन-सम्बन्धी सामग्री को आंशिक रुप में मिश्रित कर सकते हैं ।
तर्पण-विधिः- ताम्र-पात्र में कार्तवीर्यार्जुन-यन्त्र या ‘फ्रों’ बीज लिखें । उसी पात्र में निम्न मन्त्र से तर्पण करें – “ॐ फ्रों ब्रीं क्लीं भ्रुं आं ह्रीं क्रों श्रीं हुं फट् कार्तवीर्यार्जुनाय नमः कार्तवीर्यार्जुनं तर्पयामि नमः ।”
अभिषेक-विधिः- ‘अभिषेक’ के सम्बन्ध में दो मत हैं – (१) देवता का मार्जन तथा (२) यजमान का मार्जन । दोनों के मन्त्र निम्न प्रकार हैं – (१) “ॐ फ्रों ब्रीं क्लीं भ्रुं आं ह्रीं क्रों श्रीं हुं फट् कार्तवीर्यार्जुनाय नमः कार्तवीर्यार्जुनं अभिषिञ्चामि ।” (२) “ॐ फ्रों ब्रीं क्लीं भ्रुं आं ह्रीं क्रों श्रीं हुं फट् कार्तवीर्यार्जुनाय नमः आत्मानं अमुकं वा अभिषिञ्चामि ।”
‘कार्तवीर्यार्जुन-मन्त्र-प्रयोग’ में यजमान के मार्जन/अभिषेक की एक विशिष्ट विधि निम्न प्रकार है – शुद्ध भूमि पर गोबर/पञ्च-गव्य का लेपन/प्रोक्षण करें । उस पर अष्ट-गन्ध या लाल चन्दन से कार्तवीर्यार्जुन-यन्त्र बनावें । उस यन्त्र पर विधि-पूर्वक कलश स्थापित करें । कलश में कार्तवीर्यार्जुन का आवाहन कर यथा-विधि पूजन करें । पूर्वोक्त विधि के अनुसार दीपक जलावें । बाँएँ हाथ से कुम्भ को स्पर्श करते हुए मूल-मन्त्र की दस माला जप करें । इस अभिमन्त्रित जल से स्वयं तथा स्व-जनों का अभिषेक करें ।
ऐसा करने से पुत्र, यश, आयु, स्व-जन-प्रेम, वाक-सिद्धि, गृहस्थ-सुख की प्राप्ति होती है तथा जटिल रोगों से मुक्ति मिलती है । मारण/कृत्यादि अभिचार-कर्म से प्रभावित तथा पीड़ित व्यक्ति को उस प्रभाव से मुक्ति मिलती है ।
श्रीकार्तवीर्यार्जुन-मन्त्र के जपानुष्ठान में आसन आदि लाल रंग के होते हैं । शङ्ख की माला सर्वोत्तम, रक्त-चन्दन की मध्यम तथा अन्य मालाएँ भी ठीक मानी गई है । अनुष्ठान की सफलता हेतु मूल-मन्त्र के आवश्यक जप के साथ दस गायत्री जप आवश्यक बतलाया गया है । कुछ विद्वानों का मत है कि जिस देवता के मन्त्र का जप किया जाए, उसी देवता की ‘गायत्री’ का ही जप होना चाहिए । अस्तु “श्रीकार्तवीर्यार्जुन-गायत्री” इस प्रकार है –
“ॐ कार्तवीर्याय विद्महे महा-वीर्याय धीमहि तन्नोऽर्जुनः प्रचोदयात् ।”

7….हवन के लिए अलग-अलग मन्त्र

ग्रहों की पीडा हेतु पूर्ण साधना के अन्तर्गत सभी ग्रहों को शान्त करने वाला मन्त्र और हवन का पूरा विधान दिया गया है। किसी भी ग्रह के कुपित होने पर भी इसी प्रकार हवन किया जाता है। परन्तु इसमें दो अन्तर होते हैं। ग्रह विशेष के लिए हवन करते समय उस ग्रह को प्रिय वृक्ष की लकडी का प्रयोग करते हैं। इसके साथ ही उस ग्रह से सम्बन्धित मन्त्र ही बोला जाता है। नीचे पहले इन ग्रहों से सम्बन्धित लकडियां और फिर उनके मन्त्र दिए जा रहे हैं-

