Thursday, June 18, 2015

भगवती महाकाली साधना



महाकाली
भगवती कालिका अर्थात काली के अनेक स्वरुप, अनेक मन्त्र तथा अनेक उपासनाविधियां है। यथा-श्यामा, दक्षिणा कालिका (दक्षिण काली) गुह्म काली, भद्रकाली, महाकाली आदि । दशमहाविद्यान्तर्गत भगवती दक्षिणा काली (दक्षिणकालीका) की उपासना की जाती है।
दक्षिण कालिका के मन्त्र :- भगवती दक्षिण कालिका के अनेक मन्त्र है, जिसमें से कुछ इस प्रकार है।
(1) क्रीं,
(2) ॐ ह्रीं ह्रीं हुं हुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हुं हुं ह्रीं ह्रीं।
(3) ह्रीं ह्रीं हुं हुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं हुं हुं ह्रीं ह्रीं स्वाहा।
(4) नमः ऐं क्रीं क्रीं कालिकायै स्वाहा।
(5) नमः आं क्रां आं क्रों फट स्वाहा कालि कालिके हूं।
(6) क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रींह्रीं ह्रीं हुं हुं स्वाहा। इनमें से कीसी भी मन्त्र का जप किया जा सकताहै।
पूजा -विधि :- दैनिक कृत्य स्नान-प्राणायम आदि से निवृत होकरस्वच्छ वस्त्र धारण कर, सामान्य पूजा-विधि से काली- यन्त्र का पूजन करें।तत्पश्चात ॠष्यादि- न्यास एंव करागन्यास करके भगवती का इस प्रकार ध्यानकरें-
शवारुढां महाभीमां घोरदृंष्ट्रां वरप्रदाम्।
हास्य युक्तां त्रिनेत्रां च कपाल कर्तृकाकराम्।
मुक्त केशी ललजिह्वां पिबंती रुधिरं मुहु:।
चतुर्बाहूयुतां देवीं वराभयकरां स्मरेत्॥”
इसके उपरान्त मूल-मन्त्र द्वारा व्यापक-न्यास करके यथा विधि मुद्रा-प्रदर्शन पूर्वक पुनः ध्यान करना चाहिए।
पुरश्चरण : – कालिका मन्त्र के पुरश्चरण में दो लाख की संख्या में मन्त्र-जप कियाहै। कुछ मन्त्र केवल एक लाख की संख्या में भी जपे जाते है। जप का दशांश होमघृत द्वारा करना चाहिए । होम का दशांश तर्पण, तर्प्ण का दशांश अभिषेक तथाअभिषेक का दशांश ब्राह्मण – भोजन कराने का नियम है।
विशेष : -” दक्षिणाकालिका “ देवी के मन्त्र रात्रि के समय जप करने से शीघ्र सिद्धि प्रदानकरते है। जप के पश्चात स्त्रोत, कवच, ह्रदय आदि उपलब्ध है, उनमें से चाहेंजिनका पाठ करना चाहिए । वे सभी साधकों के लिए सिद्धिदायक है।
परिचय- दुर्गाजी का एक रुप कालीजी है। यह देवी विशेष रुप से शत्रुसंहार, विघ्ननिवारण, संकटनाश और सुरक्षा की अधीश्वरी है।
यह तथ्य प्रसिद्ध है कि इनकी कृपा मात्र से भक्त को ज्ञान, सम्पति, यशऔर अन्य सभी भौतिक सुखसमृद्धि के साधन प्राप्त हो सकते है, पर विशेष रुप सेइनकी उपासन्न सुरक्षा, शौर्य, पराक्रम, युद्ध, विवाद और प्रभाव विस्तर केसंदर्भ में की जाती है। कालीजी की रुपरेखा भयानक है। देखकर सहसा रोमांच होआता है। पर वह उनका दुष्टदलन रुप है।
भक्तों के प्रति तो वे सदैव ही परम दयालु और ममतामयी रहती है। उनकी पूजाके द्वारा व्यक्ति हर प्रकार की सुरक्षा और समृद्धि प्राप्त कर सकता है।
विधि –
