Tuesday, June 16, 2015

श्रीगुरुदेव स्तुति

श्रीगुरुदेव स्तुति             श्रीगुरुदेव स्तुति   ~~Jai MahakaaL~~





"अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरूवे नमः॥

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।चक्षुरून्मीलितं येन तस्मै श्री गुरूवे नमः॥

गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।गुरू साक्षात परंब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः॥

स्थावरं जंगमं व्याप्तं यत्किञ्चित् सचराचरम् ।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरूवे नमः॥

चिन्मयं व्यापितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥

सर्वश्रुति शिरोरत्न विराजित पदाम्बुजः।वेदान्ताम्बुज सूर्याय तस्मै श्री गुरवे नमः॥

चैतन्य शाश्वतं शान्तं व्योमातीतं निञ्जनः।बिन्दु नाद कलातीतःतस्मै श्री गुरवे नमः॥

ज्ञानशक्ति समारूढःतत्त्व माला विभूषितम्।भुक्ति मुक्ति प्रदाता च तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अनेक जन्म सम्प्राप्त कर्म बन्ध विदाहिने।आत्मज्ञान प्रदानेन तस्मै श्री गुरवे नमः॥

शोषणं भव सिन्धोश्च ज्ञापनं सार संपदः।गुरोर्पादोदकं सम्यक् तस्मै श्री गुरवे नमः॥

न गुरोरधिकं त्तत्वं न गुरोरधिकं तपः।तत्त्व ज्ञानात् परं नास्ति तस्मै श्री गुरवे नमः॥

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोर्पदम् ।मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोर्कृपा॥

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं।द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्षयम्॥

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं।भावातीतं त्रिगुणरहितं सद् गुरूं तन्नमामि॥

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥

ध्यानं सत्यं पूजा सत्यं सत्यं देवो निरञ्जनम्।गुरिर्वाक्यं सदा सत्यं सत्यं देव उमापतिः॥

" गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरौ निष्ठा परं तपः | गुरोः परतरं नास्ति त्रिवारं कथयामि ते ||

भगवान शिवजी कहते हैं - "गुरु ही देव हैं, गुरु ही धर्म हैं, गुरु में निष्ठा ही परम तप है | गुरु से अधिक और कुछ नहीं है यह मैं तीन बार कहता हूँ |" (श्री गुरुगीता श्लोक 152). हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम ! कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा !! ध्यानं मूलं गुरू: मूर्ती, पूजा मूलं गुरू: पदम्। मंत्र मूलं गुरू: वाक्यं, मोक्ष मूलं गुरू: कृपा।। गुरुब्र्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरा:। गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै: श्री गुरुवे नम:॥ अब महाप्रभु गणेश का ध्यान कहते हैं - जिनका अङ्ग प्रत्यङ्ग उदीयमान सूर्य के समान रक्त वर्ण का है,

जो अपने बायें हाथों में पाश एवं अभयमुद्रा तथा दाहिने हाथों में वरदमुद्रा एवं अंकुश धारण किये हुये हैं, समस्त दुःखों को दूर करने वाले, रक्तवस्त्र धारी, प्रसन्न मुख तथा समस्त भूषणॊं से भूषित होने के कारण मनोहर प्रतीत वाल गजानन गणेश का ध्यान करना चाहिए ॥ “ वक्रतुण्ड महाकाय , सूर्यकोटि समप्रभ ! निर्विघ्नं कुरु मे देव , सर्व कार्येषु सर्वदा” !! ................................

मेरी इस वेबसाईट पर जो प्रकाशित लेख है। इनमे से मेरे कुछ निजी लेख भी है । और मेरे द्वारा कुछ अनुभूत प्रयोग भी है। और कुछ प्रकाशित लेख कही ना कही लिये गये है। अगर इससे किसी को कोई परेशानी होती है। तो सूचित करे । अगर किसी लेख से किसी को आपत्ति है। तो उसे तुरन्त हटा दिया जायेगा । इस साईट का निमाणॅ इस लिये किया गया है। कि यहाँ पर भारतीय वैदिक ज्योतिष और अंक ज्योतिष॰ रत्न विज्ञान ॰मंत्र यंत्र तंत्र और अन्य गुप्त विद्धयाओ की जानकारी सभी को मिले । ..........................