सूर्य – मदार चंद्र – पलाश मंगल – खैर
बुध – अपमार्ग गुरू – पीपल शुक्र – गूलर
शनि – शर्मा राहु – दूर्वा केतु – कुशा

सूर्य – ओम ह्नौं ह्नीं ह्नौं स: सूर्याय स्वाहा।
चंद्र – ओम स्त्रौं स्त्रीं स्त्रौं स: सोमाय स्वाहा।
मंगल – ओम क्रौं क्रीं क्रौं स: भोमाय स्वाहा।
बुध – ओम ह्नौं ह्नीं स: बुधाय स्वाहा।
गुरू – ओम ज्ञौं ज्ञीं ज्ञौं स: बृहस्पतयै स्वाहा।
शुक्र – ओम ह्नौं ह्नीं ह्नौं स: शुक्राय स्वाहा।
शनि – ओम षौं षीं षौं स: शनैश्चयराय स्वाहा।
राहु – ओम छौं छीं छौं स: राहवे स्वाहा।
केतु – ओम फौं फीं फौं स: केतवे स्वाहा।

8….मंत्र जप की सरलतम विधि

सृष्टि से पहले जब कुछ भी नहीं था तब शून्य में वहां एक ध्वनि मात्र होती थी। वह ध्वनि अथवा नाद था ‘ओऽम’। किसी शब्द, नाम आदि का निरंतर गुंजन अर्थात मंत्र। उस मंत्र में शब्द था, एक स्वर था। वह शब्द एक स्वर पर आधारित था। किसी शब्द आदि का उच्चारण एक निश्चित लय में करने पर विशिष्ट ध्वनि कंपन ‘ईथर’ के द्वारा वातावरण में उत्पन्न होते हैं। यह कंपन धीरे धीरे शरीर की विभिन्न कोशिकाओं पर प्रभाव डालते हैं। विशिष्ट रुप से उच्चारण किए जाने वाले स्वर की योजनाबद्ध श्रंखला ही मंत्र होकर मुह से उच्चारित होने वाली ध्वनि कोई न कोई प्रभाव अवश्य उत्पन्न करती है। इसी आधार को मानकर ध्वनि का वर्गीकरण दो रुपों में किया गया है, जिन्हें हिन्दी वर्णमाला में स्वर और व्यंजन नाम से जाना जाता है।
मंत्र ध्वनि और नाद पर आधारित है। नाद शब्दों और स्वरों से उत्पन्न होता है। यदि कोई गायक मंत्र ज्ञाता भी है तो वह ऐसा स्वर उत्पन्न कर सकता है, जो प्रभावशाली हो। इसको इस प्रकार से देखा जा सकता है :
यदि स्वर की आवृत्ति किसी कांच, बर्फ अथवा पत्थर आदि की स्वभाविक आवृत्ति से मिला दी जाए तो अनुनाद के कारण वस्तु का कंपन आयाम बहुत अधिक हो जाएगा और वह बस्तु खडिण्त हो जाएगी। यही कारण है कि फौजियों-सैनिकों की एक लय ताल में उठने वाली कदमों की चाप उस समय बदलवा दी जाती है जब समूह रुप में वह किसी पुल पर से जा रहे होते हैं क्योंकि पुल पर एक ताल और लय में कदमों की आवृत्ति पुल की स्वभाविक आवृत्ति के बराबर होने से उसमें अनुनाद के कारण बहुत अधिक आयाम के कंपन उत्पन्न होने लगते हैं, परिणाम स्वरुप पुल क्षतिग्रस्त हो सकता है। यह शब्द और नाद का ही तो प्रभाव है। अब कल्पना करिए मंत्र जाप की शक्ति का, वह तो किसी शक्तिशाली बम से भी अधिक प्रभावशाली हो सकता है।
किसी शब्द की अनुप्रस्थ तरंगों के साथ जब लय बध्यता हो जाती है तब वह प्रभावशाली होने लगता है। यही मंत्र का सिद्धान्त है और यही मंत्र का रहस्य है। इसलिए कोई भी मंत्र जाप निरंतर एक लय, नाद आवृत्ति विशेष में किए जाने पर ही कार्य करता है। मंत्र जाप में विशेष रुप से इसीलिए शुद्ध उच्चारण, लय तथा आवृत्ति का अनुसरण करना अनिवार्य है, तब ही मंत्र प्रभावी सिद्ध हो सकेगा।