लाल आसन पर कालीजी की प्रतिमा अथवा चित्र या यन्त्र स्थापित करके, लालचन्दन, पुष्प तथा धूपदीप से पूजा करके मन्त्र जप करना चाहिए। नियमत रुप सेश्रद्धापूर्वक आराधना करने वालि जनों को कालीजी(प्रायः सभी शक्ति स्वरुप)स्वप्न मे दर्शन देती है। ऐसे दर्शन से घबङाना नहीं चाहिए और उस स्वप्न कीकहीं चर्चा भी नही चाहिए। कालीजी की पुजा में बली का विधान भी है। किन्तसात्विक उपासना की दृष्टि से बलि के नाम पर नारियल अथवा किसी फल का प्रयोगकिया जा सकता है।
वैसै, देवी – देवता मात्र श्रद्धा से ही प्रसन्न हो जाते है, ये भौतिकउपादान उनकी दृष्टि में बहुत महत्वपूर्ण नहीं होते । कुछ भी न हो और कोईसाधक केवल श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति ही करता रहे, तो भी वह सफल मनोरथ हो सकता है।
धयान स्तुति-
खडगं गदेषु चाप परिघां शूलम भुशुंडी शिरः
शंखं संदधतीं करैस्तिनयनां सर्वाग भूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्य पाद द्शकां सेवै महाकालिकाम्।
यामस्तौत्स्वपितो हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम्॥
जप मन्त्र-
ॐ क्रां क्रीं क्रूं कालिकाय नमः।
प्रार्थना-
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै ससतं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै निततां प्रणतां स्मताम्॥
श्री महाकाली यन्त्र
श्मशान साधना मे काली उपासना का बङा महत्व है। इसी सन्दर्भ मे महाकालीयन्त्र का प्रयोग शत्रु नाश, मोहन, मारण, उच्चाट्न आदि कार्यों मेंप्रयुक्त होता है। मध्य मे बिन्दू, पांच उल्ट कोण, तीन वृत कोण, अष्टदल वृतएवं भूरपुर से आवृत महाकाली का यन्त्र तैयार करे।
इस यन्त्र का पूजन करते समय शव पर आरुढ, मुण्ड्माला धारण की हुई, खड्ग, त्रिशूल, खप्पर व एक हाथ मे नर-मुण्ड धारण की हुई, रक्त जिह्वा लपलपाती हुईभयंकर स्वरुप वाली महाकाली का ध्यान किया जाता है। जब अन्य विद्यायें विफलहो जाती है तब इस यन्त्र का सहारा लिया जाता है।
महाकाली की उपासना अमोघ मानी गई है। इस यन्त्र के नित्य पूजन से अरिष्टबाधाओं का स्वतः ही नाश होकर शत्रुओ का पराभव होता है। शक्ति के उपासकों केलिए यह यन्त्र विशेष फलदायी है। चैत्र, आषाढ, आश्विन एवं माघ की अष्टमीइसकी साधना हेतु सर्वश्रेष्ठ काल माना गया है।
काली सम्बन्ध में तंत्र-शास्त्र के 250-300 के लगभग ग्रंथ माने गये हैं, जिनमें बहुत से ग्रथं लुप्त है, कुछ पुस्तकालयों में सुरक्षित है । अंशमात्र ग्रंथ ही अवलोकन हेतु उपलब्ध हैं । ‘काम-धेनु तन्त्र’ में लिखा है कि – “काल संकलनात् काली कालग्रासं करोत्यतः”। तंत्रों में स्थान-स्थान पर शिव नेश्यामा काली (दक्षिणा-काली) औरसिद्धिकाली(गुह्यकाली) को केवल“काली”संज्ञा से पुकारा हैं । दशमहाविद्या के मत से तथालघुक्रमऔरह्याद्याम्ताय क्रमके मत सेश्यामाकालीकोआद्या, नीलकाली (तारा) कोद्वितीयाऔरप्रपञ्चेश्वरी रक्तकाली(महा-त्रिपुर सुन्दरी) कोतृतीयाकहते हैं, परन्तु श्यामाकाली आद्या काली नहीं आद्यविद्या हैं ।पीताम्बरा बगलामुखी को पीतकाली भी कहा है।
कालिका द्विविधा प्रोक्ता कृष्णा – रक्ता प्रभेदतः ।
कृष्णा तु दक्षिणा प्रोक्ता रक्ता तु सुन्दरीमता ।।