लक्ष्मी से युक्त श्रीनृसिंहभगवान् , महागणपति एवं श्रीगुरु को में नमस्कार करता हुँ।

ॐ श्री सद गुरूदेवाय नमः

ॐ श्री गणेशाय नमः

ॐ श्री लक्ष्मीनृसिंहाय नम:।

भगवान् श्री लक्ष्मीनृसिंह की जय हो ।

ॐ श्री हनुमते नमः

ॐ बं बटुक भैरवाय नमः

ॐ ईष्ट देवताभ्यो नमः ।

स्वात्माराम,आत्माराम,आत्माराम,आत्माराम | वनं समाश्रिता येपि निर्ममा निष्परिग्रहा: अपिते परिपृच्छन्ति ज्योतिषां गति कोविदम ॥


• जो सर्वस्व त्यागकर वनों में जा चुके हैं, ऐसे राग-द्वेष शुन्य,निष्परिग्रह ऋषि भी अपना भविष्य जानने को उत्सुक रहते हैं, तब साधारण मानव की तो बात ही क्या है ? आइये जाने,समझे एवं प्रयोग करें.हमारे ऋषि मुनियों द्वारा प्रदत्त उस ज्योतिषीय ज्ञान को.जिसका कोई विकल्प नहीं हें. इस ज्योतिष विद्या के द्वारा आप और हम सभी... भविष्य में होने वाले अच्छे-बुरे घटना क्रम को जान सकते हें. उपाय. कर सकते हें.. पूजा पाठ,मन्त्र जाप जेसे उपायों द्वारा उस अशुभ घटना को टालने का प्रयास कर सकते हें

2…हरि: ॐ तत् सत्…. महारामायण में शिव जी पारवती जी से कहते है , की जैसे देवताओ में इंद्र ,मनुष्यों में राजा ,अखिल लोको के मध्य गोलोक , समस्त नदियों में श्री सरयू जी ,कवि वृन्दो में अनंत , भक्तो में श्री हनुमान जी ,शक्तियों में श्री जानकी जी ,अवतारों में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी ,.पर्वतों में सुमेरु ,जलाशयों में सागर ,गौओ में कामधेनु ,धनुर्धारियो में कामदेव , पक्षियों में गरुण ,तीर्थो में पुष्कर ,धर्मो में अहिंसा ,साधुत्व प्रतिपादन में दया ,क्षमा वालो में प्रथ्वी ,मणियो में कौस्तुभ ,धनुषो में सारंग ,खड्गो में नंदक ,ज्ञानो में ब्रम्हज्ञान ,भक्ति में प्रेमाभक्ति ,मन्त्र समूह में प्रणव ,वृक्षों में कल्पवृक्ष ,सप्तपुरियो में अयोध्या पुरी ,वेद विहित कर्मो में भगवत्सम्बन्धी कर्म , स्वरसंग्यक वर्णों में अकार श्रेष्ठ है |वैसे ही भगवान के समस्त नामो में श्री राम नाम परम श्रेष्ठ है |