नाम, मंत्र, श्लोक, स्तोत्र, चालीसा, अष्टक, दशक शब्दों की पुनर्रावृत्ति से एक चक्र बनता है। जैसे पृथ्वी के अपनी धुरी पर निरंतर घूमते रहने से आकर्षण शक्ति पैदा होती है। ठीक इसी प्रकार जप की परिभ्रमण क्रिया से शक्ति का अभिवर्द्धन होता है। पदार्थ तंत्र में पदार्थ को जप से शक्ति एवं विधुत में परिवर्तित किया जाता है। जगत का मूल तत्व विधुत ही है। प्रकंपन द्वारा ही सूक्ष्म तथा स्थूल पदार्थ का अनुभव होता है। वृक्ष, वनस्पती, विग्रह, यंत्र, मूर्ति, रंग, रुप आदि सब विद्युत के ही तो कार्य हैं। जो स्वतःचालित प्राकृतिक प्रक्रिया द्वारा संचालित हो रहे हैं। परंतु सुनने में यह अनोखा सा लगता है कि किसी मंत्र, दोहा, चोपाई आदि का सतत जप कार्य की सिद्धि भी करवा सकता है। अज्ञानी तथा नास्तिक आदि के लिए तो यह रहस्य-भाव ठीक भी है, परंतु बौद्धिक और सनातनी वर्ग के लिए नहीं।
रुद्रयामल तंत्र में शिवजी ने कहा भी है – ‘‘हे प्राणवल्लभे। अवैष्णव, नास्तिक, गुरु सेवा रहित, अनर्थकारी, क्रोधी आदि ऐसे अनाधिकारी को मंत्र अथवा नाम जप की महिमा अथवा विधि कभी न दें। कुमार्गगामी अपने पुत्र तक को यह विद्या न दें। तन-मन और धन से गुरु सुश्रुषा करने वालों को यह विधि दें।’’
किसी भी देवी-देवता का सतत् नाम जप यदि लयबद्धता से किया जाए तो वह अपने में स्वयं ही एक सिद्ध मंत्र बन जाता है। जप की शास्त्रोक्त विधि तो बहुत ही क्लिष्ट है। किसी नाम अथवा मंत्र से इक्षित फल की प्राप्ति के लिए उसमें पुरुश्चरण करने का विधान है। पुरुश्चरण क्रिया युक्त मंत्र शीघ्र फलप्रद होता है। मंत्रादि की पुरुश्चरण क्रिया कर लेने पर कोई भी सिद्धी अपने आराध्य मंत्र के द्वारा सरलता से प्राप्त की जा सकती है। पुरुश्चरण के दो चरण हैं। किसी कार्य की सिद्धी के लिए पहले से ही उपाय सोचना, तदनुसार अनुष्ठान करना तथा किसी मंत्र, नाम जप, स्तोत्र आदि को अभीष्ट कार्य की सिद्धि के लिए नियमपूर्वक सतत् जपना इष्ट सिद्धि की कामना से सर्वप्रथम मंत्र, नामादि का पुरश्चरण कर लें। अर्थात मंत्र में जितने अक्षर हैं उतने लाख जप करें। मंत्र का दशांश अर्थात दसवां भाग हवन करें। हवन के लिए मंत्र के अंत में ‘स्वाहा’ बोलें। हवन का दशांश तर्पण करें। अर्थात मंत्र के अंत में ‘तर्पयामी’ बोलें। तर्पण का दशांश मार्जन करें अर्थात मंत्र के अंत में ‘मार्जयामि’ अथवा ‘अभिसिन्चयामी’ बोलें। मार्जन का दशांश साधु ब्राह्मण आदि को श्रद्धा भाव से भोजन कराएं, दक्षिणादि से उनको प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद लें। इस प्रकार पुरुश्चरण से मंत्र साधक का कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता।
अपने-अपने बुद्धि-विवेक अथवा संत और गुरु कृपा से आराध्य देव का मंत्र, नाम, स्तोत्रादि चुनकर आप भी उसे सतत् जपकर जीवन को सार्थक बना सकते हैं। लम्बी प्रक्रिया में न जाना चाहें तो अपने आराध्य देव के शत, कोटि अथवा लक्ष नाम जप ही आपके लिए प्रभावशाली मंत्र सिद्ध हो सकते हैं। भौतिक इक्षाओं की पूर्ति के लिए आप सरल सा उपाय भी कर सकते हैं। बौद्धिक पाठक गण यदि मंत्र सार, मंत्र चयन आदि की विस्तृत प्रक्रिया में भी जाना चाहते हैं तो …
प्रस्तुत प्रयोग पूरे 100 दिन का है अर्थात इसे सौ दिनों में पूरा करना है। बीच में यदि कोई दिन छूट जाए तो उसके स्थान पर उसी क्रम में दिनों की संख्या आप आगे भी बढ़ा सकते हैं। जिस प्रयोजन के लिए नाम, मंत्रादि, जप प्रारम्भ कर रहे हैं उसके अनुरुप बैठने का एक स्थान सुनिश्चित कर लें :

