Tuesday, June 23, 2015

उच्छिष्ट गणपति साधना

उच्छिष्ट गणपति साधना



 कड़वे नीम की जड़ से कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन अंगूठे के बराबर की गणेश की प्रतिमा बनाकर रात्रि के प्रथम प्रहर में स्वयं लाल वस्त्र धारण कर लाल आसन पर पश्चिम मुख होकर झूठे मुँह से सामने थाली में प्रतिमा को स्थापित कर साधना में सफलता की सदगुरुदेव से प्रार्थना कर संकल्प करें और ततपश्चात गणपति का ध्यान कर  उनका पूजन लाल चन्दन,अक्षत,पुष्प के द्वारा पूजन करे और लाल चन्दन की ही माला से झूठे मुँह से ही ५ माला मन्त्र जप करें. सात दिनों तक ऐसे ही पूजन करे और आठवे दिन अर्थात अमावस्या को पञ्च मेवे से ५०० आहुतियाँ  करें इससे मंत्र सिद्ध हो जाता है. तब आप इनके विविध प्रयोगों को कर सकते हैं. २ प्रयोग नीचे दिए गए हैं.
१.     जिस व्यक्ति का आकर्षण करना हो चाहे वो आपका बॉस हो, सहकर्मी हो, प्रेमी,प्रेमिका या फिर कोई मित्र या शत्रु हो जिससे, आपको अपना काम करवाना हो.उसके फोटो पर इस सिद्ध प्रतिमा का स्थापन कर ३ दिनों तक १ माला मन्त्र जप करने से निश्चय ही उसका आकर्षण होता है.
२.     अन्न के ऊपर इस सिद्ध प्रतिमा का स्थापन कर ११ दिनों तक नित्य ३ माला मंत्र जप करने से वर्ष भर घर में धन धान्य का भंडार भरा रहता है और यदि इसके बाद नित्य ५१ बार मंत्र को जप कर लिया जाये तो ये भंडार भरा ही रहता है. नहीं तो आपको प्रति ६ माह या वर्ष में करना चाहिए.

ध्यान मन्त्र –
      दंताभये चक्र- वरौ दधानं कराग्रग्रम् स्वर्ण-घटं त्रि-नेत्रं ,
     धृताब्जयालिंगितमब्धि-पुत्र्या लक्ष्मी-गणेशं कनकाभमीडे.



मंत्र- ॐ नमो हस्ति मुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट महात्मने क्रां क्रीं ह्रीं घे घे उच्छिष्ठाय स्वाहा.



।। सर्व कार्य सिद्धि .. श्रीउच्छिष्ट-गणेश कवच।।




ऋषिर्मे गणकः पातु, शिरसि च निरन्तरम्। त्राहि मां देवी गायत्री, छन्दः ऋषिः सदा मुखे।।१


हृदये पातु मां नित्यमुच्छिष्ट-गण-देवता। गुह्ये रक्षतु तद्-बीजं, स्वाहा शक्तिश्च पादयो।।२


काम-कीलकं सर्वांगे, विनियोगश्च सर्वदा। पार्श्व-द्वये सदा पातु, स्व-शक्तिं गण-नायकः।।३


शिखायां पातु तद्-बीजं, भ्रू-मध्ये तार-बीजकं। हस्ति-वक्त्रश्च शिरसि, लम्बोदरो ललाटके।।४


उच्छिष्टो नेत्रयोः पातु, कर्णी पातु महात्मने। पाशांकुश-महा-बीजं, नासिकायां च रक्षतु।।५


भूतीश्वरः परः पातु, आस्यं जिह्वा स्वयंवपु। तद्-बीजं पातु मां नित्यं, ग्रीवायां कण्ठ-दर्शके।।६


गं बीजं च तथा रक्षेत्, तथा त्वग्रे च पृष्ठके। सर्व-कामश्च हृत्पातु, पातु मां च कर-द्वये।।७


उच्छिष्टाय च हृदये, वह्नि-बीजं तथोदरे। माया-बीजं तथा कट्यां, द्वावूरु सिद्धि-दायकः।।८


जंघायां गण-नाथश्च, पादौ पातु विनायकः। शिरसः पाद-पर्यन्तमुच्छिष्ट-गण-नायकः।।९


आपाद्-मस्तकान्तं च, उमा-पुत्रश्च पातु माम्। दिशोष्टौ च तथाऽऽकाशे, पाताले विदिशाष्टके।।१०