एक बार एक शिस्य अपने गुरु जी के पास पहुंचा और निवेदन किया कि हे गुरुदेव मुझे ऐसा मंत्र दीजिये कि जो मंत्र इस संसार में किसी को न मिला हो | गुरु देव ने कहा कि " सीता राम " मंत्र का जप करो | शिस्य वहाँ से मंत्र प्राप्त कर इलाहाबाद संगम स्नान करने गया और संगम स्थान में डुबकी लगा कर ज्यों ही उठा तो देखा कि वहाँ उपस्थित सारे लोग "सीता राम" कर रहे हैं | शिस्य को बड़ा अजीब लगा कि मैंने गुरुदेव से कहा था कि ऐसा मंत्र दीजियेगा जो कोई ने जपता हो और मुझे ऐसा मंत्र दे दिया जो सारी दुनिआ जपती है | ऐसा सोच कर शिस्य वापस गुरूजी के पास पहुंचा और अपनी सारी बात कही | गुरुदेव समझ गए कि मेरा ये शिस्य निहायत बेवकूफ है | गुरुदेव ने अपने शिस्य को धरती पर पड़े एक ठोस टुकड़े को उठा कर दिया और कहा कि इसको ले कर बाजार में जाओ और इसको बेचना मत केवल इसका मूल्य पता कर के आओ | शिस्य वो पत्थर का टुकड़ा ले कर आश्रम से बाहर निकला तो पहले सब्जी वाले अपना ठेला लगा कर सब्जी बेचते हुए मिले | उनके पास जा कर पुछा कि भाई इस पत्थर का क्या मूल्य लगाते हो | सब्जी वाले ने कहा कि ये पत्थर हमको बटखरा के काम आ जायेगा इसलिए हम इसका तुमको दो रुपये दे देंगे | शिस्य आगे बढ़ा और एक किराना कि दुकान में पहुंचा उससे भी पुछा तो दुकानदार ने कहा कि ये पत्थर हमको अपने कागज दबाने के काम में आ जायेगा तो हम इसका तुमको पांच रुपये दे देंगे | ऐसे ही दुकान - दुकान घुमते हुए शिस्य पहुँच गया जौहरी के पास और वही सवाल जौहरी से दुहराया | जौहरी ने पत्थर को देखा तो कहा कि मै अगर अपने दुकान का सारा माल भी बेच दूंगा तो इसकी कीमत नहीं चूका सकता क्योंकि ये तो अमूल्य हीरा है | शिस्य चकरा गया और भागते हुए गुरुदेव के पास पहुंचा और सारी बात बताई | शिस्य ने कहा कि गुरुदेव एक ही पत्थर का सब लोग अलग-अलग मूल्य लगा रहे थे | गुरुदेव ने कहा कि हाँ रे यही बात तो तुम्हे समझानी थी कि जो चीज मैंने तुझे दी है उसकी कीमत दुनिया वाले नहीं जानते , उसकी कीमत सिर्फ जौहरी या पारखी ही जानेगा जो उसका सही जानकर होगा | तुझे अपने जीवन में गुरु के सावधान बचनो को बस उतारना है ,फिर तू सामान्य नहीं रहेगा ,तू भी हीरा बन जायेगा | किन्तु निष्काम भाव से देवताओं की उपासना करने वालों की सारी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है । केवल सुख प्राप्ति के लिए प्रत्येक मन्त्रों के जितने भी प्रयोग बतलाये गए हैं उनकी आसक्ति का त्याग कर निष्काम रुप से देवता की पूजा करनी चाहिए ॥

अब मन्त्र सिद्धि का लक्षण कहते हैं - मन में प्रसन्नता आत्मसन्तोष, नगाङ्गे की ध्वनि, गाने की ध्वनि, ताल की ध्वनि, गन्धर्वो का दर्शन, अपने तेज को सूर्य के समान देखना, निद्रा, क्षुधा, जप करना, शरीर का सौन्दर्य बढना, आरोग्य होना, गाम्भीर्य, क्रोध और लोभ का अपने में सर्वथा अभाव, इत्यादि चिन्ह जब साधक को दिखाई पडे ती मन्त्र की सिद्धि तथा देवता की प्रसन्नता समझनी चाहिए ॥ अब मन्त्र सिद्धि के बाद के कर्त्तव्य का निर्देश करते हैं - मन्त्र सिद्धि प्राप्त कर लेने वाले साधक को ज्ञान प्राप्ति के लिए जप की संख्या में निरन्तर वृद्धि का यन्त करते रहना चाहिए । जब वेदान्त प्रतिपादित (अयमात्माब्रह्म, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वामसि श्वेतोकेतो इत्यादि) तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त है जाय तब साधक कृतार्थ हो जाता है और संसार बन्धन से छूट जाता है ॥ अब कलियुग में सिद्धिल्प्रद मन्त्रों का आख्यान करते हैं - नृसिंह का त्र्यक्षर, एकाक्षर, एवं अनुष्टुप्‍ मन्त्र, (कार्तवीर्य) अर्जुन के एकाक्षर और अनुष्टुप्‍ दो मन्त्र, हयग्रीव, मन्त्र, चिन्तामणि मन्त्र, क्षेत्रपाल, भैरव यक्षराज (कुबेर) गोपाल, गणपति, चेटकायक्षिणी, मातंगी सुन्दरी, श्यामा, तारा, कर्ण पिशाचिनी, शबरी, एकजटा, वामाकाली, नीलसरस्वती त्रिपुरा और कालरात्रि के मन्त्र कलियुग में अभीष्टफलदायक माने गये है ॥