9…कर्मज व्याधियाँ

ग्रह सुख-दु:ख, रोग, कष्ट, सम्पत्ति, विपत्ति का कारण नहीं होते। इन फलों की प्राप्ति का कारण तो मनुष्य के शुभाशुभ कर्म ही होते हैं। मनुष्य ने जो कुशल या अकुशल कर्म पूर्व-जन्मों में किये होते हैं, जन्म कुंडली में ग्रह उन्हीं के अनुसार, राशियों एवं भावों में विभिन्न स्थितियों में बैठकर भावीफल की सूचना देते हैं। प्रश्न कुंडली के ग्रह वर्तमान में किये कर्मों की सूचना देते हैं। इस प्रकार ग्रह रोगों के कारक नहीं है। वस्तुत: ग्रह तो सूचक मात्र होते हैं। अत: जहाँ कहीं भी ज्योतिष में ग्रहों के कारकत्व शब्द का प्रयोग किया जाता है तब उसका तात्पर्य ग्रहों का सूचकत्व समझना चाहिये। जिस व्याधि का निर्णय चिकित्सकों द्वारा शास्त्रोक्त विधि से किया जाकर चिकित्सा की जावे फिर भी वह व्याधि शान्त न हो तब उसे कर्मज व्याधि जाननी चाहिये। उसकी चिकित्सा भेषज के साथ अनुष्ठानों, मंत्र, तंत्रादि द्वारा करनी चाहिये।.

10…..(प्रस्तुत ‘बगला-दशक’ स्तोत्र में पाँच मन्त्र बगला विद्या के सुख-साध्य और सु-शीघ्र फल-दायी हैं । इस मन्त्रों में एक बगला के ‘मन्दार’ मन्त्र नाम से प्रसिद्ध है ।
उक्त स्तोत्र में मन्त्र तो पाँच हैं, पर उनके विषय में मन्त्रोद्धार तथा फल-समेत दस पद्य होने के कारण ‘बगला-दशक’ नाम दिया है ।)

सुवर्णाभरणां देवीं, पीत-माल्याम्बरावृताम् ।
ब्रह्मास्त्र-विद्यां बगलां, वैरिणां स्तम्भनीं भजे ।।

मैं सुवर्ण के बने सर्वाभरण पहने हुए तथा पीले वस्त्र और पीले पुष्प (चम्पा) की माला धारण करने
वाली एवं साधक के वैरियों का स्तम्भन करने वाली ब्रह्मास्त्र-विद्या-स्वरुपा बगला विद्या भगवती को भजता हूँ ।

बगला के मूल विद्या-स्वरुप का विवेचन

(१)

यस्मिंल्लोका अलोका अणु-गुरु-लघवः स्थावरा जंगमाश्च ।
सम्प्रोताः सन्ति सूत्रे मणय इव वृहत्-तत्त्वमास्तेऽम्बरं तत् ।।
पीत्वा पीत्यैक-शेषा परि-लय-समये भाति या स्व-प्रकाशा ।
तस्याः पीताम्बरायास्तव जननि ! गुणान् के वयं वक्तुमीशाः ।।