काली के अनेक भेद हैं –
पुरश्चर्यार्णवेः-१॰ दक्षिणाकाली, २॰ भद्रकाली, ३॰श्मशानकाली, ४॰ कामकलाकाली, ५॰ गुह्यकाली, ६॰ कामकलाकाली, ७॰ धनकाली, ८॰सिद्धिकाली तथा ९॰ चण्डीकाली ।
जयद्रथयामलेः-१॰ डम्बरकाली, २॰ गह्नेश्वरी काली, ३॰एकतारा, ४॰ चण्डशाबरी, ५॰ वज्रवती, ६॰ रक्षाकाली, ७॰ इन्दीवरीकाली, ८॰धनदा, ९॰ रमण्या, १०॰ ईशानकाली तथा ११॰ मन्त्रमाता ।
सम्मोहने तंत्रेः-१॰ स्पर्शकाली, २॰ चिन्तामणि, ३॰ सिद्धकाली, ४॰ विज्ञाराज्ञी, ५॰ कामकला, ६॰ हंसकाली, ७॰ गुह्यकाली ।
तंत्रान्तरेऽपिः-१॰ चिंतामणि काली, २॰ स्पर्शकाली, ३॰ सन्तति-प्रदा-काली, ४॰ दक्षिणा काली, ६॰ कामकला काली, ७॰ हंसकाली, ८॰ गुह्यकाली ।
उक्त सभी भेदों में से दक्षिणा और भद्रकाली ‘दक्षिणाम्नाय’के अन्तर्गत हैं तथा गुह्यकाली, कामकलाकाली, महाकाली और महा-श्मशान-कालीउत्तराम्नायसे सम्बन्धित है । काली की उपासना तीन आम्नायों से होती है । तंत्रों में कहा हैं “दक्षिणोपासकः का`लः” अर्थात्दक्षिणोपासकमहाकाल के समान हो जाता हैं ।उत्तराम्नायोपासाकज्ञान योग से ज्ञानी बन जाते हैं ।ऊर्ध्वाम्नायोपासकपूर्णक्रम उपलब्ध करने से निर्वाणमुक्ति को प्राप्त करते हैं ।दक्षिणाम्नाय में कामकला काली को कामकलादक्षिणाकाली कहते हैं । उत्तराम्नायके उपासक भाषाकाली में कामकला गुह्यकाली की उपासना करते हैं । विस्तृतवर्णन पुरुश्चर्यार्णव में दिया गया है ।
गुह्यकाली की उपासना नेपाल में विशेष प्रचलित हैं । इसके मुख्य उपासकब्रह्मा, वशिष्ठ, राम, कुबेर, यम, भरत, रावण, बालि, वासव, बलि, इन्द्र आदिहुए हैं ।.