अब संक्षिप्त पुरश्चरण विधि कहते हैं -

चन्द्रग्रहण अथवा सूर्यग्रहण के समय समुद्र्गामिनी गंगा आदि नदियोम के जल में खडा होकर स्पर्शकाल से मोक्षकाल पर्यन्त जप कर उसके दशांश का होम तथा होम के दशांश संख्या में ब्राह्मणों को विविध प्रकार का भोजन कराने से मन्त्र सिद्धि हो जाती है । निरन्तर जप करने वाले साधकों को शीघ्रातिशीघ्र मन्त्र सिद्ध हो जाते है ॥ निष्काम भाव से देवताओं की उपासना करने वालों की सारी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है । केवल सुख प्राप्ति के लिए प्रत्येक मन्त्रों के जितने भी प्रयोग बतलाये गए हैं उनकी आसक्ति का त्याग कर निष्काम रुप से देवता की पूजा करनी चाहिए ॥

वेदों में कर्मकाण्ड, उपासना और ज्ञान तीन काण्ड बतलाये गए हैं । ‘ज्योतिष्टोमेन यजेत्‍’ यह कर्मकाण्ड है, ‘सूर्यो ब्रह्मेत्युपासीत’ यह उपासना है, ये दोनों काण्ड ज्ञान के साधन हैं हैं ‘अयमात्मा ब्रह्म’ यह ज्ञान है जो स्वयं में साध्य है । यही उक्त दोनों में ही वेदोक्त मार्ग के अनुसार प्रवृत्त होना चाहिए । देवता की उपासना से अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है । जिससे उत्तम ज्ञान की प्राप्ति होती है । कार्यकारणसंघात शरीर में प्रविष्ट हुआ जीव ही परब्रह्म है । इसी ज्ञान से साधक मुक्त हो जाता है । अतः मनुष्य देह प्राप्त कर देवताओम की उपासना से मुक्ति प्राप्त कर लेनी चाहिए । जो मनुष्य देह प्राप्त कर संसार बन्धन से मुक्त नही होता, वही महापापी ॥इसलिए उपासना और कर्म से काम-क्रोधादि शत्रुओं का नाश कर आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए सत्पुरुषों को सतत्‍ प्रयत्न करते रहना चाहिए ॥

जो व्यक्ति इस प्रकार धर्माचरण करते हुये त्रिकाल देव पूजन करता है वह कभी भी शत्रुओं एवं दुःखों से पीडित नहीं होता उसके इष्टदेव स्वयम उसकी रक्षा करते है ॥क्योंकि देवपूजा न करने पर नरक की प्राप्ति होती है अतः व्यक्ति को देवता के प्रति आस्था एवं श्रद्धा रख कर देव पूजन ही चाहिए ॥

महागणपति–आराधना शास्त्रकारों की आज्ञा के अनुसार गृहस्थ–मानव को प्रतिदिन यथा सम्भव पंचदेवों की उपासना करनी ही चाहिए। ये पंचदेव पंचभूतों के अधिपति हैैं। इन्हीं में महागणपति की उपासना का भी विधान हुआ है। गणपति को विध्नों का निवारक एवं ऋद्धि–सिद्धि का दाता माना गया है। ऊँकार और गणपति परस्पर अभिन्न हैं अत: परब्रह्यस्वरुप भी कहे गये हैं। पुण्यनगरी अवन्तिका में गणपति उपासना भी अनेक रुपों में होती आई है।