हे जननि ! जिसमें ये लोक, जो दृश्य दीखने योग्य हैं और अलोक, जो अदृश्य – न दीखने योग्य हैं (ऐसे बहुत से पदार्थ और जीवादि तत्त्व हैं, जो मानव दृष्टि में नहीं आते, परन्तु अवश्यमेव अपनी सत्ता सूक्ष्म-से-सूक्ष्म रखते हैं ), वे अणु-से-अणु, लघु छोटे, गुरु बड़े, स्थूल-रुप वाले स्थावर तथा जंगम, स्थिर और चर-स्वरुप वाले -सभी ओत-प्रोत हैं, पिरोए हुए हैं । जैसे सूत में मनके पिरोए हुए हों । वह सबसे बड़ा तत्त्व अम्बर – आकाश – महाकाश-तत्त्व है । इस महाऽऽकाश-तत्त्व में ही यह सब कुछ प्रपञ्च ब्रह्माण्ड अनेकानेक व्याप्त हो रहे हैं । यह भावार्थ हुआ ।
उस महा-महान् अम्बर तत्त्व को महा-प्रलय-समय में पी-पीकर केवल एक-मात्र आप स्व-प्रकाश से शेष रहती हैं । स्वयं केवल आप ही प्रकाशमान रहती हैं । उस ‘पीताम्बरा – पीतम् अम्बरं यथा सा’ – पी लिया है महाऽऽकाश-तत्त्व जिसने, ऐसी महा मूल-माया-स्वरुपा भगवती बगला ! आपके गुण-गान करने में हम कौन समर्थ हो सकते हैं ! ।

(२)

आद्यैस्त्रियाऽक्षरैर्यद् विधि-हरि-गिरिशींस्त्रीन् सुरान् वा गुणांश्च,
मात्रास्तिस्त्रोऽप्यवस्थाः सततमभिदधत् त्रीन् स्वरान् त्रींश्च लोकान् ।
वेदाद्यं त्यर्णमेकं विकृति-विरहितं बीजमों त्वां प्रधानम्,
मूलं विश्वस्य तुर्य्यं ध्वनिभिरविरतं वक्ति तन्मे श्रियो स्यात् ।।

हे मातः ! पीताम्बरे ! भगवति ! अकार आदि तीन वर्णों से ‘प्रणव’ ॐ के विश्लेषण में – अ + उ ऐसे तीन अक्षर हैं । इन तीनों अक्षरों में ब्रह्मा-विष्णु-महेश इन तीनों देवों को और तीन (सत्त्व, रजः, तमः) गुणों की एवं तीन मात्राओं एक-द्वि-त्रिमात्राओं को तथा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित – इन स्वरों को तथा तीन अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) को और तीन लोकों (भूः, भुवः, स्वः) को निरन्तर बतलाया हुआ यह वेद का आद्य वर्ण ॐ-कार (प्रणव) तीन अक्षरवाला विकृति-रहित निर्विकार आपका बीज है । यह आपको अपनी तीन वर्ण-ध्वनियों से उक्त सभी तीन-तीन देवों, गुणों, अवस्थाओं, मात्राओं, स्वरों और लोकों में सर्व-प्रधान-तत्त्व विश्व का मूल-तुरीय तत्त्व निरन्तर बतलाता है । वह मुझे श्री प्रदान करने वाला हो ।

(३)

सान्ते रान्तेन वामाक्षणि विधु-कलया राजिते त्वं महेशि !
बीजान्तःस्था लतेव प्रविलससि सदा सा हि माया स्थिरेयम् ।
जप्ता श्याताऽपि भक्तैरहनि निशि हरिद्राक्त-वस्त्रावृतेन ।
शत्रून् स्तभ्नाति कान्तां वशयति विपदो हन्ति वित्तं ददाति ।।

हे महेशि ! भगवति बगले ! ‘वामाक्षणि’ बाँएं नेत्र में अर्थात् ईकार में, ‘विधु-कलया’ (रान्तेन राजिते सान्ते) ‘रान्ते’ लकार से और ‘विधु-कलया’ चन्द्र-बिन्दु अनुस्वार बिन्दु से विराजित, ‘सान्त’ हकार में अर्थात् ईकार में लकार मिले हुए और अनुस्वार-युक्त हकार से “ह्ल्रीं” बनता है । इसे ‘स्थिर-माया’ कहते हैं । यही बगला का मुख्य बीज है । इसमें हे महेशि ! आप बीज में लता की तरह सदा विलास करती हो । वही ‘स्थिर-माया’ आपका एकाक्षर मुख्य मन्त्र है । यह ध्यान और जप करने से भक्तो, साधकों को, जो दिन में रात में हरिद्रा (हल्दी) से रंगे वस्त्र पहने हुए, हल्दी की माला से, पीतासन पर बैठे इसे ध्याते-जपते हैं या जपते आपका ध्यान करते रहते हैं, तो यही ‘स्थिर-माया’ महा-मन्त्र उन साधकों के शत्रुओं को स्तम्भित करते है, मनोहर कामिनियों को वशीभूत करता है, विपत्तियों को दूर करता है और मन-माना धन प्रदान करता है । अर्थात् सभी वाञ्छित प्रदान करता है ।