।। श्री श्री काली सहस्त्राक्षरी ।।
ॐ क्रीं क्रीँ क्रीँ ह्रीँ ह्रीँ हूं हूं दक्षिणे कालिके क्रीँ क्रीँ क्रीँ ह्रीँ ह्रीँ हूं हूं स्वाहा शुचिजाया महापिशाचिनी दुष्टचित्तनिवारिणी क्रीँ कामेश्वरी वीँ हं वाराहिके ह्रीँ महामाये खं खः क्रोघाघिपे श्रीमहालक्ष्यै सर्वहृदय रञ्जनी वाग्वादिनीविधे त्रिपुरे हंस्त्रिँ हसकहलह्रीँ हस्त्रैँ ॐ ह्रीँ क्लीँ मे स्वाहा ॐ ॐ ह्रीँ ईं स्वाहा दक्षिण कालिके क्रीँ हूं ह्रीँ स्वाहा खड्गमुण्डधरे कुरुकुल्ले तारे ॐ. ह्रीँ नमः भयोन्मादिनी भयं मम हन हन पच पच मथ मथ फ्रेँ विमोहिनी सर्वदुष्टान् मोहय मोहय हयग्रीवे सिँहवाहिनी सिँहस्थे अश्वारुढे अश्वमुरिप विद्राविणी विद्रावय मम शत्रून मां हिँसितुमुघतास्तान् ग्रस ग्रस महानीले वलाकिनी नीलपताके क्रेँ क्रीँ क्रेँ कामे संक्षोभिणी उच्छिष्टचाण्डालिके सर्वजगव्दशमानय वशमानय मातग्ङिनी उच्छिष्टचाण्डालिनी मातग्ङिनी सर्वशंकरी नमः स्वाहा विस्फारिणी कपालधरे घोरे घोरनादिनी भूर शत्रून् विनाशिनी उन्मादिनी रोँ रोँ रोँ रीँ ह्रीँ श्रीँ हसौः सौँ वद वद क्लीँ क्लीँ क्लीँ क्रीँ क्रीँ क्रीँ कति कति स्वाहा काहि काहि कालिके शम्वरघातिनी कामेश्वरी कामिके ह्रं ह्रं क्रीँ स्वाहा हृदयाहये ॐ ह्रीँ क्रीँ मे स्वाहा ठः ठः ठः क्रीँ ह्रं ह्रीँ चामुण्डे हृदयजनाभि असूनवग्रस ग्रस दुष्टजनान् अमून शंखिनी क्षतजचर्चितस्तने उन्नस्तने विष्टंभकारिणि विघाधिके श्मशानवासिनी कलय कलय विकलय विकलय कालग्राहिके सिँहे दक्षिणकालिके अनिरुद्दये ब्रूहि ब्रूहि जगच्चित्रिरे चमत्कारिणी हं कालिके करालिके घोरे कह कह तडागे तोये गहने कानने शत्रुपक्षे शरीरे मर्दिनि पाहि पाहि अम्बिके तुभ्यं कल विकलायै बलप्रमथनायै योगमार्ग गच्छ गच्छ निदर्शिके देहिनि दर्शनं देहि देहि मर्दिनि महिषमर्दिन्यै स्वाहा रिपुन्दर्शने दर्शय दर्शय सिँहपूरप्रवेशिनि वीरकारिणि क्रीँ क्रीँ क्रीँ हूं हूं ह्रीँ ह्रीँ फट् स्वाहा शक्तिरुपायै रोँ वा गणपायै रोँ रोँ रोँ व्यामोहिनि यन्त्रनिकेमहाकायायै प्रकटवदनायै लोलजिह्वायै मुण्डमालिनि महाकालरसिकायै नमो नमः ब्रम्हरन्ध्रमेदिन्यै नमो नमः शत्रुविग्रहकलहान् त्रिपुरभोगिन्यै विषज्वालामालिनी तन्त्रनिके मेधप्रभे शवावतंसे हंसिके कालि कपालिनि कुल्ले कुरुकुल्ले चैतन्यप्रभेप्रज्ञे तु साम्राज्ञि ज्ञान ह्रीँ ह्रीँ रक्ष रक्ष ज्वाला प्रचण्ड चण्डिकेयं शक्तिमार्तण्डभैरवि विप्रचित्तिके विरोधिनि आकर्णय आकर्णय पिशिते पिशितप्रिये नमो नमः खः खः खः मर्दय मर्दय शत्रून् ठः ठः ठः कालिकायै नमो नमः ब्राम्हयै नमो नमः माहेश्वर्यै नमो नमः कौमार्यै नमो नमः वैष्णव्यै नमो नमः वाराह्यै नमो नमः इन्द्राण्यै नमो नमः चामुण्डायै नमो नमः अपराजितायै नमो नमः नारसिँहिकायै नमो नमः कालि महाकालिके अनिरुध्दके सरस्वति फट् स्वाहा पाहि पाहि ललाटं भल्लाटनी अस्त्रीकले जीववहे वाचं रक्ष रक्ष परविधा क्षोभय क्षोभय आकृष्य आकृष्य कट कट महामोहिनिके चीरसिध्दके कृष्णरुपिणी अंजनसिद्धके स्तम्भिनि मोहिनि मोक्षमार्गानि दर्शय दर्शय स्वाहा ।।