शिव–पंचायतन में

1. शिव,

2. पार्वती,

3. गणपति,

4. कातकेय

5. नन्दी की पूजा
–उपासना होती है और अनादिकाल से सर्वपूज्य, विघ्ननिवारक के रुप में भी गणपतिपूजा का महत्वपूर्ण स्थान है। गणपति के अनन्तनाम है। तन्त्रग्रन्थों में गणपति के आम्नायानुसारी नाम, स्वरुप, ध्यान एवं मन्त्र भी पृथक–पृथक दशत हैं। पौराणिक क्रम में षड्विनायकों की पूजा को भी महत्वपूर्ण दिखलाया है। उज्जयिनी में षड्विनायक–गणेष के स्थान निम्नलिखित रुप में प्राप्त होते है–

1. मोदी विनायक – महाकालमन्दिरस्थ कोटितीर्थ पर इमली के नीचे।

2. प्रमोदी ;लड्डूद्ध विनायक – विराट् हनुमान् के पास रामघाट पर।

3. सुमुख–विनायक ;स्थिर–विनायकद्ध– स्थिरविनायक अथवा स्थान–विनायक गढकालिका के पास।

4. दुमु‍र्ख–विनायक – अंकपात की सडक के पीछे, मंगलनाथ मार्ग पर।

5. अविघ्न–विनायक – खिरकी पाण्डे के अखाडे के सामने।

6. विघ्न–विनायक – विध्नहर्ता 





चिन्तामण–गणेशद्ध । इनके अतिरिक्त इच्छामन गणेश(गधा पुलिया के पास) भी अतिप्रसिद्ध है। यहाँ गणपति–तीर्थ भी है जिसकी स्थापना लक्ष्मणजी द्वारा की गई है ऐसा वर्णन प्राप्त होता है। तान्त्रिक द्ष्टि से साधना–क्रम से साधना करते हैं वे गणपति–मन्त्र की साधना गौणरुप से करते हुए स्वाभीष्ट देव की साधना करते है। परन्तु जो स्वतन्त्र–रुप से परब्र–रुप से अथवा तान्त्रिक–क्रमोक्त–पद्धित से उपासना करते हैं वेश्गणेश–पंचांग में दशत पटल, पद्धित आदि का अनुसरण करते है। मूत–विग्रह–रचना वामसुण्ड, दक्षिण सुण्ड, अग्रसुण्ड और एकाधिक सुण्ड एवं भुजा तथा उनमें धारण किये हुए आयुधों अथवा उपकरणों से गणपति के विविध रुपों की साधना में यन्त्र आदि परिवतत हो जाते हैं। इसी प्रकार कामनाओं के अनुसार भी नामादि का परिवर्तन होता हैं। ऋद्धि–सिद्धि (शक्तियाँ), लक्ष–लाभ(पुत्र) तथा मूशक(वाहन) के साथ समष्टि–साधना का भी तान्त्रिक विधान स्पृहणीय है। चेतावनी-मेरे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है लेख को पढ़कर यदि कोई व्यक्ति किसी टोने-टोटके,गंडे,ताविज अथवा नक्स आदि का प्रयोग करता है और उसे लाभ नहीं होता या फिर किसी कारण वश हानि होती है,तो उसकी जिम्मेदारी मेंरी कतई नहीं होगी,क्योकि मेरा उद्देश्य केवल विषय से परिचित कराना है। किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले। साधको को चेतावनी दी जाती है की वे बिना किसी योग्य व सफ़ल गुरु के निर्देशन के बिना साधनाए ना करे। अन्यथा प्राण हानि भी संभव है। यह केवल सुचना ही नहीं चेतावनी भी है। साधको को किसी भी प्रकार की (शारीरिक व मानसिक)हानि के लिए मै उत्तर दाई नहीं रहूंगा ।अत: सोच समझ कर साधनाए प्रारम्भ करे।। बाबा विश्वनाथ, भवानी अन्नपूर्णा, बिन्दुमाधव, मणिकर्णिका, भैरव, भागीरतेहे तथा दण्डपाणी मेरा सतत् कल्याण करें ॥

 ~~Jai mahakal~​~​

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