(४)

मौनस्थः पीत-पीताम्बर-वलित-वपुः केसरीयासवेन ।
कृत्वाऽन्तस्तत्त्व-शोधं कलित-शुचि-सुधा-तर्पणोऽर्चां त्वदीयाम् ।
कुर्वन् पीतासनस्थः कर-धृत-रजनी-ग्रन्थि-मालोऽन्तराले ।
ध्यायेत् त्वां पीत-वर्णां पटु-युवति-युतो हीप्सितं किं न विन्देत् ।।

हे पीताम्बरे भगवति ! आपका साधक मौन धारे हुए, यहाँ ‘मौन’ से अन्यान्य बातचीत करने, किसी दूसरे से बोलने का निषेध समझना चाहिए, स्वयं साधक तो ध्यान-मन्त्रादि उच्चारण करें ही, ऐसा संकेत है । पीले आसन पर बैठ, पीले वस्त्र पहन, अपनी चतुर शक्ति के साथ केसर आसव से तत्त्व-शोधन कर अन्तर्याग में ध्यान-पूजा कर उसी शोधित केसर के आसव से भगवती को तर्पण अर्पण कर (पुनः आवरण-सहित पूजा पूर्ण कर) हरिद्रा-ग्रन्थि की माला हाथ में ले उससे जप करता है (सशक्ति ही जप करता है) और आप पीत-वर्णों का ध्यान करता है, तो निश्चय ही वह कौन-सा मनोरथ है, जो उसे प्राप्त न हो । अर्थात् वह समर्थ साधक सभी अभीष्ट पा सकता है । यह प्रयोग भी अनुभूत ही है ।

(५)

वन्दे स्वर्णाभ-वर्णा मणि-गण-विलसद्धेम-सिंहासनस्थाम् ।
पीतं वासो वसानां वसु-पद-मुकुटोत्तंस-हारांगदाढ्याम् ।
पाणिभ्यां वैरि-जिह्वामध उपरि-गदां विभ्रतीं तत्पराभ्याम् ।
हस्ताभ्यां पाशमुच्चैरध उदित-वरां वेद-बाहुं भवानीम् ।।

सुवर्ण-से वर्ण (कान्ति, रुप) वाली, मणी-जटित सुवर्ण के सिंहासन पर विराजमान और पीले वस्त्र पहने हुई (पीले ही गन्ध-माल्य-सहित) एवं ‘वसु-पद’-अष्ट-पद-अष्टादश सुवर्ण के मुकुट, कुण्डल, हार, बाहु-बन्धादि भूषण पहने हुई एवं अपनी दाहिनी दो भुजाओं में नीचे वैरि-जिह्वा और ऊपर गदा धारण करती हुई; ऐसे ही बाएँ दोनों हाथों में ऊपर पाश और नीचे वर धारण करती हुई, चतुर्भुजा भवानी भगवती को ‘वन्दे’ प्रणाम करता हूँ ।

(६)

षट्-त्रिंशद्-वर्ण-मूर्तिः प्रणव-मुख-हरांघ्रि-द्वयस्तावकीन-
श्चम्पा-पुष्प-प्रियाया मनुरभि-मतदः कल्प-वृक्षोपमोऽयम् ।
ब्रह्मास्त्रं चानिवार्य्यं भुजग-वर-गदा-वैरि-जिह्वाग्र-हस्ते !
यस्ते काले प्रशस्ते जपति स कुरुतेऽप्यष्ट-सिद्धिः स्व-हस्ते ।।