अहर्निशं च मां पातु, मद-चञ्चल-लोचनः। जलेऽनले च संग्रामे, दुष्ट-कारा-गृहे वने।।११


राज-द्वारे घोर-पथे, पातु मां गज-नायकः। इदं तु कवचं गुह्यं, मम वक्त्रात् विनिर्गतम्।।१२


त्रैलोक्ये सततं पातु, द्वि-भुजश्च चतुर्भुजः। बाह्यमभ्यन्तरं पातु, सिद्धि-बुद्धि-विनायकः।।१३


सर्व-सिद्धि-प्रदं देवि ! कवचमृद्धि-सिद्धिदम्। एकान्ते प्रजपेन्मन्त्रं, कवचं युक्ति-संयुतम्।।१४


इदं रहस्यं कवचमुच्छिष्ट-गण-नायकम्। सर्व-वर्मसु देवेशि ! इदं कवच-नायकम्।।१५


एतत् कवच-माहात्म्यं, वर्णितु नैव शक्यते। धर्मार्थ-काम-मोक्षादि, नाना-फल-प्रदं नृणाम्।।१६


शिव-पुत्रः सदा पातु, पातु मां च सुरार्चितः। गजाननः सदा पातु, गण-राजश्च पातु माम्।।१७


सदा शक्ति-रतः पातु, पातु मां काम-विह्वलः। सर्वाभरण-भूषाढ्या, पातु मां सिन्दुरार्चितः।।१८


पञ्च-मोद-करः पातु, पातु मां पार्वती-सुतः। पाशांकुश-धरः पातु, पातु मां च धनेश्वरः।।१९


गदा-धरः सदा पातु, पातु मां काम-मोहितः। नग्न-नारी-रतः पातु, पातु मां च गणेश्वर।।२०


अक्षय्य-वरदः पातु, शक्ति-युक्तः सदाऽवतु। भाल-चन्द्रं सदा पातु, नाना-रत्न-विभूषितः।।२१


उच्छिष्ट-गण-नाथश्च, मद-घूर्णित-लोचनः। नारी-योनि-रसास्वादः, पातु मां गज-कर्णकः।।२२


प्रसन्न-वदनः पातु, पातु मां भग-वल्लभः। जटा-धरः सदा पातु, पातु मां च किरीट-धृक्।।२३


पद्मासन-स्थितः पातु, रक्त-वर्णश्च पातु माम्। नग्न-साम-पदोन्मतः, पातु मां गण-दैचतः।।२४


वामांगे सुन्दरी-युक्तः, पातु मां मन्मथ-प्रभुः। क्षेत्र-प्रवसितः पातु, पातु मां श्रुति-पाठकः।।२५


भूषणाढ्यस्तु मां पातु, नाना-भोग-समन्वितः। स्मिताननः सदा पातु, श्रीगणेश-कुलान्वितः।।२६


श्री-रक्त-चन्दन-मयः, सुलक्षण गणेशः। श्वेतार्क-गणनाथश्च, हरिद्रा-गण-नायकः।।२७


परिभद्र-गणेशश्च, पातु सप्त-गणेश्वरः। प्रवालक गणाध्यक्षो, गज-दन्तो गणेश्वरः।।२८


हर-बीज-गणेशश्च, भद्राक्ष-गण-नायकः। दिव्यौषधि-समुद्भूतो, गणेशश्चिन्तित-प्रदः।।२९


लवणस्य गणाध्यक्षो, मृत्तिका-गण-नायकः। तण्डुलाक्ष-गणाध्यक्षो, गो-मयस्य गणेश्वरः।।३०


स्फटिकाक्ष-गणाध्यक्षो, रुद्राक्ष-गण-दैवतः। नव-रत्न-गणेशश्च, आदि-देवो गणेश्वरः।।३१


पञ्चाननश्चतुर्वक्त्रो, षडानन-गणेश्वरः। मयूर-वाहनः पातु, पातु मां मूषकासनः।।३२


पातु मां देव-देवेशः, पातु माम् ऋषि-पूजितः। पातु मां सर्वदा देवो, देव-दानव-पूजितः।।३३


त्रैलोक्य-पूजितो देवः, पातु मां च विभुः प्रभुः। रंगस्थं च सदा पातु, सागरस्थं सदाऽवतु।।३४