इस काली सहस्त्राक्षरी का नित्य पाठ करने से ऐश्वर्य,मोक्ष,सुख,समृद्धि,एवं शत्रुविजय प्राप्त होता है ।।
सिद्ध मंत्र
प्रणाम मन्त्र
कामाख्ये कामसम्पन्ने कामेश्वरि हरप्रिये ।
कामनां देहि मे नित्यं कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
अनुज्ञा मन्त्र
कामदे कामरुपस्थे सुभगे सुरसेविते ।
करोमि दर्शनं देव्याः सर्वकामार्थसिद्धये ॥
यह चलन्ता, हरगौरी अथवा भोगमूर्ति अष्टधातुमयी है । यह प्रस्तर निर्मित पचस्तर विशिष्ट सिंहासनासीन है, मूर्ति इस प्रकार की है कि उत्तर में वृषभवाहन, पंचवक्त्र एवं दशभुज विशिष्ट कामेश्वर महादेव अवस्थित हैं । दक्षिण भाग में षडानना, द्वादशबाहुइ विशिष्टा अष्टादश लोचना सिंहवाहिनी कमलासना देवी मूर्ति है । यह मूर्ति महामाया कामेश्वरी नाम से प्रख्यात है ।
विष्णुब्रह्मशिवैर्देवैर्धृयते या जगन्मयी ।
सितप्रेतो महादेवो ब्रह्मा लोहितपंकजम् ॥
हरिर्हरिस्तु विज्ञेयो वाहनानि महौजसः ।
स्वमूर्त्ता वाहनत्वन्तु तेषां यस्मान्न युज्यते ॥
– कालिका पुराण
वही जगन्मयी कामेश्वरी ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव कर्त्तक घृत हैं, महादेव ही यहाँ सितप्रेत अर्थात् शवरुप हैं, ब्रह्मा ही लोहित पंकज हैं एवं विष्णु सिंह रुप से अवस्थित हैं, इन देवताओं को अपनी – अपनी मूर्ति में वाहन, बनना युक्ति युक्त नहीं है – इसलिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर अन्य रुप धारण कर देवी के वाहन बने हुए हैं ।’
जो साधक वाहन सहित देवी की इस मूर्ति का ध्यान एवं पूजा करते हैं, उनके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर ये तीनों देवता भी पूजित होते हैं ।
वार्षिक उत्सवों तथा विशेष पर्वपार्वण के दिनों में यह चलन्ता मूर्ति भ्रमण कराई जाती है । तीर्थ – यात्री पहले कामेश्वरी देवी एवं कामेश्वर शिव का दर्शन करते हैं । इसके बाद देवी के महामुद्रा का दर्शन करते हैं । देवी की योनिमुद्रा पीठ दश सोपान ( सीढ़ी ) नीचे अन्धकार पूर्ण गुफा में अवस्थित होने के कारण वहाँ सदा दीपक का प्रकाश रहता है ।
कामाख्या देवी का प्रणाम मन्त्र
कामाख्ये वरदे देवि नीलपर्वतवासिनि ।
त्वं देवि जगतां मातर्योनिमुद्रे नमोऽस्तु ते ॥
स्पर्श मन्त्र
मनोभवगुहा मध्ये रक्तपाषाण रुपिणी ।