पाश, वर, गदा और वैरि-जिह्वा हाथ में धारण करने वाली ! आपका प्रणव-मुख वाला, ॐ-कार जिसका मुख है -आदि है । और ‘हरांघ्रि-द्वय’ – ठ-द्वय-’स्वाहा’ अन्त में पद है, ऐसी छत्तीस वर्णों की मूर्ति-माला; चम्पा के पुष्पों को अधिक प्रिय समझनेवाली आपका यह महा-मन्त्र कल्प-वृक्ष के समान सर्वाभीष्ट फल देने वाला है । यही अनिवार्य, जिसका कोई प्रतीकार नहीं है ऐसा, ब्रह्मास्त्र है । जो साधक इसे ‘प्रशस्त’ काल में -चन्द्र-तारादि अनुकूल समय में जपता है (आपकी सबिधान अर्चना के साथ), वह आठों सिद्धियों को अपने अस्त-गत कर लेता है ।

(७)

मायाद्या च द्वि-ठान्ता भगवति ! बगलाख्या चतुर्थी-निरुढा ।
विद्यैवास्ते य एनां जपति विधि-युतस्तत्व-शोधं निशीथे ।
दाराढ्यः पञ्चमैस्त्वां यजति स हि दृशा यं यमीक्षेत तं तम् ।
स्वायत्त-प्राण-बुद्धीन्द्रिय-मय-पतितं पादयोः पश्यति द्राक् ।।

हे भगवति ! ‘मायाद्या’-माया ‘ह्रीं’ आदि में है जिसके, ऐसी और ‘चतुर्थी-निरुढा’ – चतुर्थी विभक्ति में बैठी हुई ‘स्वाहा’ – यह ‘आख्या’ नाम अर्थात् ‘बगलायै’; द्वि-ठान्ता – द्वि-ठः ‘स्वाहा’ है अन्त में जिसके अर्थात् ‘ह्रीं बगलायै स्वाहा’ – यों सप्तार्ण मन्त्र हुआ । यह भी विद्या ही है । स्वाहान्त मन्त्र ‘विद्या’ कहलाते हैं । जो मानव आगम-विधान-कुल और आम्नायोक्त पद्धति से अर्द्ध-रात्रि में तत्त्व-शोधन आदि पूर्णकर ‘दाराढ्यः’ दारा-शक्ति, उसके साथ, पाँच मकारों से आपकी पूजा करता है और इस विद्या का जप करता है, वह साधकेन्द्र अपनी दृष्टि से जिस-जिसको देखता है, शीघ्र ही उस-उसको मन-प्राण-बुद्धि-इन्द्रियों-समेत स्व-वश हुए और अपने चरणों में पड़े हुए देखता है ।

(८)

माया-प्रद्युम्न-योनिव्यनुगत-बगलाऽग्रे च मुख्यै गदा-धारिण्यै ।
स्वाहेति तत्त्वेन्द्रिय-निचय-मयो मन्त्र-राजश्चतुर्थः ।
पीताचारो य एनं जपति कुल-दिशा शक्ति-युक्तो निशायाम् ।
स प्राज्ञोऽभीप्सितार्थाननुभवति सुखं सर्व-तन्त्र-सवतन्त्रः ।।

हे मातः ! माया ‘ह्रीं’ (यहाँ स्थिर-माया भी स्वीकार्य है, प्रसंगोपात्त होने के कारण), प्रद्युम्न ‘क्लीं’ और ‘योनि ‘ऐं’ – इनके अनुगत ‘बगला’, उसके आगे ‘मुख्यै’ और ‘गदा-धारिण्यै स्वाहा’ – इस प्रकार यह तत्त्व (५) और इन्द्रिय (१०) मिलकर पन्द्रह वर्ण का ( ह्रीं क्लीं ऐं बगला-मुख्यै गदा-धारिण्यै स्वाहा) मन्त्र हुआ । इसे ‘बगला पञ्चदशी मन्त्र रत्न’ कहते हैं । यह चौथा मन्त्र-राज है , जो साधक-श्रेष्ठ इस मन्त्र को कुल-क्रम से -निशा में शक्ति-समन्वित हुआ जपता है (अर्चन-तर्पण सहित), वह बुद्धिमान् विद्वान् सर्व-तन्त्र-स्वतन्त्र होता है और अपने सभी अभीष्ट अर्थों का सुख-पूर्वक अनुभव करता है ।

(९)

श्री-माया-योनि-पूर्वा भगवति बगले ! मे श्रियं देहि देहि,
स्वाहेत्थं पञ्चमोऽयं प्रणव-सह-कृतो भक्त-मन्दार-मन्त्रः ।
सौवर्ण्या मालयाऽमुं कनक-विरचिते यन्त्रके पीत-विद्याम् ।
ध्यायन् पीताम्बरे ! त्वां जपति य इह स श्री समालिंगितः स्यात् ।।