भूमिस्थं च सदा पातु, पातालस्थं च पातु माम्। अन्तरिक्षे सदा पातु, आकाशस्थं सदाऽवतु।।३५


चतुष्पथे सदा पातु, त्रि-पथस्थं च पातु माम्। बिल्वस्थं च वनस्थं च, पातु मां सर्वतः स्थितम्।।३६


राज-द्वार-स्थितं पातु, पातु मां शीघ्र-सिद्धिदः। भवानी-पूजितः पातु, ब्रह्मा-विष्णु-शिवार्चितः।।३७


।।फल-श्रुति।।


इदं तु कवचं देवि ! पठनात् सर्व-सिद्धिदम्। उच्छिष्ट-गणनाथस्य, स-मन्त्रं कवचं परम्।।१


स्मरणाद् भूपतित्वं च, लभते सांगतां ध्रुवम्। वाचः-सिद्धि-करं शीघ्रं, पर-सैन्य-विदारणम्।।२


सर्व-सौभाग्यदं शीघ्रं, दारिद्रयार्णव-घातकम्। सु-दार-सु-प्रजा-सौख्यं, सर्व-सिद्धि-करं नृणाम्।।३


प्रतिदिन10 बार उक्त कवच का पाठ करे। यह साधना सर्व-सिद्धि-दायक है। इससे समस्त विघ्नों का नाश होता है। आर्थिक सफलता प्राप्त करने के लिए और जीवन में पूर्णता प्राप्त करने के लिए इससे बढकर कोई कवच नहीं है। मात्र स्मरण-मात्र से बिना मन्त्र, बिना जप, बिना हवन के इस साधना से लाभ होता है।





तीव्र उच्छिष्ट गणपति साधना


 कड़वे नीम की जड़ से कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन अंगूठे के बराबर की गणेश की प्रतिमा बनाकर रात्रि के प्रथम प्रहर में स्वयं लाल वस्त्र धारण कर लाल आसन पर पश्चिम मुख होकर झूठे मुँह से सामने थाली में प्रतिमा को स्थापित कर साधना में सफलता की सदगुरुदेव से प्रार्थना कर संकल्प करें और ततपश्चात गणपति का ध्यान कर  उनका पूजन लाल चन्दन,अक्षत,पुष्प के द्वारा पूजन करे और लाल चन्दन की ही माला से झूठे मुँह से ही ५ माला मन्त्र जप करें. सात दिनों तक ऐसे ही पूजन करे और आठवे दिन अर्थात अमावस्या को पञ्च मेवे से ५०० आहुतियाँ  करें इससे मंत्र सिद्ध हो जाता है. तब आप इनके विविध प्रयोगों को कर सकते हैं. २ प्रयोग नीचे दिए गए हैं.
१.     जिस व्यक्ति का आकर्षण करना हो चाहे वो आपका बॉस हो, सहकर्मी हो, प्रेमी,प्रेमिका या फिर कोई मित्र या शत्रु हो जिससे, आपको अपना काम करवाना हो.उसके फोटो पर इस सिद्ध प्रतिमा का स्थापन कर ३ दिनों तक १ माला मन्त्र जप करने से निश्चय ही उसका आकर्षण होता है.
२.     अन्न के ऊपर इस सिद्ध प्रतिमा का स्थापन कर ११ दिनों तक नित्य ३ माला मंत्र जप करने से वर्ष भर घर में धन धान्य का भंडार भरा रहता है और यदि इसके बाद नित्य ५१ बार मंत्र को जप कर लिया जाये तो ये भंडार भरा ही रहता है. नहीं तो आपको प्रति ६ माह या वर्ष में करना चाहिए.
ध्यान मन्त्र 
      दंताभये चक्र- वरौ दधानं कराग्रग्रम् स्वर्ण-घटं त्रि-नेत्रं ,
     धृताब्जयालिंगितमब्धि-पुत्र्या लक्ष्मी-गणेशं कनकाभमीडे.
मंत्र नमो हस्ति मुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट महात्मने क्रां क्रीं ह्रीं घे घे उच्छिष्ठाय स्वाहा

2 comments:

  1. गुरूजी,"श्रीउच्छिष्ट-गणेश कवच" का न्यास ,विनियोग दीजिए...धन्यवाद

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  2. pukhraj mewarji please give nyas viniyog of uchisht ganpathy kavach

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