तस्याः स्पर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ॥
चरणामृत – पान मन्त्र
शुकादीनाञ्च यज् ज्ञानं यमादि परिशोधितम् ।
तदेव द्रवरुपेण कामाख्या योनिमण्डले ॥
देवी महामाया से जो जैसी याचना करते है और देवी की प्रसन्नतार्थ जप, होम, पूजा – पाठादि करते हैं, देवी उनके मन की अभीष्ट कामनाओं को उसी रुप में पूर्ण करती हैं । जो भक्तिभाव से देवी की योनिमण्डल का दर्शन, स्पर्शन तथा मुद्रा का जलपान करते हैं वे देवऋण, पितृऋण एवं ऋषिऋण से मुक्त होते हैं । यथा –
ऋणानि त्रीण्यपाकर्तुं यस्य चित्तं प्रसीदति ।
स गच्छेत् परया भक्त्या कामाख्या योनि सन्निधि ।
– योगिनी तन्त्र
पितृऋण, ऋषिऋण एवं देवऋण चुकाने के लिए जिसका मन प्रसन्न हो वह परम भक्तिभाव के साथ कामाख्या योनिमण्डल के निकट जाए ।
गवां कोटि प्रदानात्तु यत्फलं जायते नृणाम् ।
तत्फलं समवाप्नोति कामाख्या पूजयेन्नरः ॥
– कालिका पुराण
कोटि गोदान करने से मनुष्य को जो फल मिलता है वही फल कामाख्या देवी की पूजा करने से प्राप्त होता है ।
चार वर्ग क्षेत्र विशिष्ट शिलापीठ के ऊपर, जहाँ से निरन्तर पाताल से जल निकलता रहता है, वही कामाख्या का योनिमण्डल है । इस योनिमण्डल का परिमाण एक हाथ लम्बा एवं बारह अंगुल चौड़ा है और सत्तासी धनु परिमित स्थान में रुक्ष रक्त है एवं सपुलत अष्टहस्त तथा पचास हजार पुलकान्वित शिवलिंग युक्त है । यथा –
सप्तशीति धनुर्मानं रुक्षरक्त शिला च या ।
अष्टहस्तं सपुलकं लिंग लक्षार्द्धसंयुतम् ॥
चतुर्हस्त समं क्षेत्रः पश्चिमे योनिमण्डलम् ।
बाहुमात्रमिदञ्चैव प्रस्तारे द्वादशांगुलम् ॥
आपातालं जलं तत्र योनिमध्ये प्रतिस्थितम् ॥
– योगिनी तन्त्र
तृमा अंग होने के कारण इसका आधा भाग सोने के टोप से ढका रहता है और टोप को भी वस्त्र एवं पुष्प माल्यादि से आवृत तथा सुशोभित रखा जाता है । दर्शन, स्पर्शन एवं जप – पूजादि के लिए केवल एक अंश उन्मुक्त रखा जाता है । मातृअंग निपतित होकर यहाँ अवस्थित होने के कारण इस महातीर्थ को शक्तिपीठ स्थान कहा जाता है और यह सभी तीर्थों में प्रधान है । आद्याशक्ति प्रसन्न होने पर जीव को मुक्ति प्रदान करती है । अतः शक्ति साधक देवी को प्रसन्न करने के लिए कामाख्या को सर्वप्रधान शक्तिपीठ तथा तान्त्रिक क्रिया पद्धति का केन्द्र समझकर, यहाँ आकर महामुद्रा का नित्य दर्शन एवं उपासना करना जीवन का महान् कर्त्तव्य मानते हैं । इस पुण्य भारत भूमि के अनेक प्रातः स्मरणीय महापुरुषों ने इस पीठस्थान में आगमन कर तपस्या द्वारा सिद्धि लाभ किया है, इस बात का यथेष्ट प्रमाण है । आज भी उन सिद्धि साधकों के वंशधरों में से लोग यहा आते रहते हैं ।