श्री – ‘श्रीं’ बीज और माया -’ह्रीं’ बीज तथा योनि – ‘ऐं’ बीज पूर्व बोलकर ‘भगवति बगले ! मे श्रियं देहि देहि स्वाहा’ इस प्रकार ‘प्रणव’ ॐ-कार सहित किया हुआ यह पाँचवाँ ‘भक्त-मन्दार’ नाम का बगला विद्या का मन्त्र-रत्न है । इस मन्त्र को सुवर्ण की माला से सुवर्ण यन्त्र पर हे पीताम्बरे ! आप भगवती को पूजता – ध्याता हुआ जो मनुष्य जपता है, वह संसार में श्री (लक्ष्मी) से समालिंगित रहता है । पीताम्बरा ‘पञ्चदशी’ भी यही है, प्रणव-सहित ‘षोडशी’ भी यही है ।

(१०)

एवं पञ्चापि मन्त्रा अभिमत-फलदा विश्व-मातुः प्रसिद्धाः,
देव्या पीताम्बरायाः प्रणत-जन-कृते काम-कल्प-द्रुमन्ति ।
एतान् संसेवमाना जगति सुमनसः प्राप्त-कामाः कवीन्द्राः ।
धन्या मान्या वदान्या सुविदित-यशसो देशिकेन्द्रा भवन्ति ।।

इस प्रकार ये पाँचों मन्त्र विश्व माता देवी भगवती पीताम्बरा के प्रसिद्ध हैं और ये प्रणत (भक्त साधक) जनों के लिए काम-कल्पद्रुम हैं । इन्हें साधते हुए विद्वान साधक भक्त लोग पूर्ण मनोरथ पाते और कविराज बनते एवं धन्य सम्माननीय तथा उदार नम वाले प्रख्यात यशस्वी और देशिकेन्द्र अर्थात् गुरुवर मण्डलाधीश बनते हैं ।

करस्थ चषकस्यात्र, संभोज्य झषकस्य च ।
बगला-दशकाध्येतुर्मातंगी मशकायते ।।

हाथ में सुधा-पूर्ण पात्र हो (तत्त्व-शोधन करता और रहस्य-याग में होम करता हो तथा तर्पण – निरत हो), आगे उस साधक के भोज्य पदार्थों में का प्रशस्त ‘झषक’ शोधित संस्कारित हो । फिर बगला भगवती का दशक वह पढ़ता हो, ऐसे साधकेन्द्र के लिए या उक्त साधक के आगे मातंग हाथी भी मशक समान हो जाता है । वह साधक हाथी को भी, अपने विपरित हो, तो मच्छर समझता है ।

11…चिदान्द रूपः शिवोऽहम् !शिवोऽहम् !!○○○

मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान,
जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, भूमि, तेज और
वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥१॥
न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पञ्च प्राणों (प्राण,
उदान, अपान, व्यान, समान) में कोई हूँ, न मैं सप्त
धातुओं (त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा) में
कोई हूँ और न पञ्च कोशों (अन्नमय, मनोमय, प्राणमय,
विज्ञानमय, आनंदमय) में से कोई, न मैं वाणी, हाथ, पैर
हूँ और न मैं जननेंद्रिय या गुदा हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ,
शिव हूँ, शिव हूँ ॥२॥
न मुझमें राग और द्वेष हैं, न ही लोभ और मोह, न
ही मुझमें मद है न ही ईर्ष्या की भावना, न मुझमें धर्म,
अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव
हूँ, शिव हूँ ॥३॥
न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख और न दुःख, न मन्त्र, न
तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने
वाला हूँ और न खाने वाला हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ,
शिव हूँ, शिव हूँ ॥४॥
न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है, न
मेरा कोई पिता ही है, न कोई माता ही है, न
मेरा जन्म हुआ है, न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न
कोई गुरु ही है और न ही कोई शिष्य, मैं चैतन्य रूप हूँ,
आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥५॥
मैं समस्त संदेहों से परे, बिना किसी आकार वाला,
सर्वगत, सर्वव्यापक, सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके
स्थित हूँ, मैं सदैव समता में स्थित हूँ, न मुझमें मुक्ति है और
न बंधन, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥६॥

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