2…लक्ष्मी सरस्वती
महामाया की दस महाविद्या अर्थात् दस विभूतियों के अन्तर्गत षोडशी, कामाख्या देवी का ही अन्य नाम है, एवं वे ही देवीपीठ में अवस्थित हैं । इसी देवीपीठ से संलग्न पूर्वप्रान्तर में मातंगी ( सरस्वती ) एवं कमला ( लक्ष्मी ) देवी का पीठस्थान है । यहाँ यथाशक्ति पूजा कर प्रणाम करें ।
प्रणाम मन्त्र
सदाचार प्रिये देवि, शुक्ल पुष्पाम्बर प्रिये ।
गोमयादि शुचि प्रीते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥
सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः ।
वेदवेदान्तवेदांग विद्यास्थानेभ्य एव च ॥
स्पर्शन मन्त्र
मध्ये च कुब्जिके देवि प्रान्ते प्रान्ते च भैरवी ।
एकैक स्पर्शनात् देव्याः कोटि जन्माघनाशनम् ॥
इसके बाद महामाया का दर्शन, स्पर्शन, पूजनादि करें । अनन्तर चलन्ता मन्दिर के चारों ओर दीवालों से संलग्न देव – देवियों की मूर्ति का दर्शन करें । मंगलचण्डी, कल्कि अवतार, युधिष्ठिर, श्री रामचन्द्र, बटुक भैरव, नारायण गोपाल, कूचविहार के राजा नर नारायण की प्राचीन मूर्ति, नील – कण्ठ महादेव, नन्दी, भृंगी, कपिल मुनि, मनसा देवी, जरत्कारु मुनि, कूचविहार के दोनों महाराजों का मन्दिर निर्माणादि विषय कीर्तिज्ञापक शिलालिपि आदि तथा पंचरत्न मन्दिर की चामुण्डा देवी का दर्शन करें ।
चामुण्डा का प्रणाम मन्त्र
महिषाघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनि ।
आयुरारोग्यमैश्वर्य देहि मे परमेश्वरि ।
इसके अतिरिक्त नाटमन्दिर के भीतर, आहोम राजा राजेश्वरसिंह और गौरीनाथसिंह की शिला और ताम्रलिपियाँ हैं । यात्रियों के तीर्थकृत्य, कर्मकाण्ड विशेषकर कुमारी पूजा, दान, भोज्य उत्सर्ग आदि कर्मानुष्ठान इसी पंचरत्न मन्दिर के भीतर तीर्थ के पुजारी ब्राह्मणगण सम्पादन करवाते हैं ।
कुमारी पूजा
महातीर्थ कामाख्या में महामाया कुमारी रुप में विराजमान हैं । यात्रीगण देवी भाव से कुमारी पूजा कर कृतकृत्य होते हैं । जिस तरह प्रयाग में मुण्डन एवं काशी में दण्डी भोजन करवाने की विधि है, उसी तरह कामाख्या में कुमारी पूजा आवश्यक कर्त्तव्य है । यहाँ कुमारी पूजा करने से सर्व देवदेवियों की पूजा करने का फल प्राप्त होता है । भक्तिभाव एवं कर्त्तव्य बुद्धाय कुमार पूजा करने से अवश्य पुत्र, धन, पृथ्वी, विद्या आदि का लाभ होता है एवं मन की सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है ।
सर्वविद्यास्वरुपा हि कुमारी नात्र संशयः ।
एकाहि पूजिता बाला सर्वं हि पूजितं भवेत् ॥
– योगिनीतन्त्र
कुमारी सर्वविद्या स्वरुपा है, इसमें सन्देह नहीं । एक कुमारी पूजा करने से सम्पूर्ण देव – देवियों की पूजा का फल होता है ।
ध्यानम्
ॐ बालरुपाञ्च त्रैलोक्य सुन्दरीं वरवर्णिनाम् ।
नानालंकार नाम्राङ्गीं भद्रविद्या प्रकाशिनीम् ।
चारुहास्यां महानन्द हदयां चिन्तयेत् शुभाम् ॥
आवाहनम्
ॐ मन्त्राक्षरमयीं देवीं मातृणां रुपधारिणीम् ।
नवदुर्गात्मिकां साक्षात् कन्यामावाहयाम्यहम् ॥
प्रणाम मन्त्र
ॐ जगदवन्दे जगतपूज्ये सर्वशक्ति स्वरुपिणि ।
पूजां गृहाण कौमारी जगन्मातर्नमोऽस्तु ते ॥
देवी मन्दिर का प्रदक्षिणा मन्त्र
यानि यानीह पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ॥
3..कम्बलेश्वर
कम्बलेश्वर
कामाख्या देवी के मन्दिर के चारों ओर पर्वत के ऊपर भिन्न – भिन्न स्थानों में दशमहाविद्या के मन्दिर में देवी के नव – योनिपीठ के अन्तर्गत अन्य सातपीठ – स्थान विद्यमान हैं । पंचानत के पाँचों मुख की ओर पाँच शिवमन्दिर अवस्थित हैं । कम्बलेश्वर नाम का विष्णु – मन्दिर देवी मन्दिर के सन्निकट अवस्थित हैं । यहाँ भगवान् विष्णु कम्बलाख्य नाम से प्रसिद्ध हैं । इसके बाहर भी कामेश्वर और सिद्धेश्वर के मन्दिर के बीच में केदार क्षेत्र और उक्त दो मन्दिरों के दक्षिण प्रान्त में कुछ दूरी पर वन के बीच वनवासिनी, जयदुर्गा तथा ललिता – कान्ता के नामसे तीन शिलापीठ विद्यमान हैं ।
कम्बलेश्वर प्रणाम मन्त्र
नमो नमस्ते देवेश श्याम श्रीवत्सभूषित ।
लक्ष्मीकान्त नमस्तेऽस्तु नमस्ते पुरुषोत्तम ॥
देवदानव गन्धर्वपादपदमार्चित प्रभो ।
नमो बरदालिंगाय कम्बलाय नमो नमः ॥
अनुज्ञा मन्त्र
नमस्ते कम्बलेशाय महाभैरवरुपिणे ।
अनुज्ञां देहि मे नाथ कामाख्या दर्शनं प्रति ॥

4….ॐॐॐॐॐ जयन्ति मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।।ॐॐॐॐॐॐ
1)ॐ जयन्ती — जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तते इति ‘जयन्ती ‘ —सबसे
उत्कृष्ट एवं विजयशालिनी ।।

2) ॐ मङ्गला –मङ्गं जननमरणादिरूपं समर्पणं
भक्तानां लाति गृह्णाति नाशयति या सा मङ्गला मोक्षप्रदा —
जो अपने भक्तों के जन्म -मरण आदि संसार बन्धनको दूर करती है उन
मोक्ष दायिनी मंगलमयी देवीका नाम ‘मङ्गला’ है ।।

3) ॐ काली — कलयति भक्षयति प्रलयकाले सर्वम् इति ‘काली’ —
जो प्रलयकालमे सम्पूर्ण सृष्टि को अपना ग्रास बना लेती है ; वह
‘काली ‘ है ।।

4) ॐ भद्रकाली — भद्रं मङ्गलं सुखं
वा कलयति स्वीकरोति भक्तेभ्यो दातुम् इति भद्रकाली सुखप्रदा —
जो अपने भक्तों को देनेके लिए ही भद् , सुख किंवा मंगल स्वीकार
करती है , वह ‘भद्रकाली’ है ।।

5) ॐ कपालिनी –धारयति हस्ते कपाल मुण्डभूषिता च
या सा कपालिनी — हातमे कपाल तथा गलेमे मुण्डमाला धारण करने
वाली ।।

6) ॐ दुर्गा –दुःखेन अष्टाङ्गयोगकर्मोपासनारूपेण क्लेशेन गम्यते
प्राप्यते या सा ‘दुर्गा’ –जो अष्टांगयोग, कर्म एवं उपासनारूप
दुःसाध्य साधन से प्राप्त होती है , वे जगदम्बिका ‘दुर्गा’
कहलाती है ।।

7) ॐ क्षमा –क्षमते सहते भक्तानाम् अन्येषां वा सर्वानपराधान्
जननीत्वेनातिशयकरूणामयस्वभावादिति ‘क्षमा’ — सम्पूर्ण जगत्
की जननी होनेसे अत्यन करूणामय स्वभाव होनेके कारण
जो भक्तों अथवा दूसरों के भी सारे अपराध क्षमा करती है ,
उनका नाम ‘क्षमा’ है ।।

ॐ शिवा — सबका कल्याण अर्थात शिव
करनेवाली जगदम्बाको ‘शिवा ‘ कहते है ।।

9) ॐ धात्री –सम्पूर्ण प्रपंचको धारण करनेके कारण भगवती का नाम
‘धात्री’ है ।।

10) ॐ स्वाहा –स्वाहारूपसे यज्ञभाग ग्रहण करके देवताओं का पोषण
करनेवाली भगवती को ‘स्वाहा ‘ कहते है ।।

11) ॐस्वधा — स्वधारूपसे श्राद्ध और तर्पणको स्वीकार करके
पितरोंका पोषण करनेवाली भगवती को ‘स्वधा ‘ कहते है ।।

इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके ! तुम्हे मेरा नमस्कार हो ।
देवि चामुण्डे ! तुम्हारी जय हो ।सम्पूर्ण
प्राणियोंकी पीडा हरनेवाली देवि ! तुम्हारी जय हो ।सबमे व्याप्त
रहने वाली देवि ! तुम्हारी जय हो ।कालरात्रि ! तुम्हें नमस्कार हो ।।

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